क्या किसी सरकारी स्कूल या हॉस्टल में गंदा पानी, खराब खाना या बिजली की किल्लत जैसी रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान 30 दिन में कर पाना संभव है? जहां देश के अधिकांश राज्यों में छात्र ऐसी बुनियादी सुविधाओं के लिए महीनों प्रशासनिक चक्कर काटने या सड़कों पर उतरने को मजबूर होते हैं, वहीं बिहार सरकार ने एक पारदर्शी ऑनलाइन व्यवस्था से इस धारणा को बदलने की कोशिश की है. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा शुरू की गई इस नई पहल ने छात्रों की शिकायतों के समाधान का एक ऐसा मॉडल पेश किया है, जिसकी गूंज अब देश भर में सुनाई देगी.
छात्रों की शिकायतें अक्सर लंबे समय तक अनसुलझी रह जाती हैं. इसकी बड़ी वजह प्रशासनिक प्रक्रिया की जटिलता है. किसी छात्र को हॉस्टल की सफाई, भोजन की गुणवत्ता, बिजली-पानी या फीस से जुड़ी दिक्कत होने पर पहले वार्डन, फिर प्रिंसिपल और जरूरत पड़ने पर जिला शिक्षा कार्यालय तक जाना पड़ता है. इस प्रक्रिया में न तो कोई तय समय सीमा होती है और न ही स्पष्ट जवाबदेही तय होती है, जिस वजह से छोटी शिकायतें भी हफ्तों-महीनों तक लंबित रह जाती हैं.
छात्र कैसे कर सकते हैं शिकायत
बिहार सरकार के विद्यार्थी सहयोग पोर्टल की खासियत यह है कि शिकायत दर्ज कराने के लिए दो अलग कैटेगरी बनाई गई हैं, पहली, शैक्षणिक संस्थान यानी विद्यालय, महाविद्यालय या विश्वविद्यालय से संबंधित विद्यार्थियों के लिए और दूसरी, छात्रावास यानी हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थियों के लिए. पोर्टल के होमपेज पर ही यह दोनों विकल्प दिए गए हैं. इससे छात्र सही कैटेगरी चुनकर सीधे संबंधित फॉर्म तक पहुंच जाता है. कैटेगरी चुनने के बाद छात्र के सामने एक सीधा-सादा फॉर्म खुलता है, जिसमें नाम, लिंग, पिता का नाम, जन्म तिथि और मोबाइल नंबर जैसी बुनियादी जानकारी भरनी होती है. ईमेल आईडी को वैकल्पिक रखा गया है ताकि जिन छात्रों के पास ईमेल नहीं है वे भी शिकायत दर्ज करा सकें, जबकि मोबाइल नंबर को ओटीपी से वेरिफाई किया जाता है ताकि हर शिकायत असली छात्र की ओर से ही दर्ज हो.
पोर्टल पर छात्रों के लिए तीन सुविधाएं दी गई हैं. शिकायत दर्ज कराने का विकल्प हॉस्टल सुविधाओं, भोजन, स्वच्छता, सुरक्षा और बिजली से जुड़ी समस्याओं के लिए है. इसके अलावा छात्र व्यवस्था सुधारने से जुड़े अपने सुझाव भी साझा कर सकते हैं. सबसे अहम बात यह कि एक बार शिकायत दर्ज करने के बाद छात्र उसकी मौजूदा स्थिति और उस पर हुई कार्रवाई को ट्रैक भी कर सकता है. पोर्टल पर सबसे ज्यादा दर्ज होने वाली शिकायतों को भोजन, पेयजल, बिजली, शौचालय-सफाई, सुरक्षा, बुनियादी ढांचे और इंटरनेट जैसी कैटेगरी में पहले से बांटा गया है, जिससे शिकायत सीधे संबंधित विभाग तक पहुंचती है और निपटारे में देरी नहीं होती.
कितने दिन में होगा शिकायत का समाधान
पोर्टल पर दर्ज हर शिकायत का 30 दिन के भीतर निपटारा सुनिश्चित करने की व्यवस्था है. समाधान के बाद संबंधित छात्र को लिखित रूप से इसकी सूचना भी दी जाती है, ताकि यह साफ रहे कि उसकी शिकायत पर वाकई कार्रवाई हुई है. जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि शिकायतकर्ता छात्र-छात्राओं की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाएगी, इससे छात्र बिना किसी डर के अपनी बात रख सकेंगे. जिन छात्रों के पास ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराने की सुविधा नहीं है, उनके लिए टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर 1100 भी उपलब्ध कराया गया है. पोर्टल का मकसद छात्रों की शैक्षणिक, परीक्षा, छात्रावास, छात्रवृत्ति और अन्य संस्थागत समस्याओं का पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से समाधान करना है.
सरकारी पोर्टल और हेल्पलाइन की घोषणाएं आमतौर पर होती रहती हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर व्यवहार में उतनी असरदार साबित नहीं होतीं. लेकिन बिहार सरकार की अब तक की कोशिशों को देखें तो ऐसा लगता है कि सरकार गंभीरता से छात्रों की समस्याओं को सुनने की ओर अग्रसर है. इस पोर्टल की खासियत है कि इसमें एक जवाबदेही तंत्र भी जोड़ा गया है, तय समय सीमा में शिकायत का समाधान न होने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई का भी प्रावधान है, जिससे यह सिर्फ कागजी व्यवस्था बनकर नहीं रह जाती है.
सहयोग शिविर क्यों लगवा रही है बिहार सरकार
पोर्टल के साथ-साथ सरकार ने हर महीने सहयोग शिविर आयोजित करने की व्यवस्था भी बनाई है, जिनमें मंत्री, विधायक, सांसद और संबंधित अधिकारी सीधे स्कूल-कॉलेजों में जाकर छात्रों से बातचीत करेंगे. इन शिविरों में मिलने वाली शिकायतों और सुझावों को भी उसी पोर्टल पर दर्ज कर ट्रैक किया जाता है. इससे पूरा सिस्टम एक जगह जुड़ा रहता है. यह व्यवस्था खासकर उन इलाकों में उपयोगी मानी जा रही है, जहां छात्र ऑनलाइन माध्यम के बजाय सीधी बातचीत में ज्यादा सहज महसूस करते हैं.
जिन राज्यों में छात्र आंदोलन और कैंपस में असंतोष की घटनाएं सामने आती रही हैं, उनके लिए बिहार का यह मॉडल कुछ स्पष्ट संकेत देता है. शिकायत निवारण तंत्र तभी प्रभावी होता है, जब उसमें तय समय सीमा और जवाबदेही दोनों शामिल हों. शिकायत और छात्रावास की समस्याओं को अलग-अलग कैटेगरी में बांटने और फॉर्म को आसान रखने से समाधान की रफ्तार तेज होती है, जबकि स्टेटस ट्रैक करने की सुविधा से छात्रों को भरोसा रहता है कि उनकी बात पर वाकई काम हो रहा है. साथ ही, सिर्फ डिजिटल पोर्टल पर निर्भर रहने के बजाय हेल्पलाइन और जमीनी शिविर जैसे विकल्प भी जरूरी हैं, ताकि हर वर्ग का छात्र इस व्यवस्था से जुड़ सकें.
बेवसाइट पर पारदर्शिता का अभाव
इसमें कोई शक नहीं है कि छात्रों की समस्याओं के त्वरित समाधान की दिशा में यह पोर्टल सराहनीय कदम है, लेकिन पारदर्शिता के लिहाज से अभी और काम करने की जरूरत है. पोर्टल पर कोई डैशबोर्ड न होने से आम नागरिक यह नहीं जान पा रहा है कि कुल कितनी शिकायतें अब तक मिलीं हैं, कितनों का समाधान हुआ हैं और छात्रों की सबसे बड़ी समस्या क्या है. समय सीमा का उल्लंघन करने पर कितने अधिकारियों पर कार्रवाई हुई यह भी जनता को बताना चाहिए ताकि व्यवस्था पर जनता का भरोसा और मजबूत हो.
शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए बड़ी घोषणाओं के साथ-साथ जमीनी क्रियान्वयन भी उतना ही जरूरी है. बिहार का अनुभव यह दिखाता है कि अगर शिकायत निवारण तंत्र में पारदर्शिता, आसान प्रॉसेस और जवाबदेही तय की जाए, तो नतीजे भी सामने आते हैं. अब देखना यह होगा कि अन्य राज्य इस मॉडल से कितना सीखते हैं और अपने यहां इसे किस रूप में लागू करते हैं.
(डिस्क्लेमर: लेखक देश की राजनीति पर पैनी नजर रखते हैं. वो राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)