नई दिल्ली. साल था 1976. देश में आपातकाल के बीच अचानक दिल्ली-जयपुर हाईवे को फौजी पहरे में सील कर दिया जाता है. कुछ ही घंटों बाद, जयगढ़ किले से निकलते हैं सेना के बंद ट्रकों के काफिले, जो सीधे देश की राजधानी दिल्ली की तरफ कूच करते हैं. आखिर उन ट्रकों में ऐसा क्या था, जिसने दो देशों के प्रधानमंत्रियों की नींद उड़ा दी थी? क्या वो अरावली की पहाड़ियों में छिपा मुगलों का वो अकूत खजाना था, जिसे 400 साल पहले राजा मानसिंह अफगानिस्तान की दुर्गम वादियों को फतह करके अपने साथ लाए थे? या फिर ये इंदिरा गांधी और जयपुर की बेहद खूबसूरत और रसूखदार राजमाता गायत्री देवी के बीच छिड़ी राजनीतिक जंग का नतीजा था?
रहस्य ऐसा गहराया कि पाकिस्तानी पीएम जुल्फिकार अली भुट्टो ने भी इंदिरा गांधी को चिट्ठी लिखकर इस सोने पर अपना हक जता दिया. सरकार ने कहा, 'कुछ नहीं मिला'. आइए, इतिहास के इसी सबसे बड़े और अनसुलझे रहस्य को जानते हैं.
अगस्त 1976 का महीना था. जब इंदिरा गांधी ने जयपुर के जयगढ़ किले में एक ऐसे खजाने की खोज शुरू करवाई, जो पांच महीनों तक पूरे देश में कौतूहल का विषय बनी रही. लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया, जब पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने इस खजाने पर अपना दावा ठोकते हुए सीधे इंदिरा गांधी को चिट्ठी लिख डाली.
रावलपिंडी से आई वो सनसनीखेज चिट्ठी
चिट्ठी की शुरुआत तो भारत-पाकिस्तान के आपसी सहयोग की औपचारिक बातों से हुई, लेकिन भुट्टो साहब ज्यादा देर तक अपनी असल नीयत छुपा नहीं पाए. वे सीधे मुख्य मुद्दे पर आए और लिखा, "मैं आपको उस खजाने के बारे में लिख रहा हूं जो आपकी सरकार के आदेश पर जयपुर में खोजा जा रहा है. मैं आपसे आग्रह करूंगा कि आप इस दौलत में पाकिस्तान के जायज हिस्से के दावे को ध्यान में रखें."

यानी, जो खजाना भारत की जमीन पर खोजा जा रहा था, उस पर पाकिस्तान अपना हक जता रहा था. भुट्टो की नजरें उस खजाने पर गड़ चुकी थीं, जिसके होने का उनके पास कोई पुख्ता सबूत तक नहीं था.
अफगानिस्तान में लड़ाई में मिला था सोने का खजाना
अब सवाल यह उठता है कि आखिर इस खजाने के पीछे की हकीकत क्या थी? इसके लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटकर मुगल काल में जाना होगा, साल 1581 के दौर में.
मुगल सम्राट अकबर ने अपने सबसे भरोसेमंद सेनापति, जयपुर के राजा मानसिंह (प्रथम) को उत्तर-पश्चिम सीमांत पर विद्रोहियों को कुचलने और अफगानिस्तान को मुगल साम्राज्य के अधीन करने के लिए भेजा था. इस अभियान के दौरान राजा मानसिंह के हाथ सोने और जवाहरात का एक ऐसा अकूत खजाना लगा, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. मानसिंह उस खजाने को लेकर वापस आए और उसे 16वीं सदी के आमेर किले में छिपा दिया.

इतिहासकार आर.एस. खंगारोत और पी.एस. नाथावत की किताब 'जयगढ़, द इनविंसिबल फोर्ट ऑफ आमेर' में जिक्र है कि राजा मानसिंह काबुल अभियान (1581-1587) से भारी मात्रा में संपत्ति लेकर आए थे. माना जाता है कि उन्होंने अकबर को भी इस खजाने की भनक नहीं लगने दी थी. बाद में, जब 1726 में जयगढ़ किला बना, तो इस खजाने को वहां के गुप्त तहखानों में शिफ्ट कर दिया गया.
सदियों तक यह बात सिर्फ एक राज बनी रही, जब तक कि एक अरबी किताब 'हफ्त तिलिस्मात-ए-आंबेरी' में इसका खुलासा नहीं हुआ. इस किताब में लिखा था कि आमेर किले के पीछे 'सागर' (पानी के बड़े टैंक) के पास सात जादुई खजाने छिपे हैं. अंग्रेजों ने भी इस किताब के सहारे खजाने को खोजने की कोशिश की, लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं लगा.
आपातकाल में राजमाता गायत्री देवी पर निशाना
जिस खजाने को अंग्रेज नहीं ढूंढ पाए, उस पर इंदिरा गांधी की नजर पड़ी. तारीख थी 25 जून 1975, जब देश में इमरजेंसी लागू कर दी गई थी. प्रेस पर सेंसरशिप थी, विपक्षी नेता जेलों में ठूंसे जा रहे थे. इसी दौरान इंदिरा गांधी की धुर राजनीतिक विरोधी और जयपुर की पूर्व राजमाता गायत्री देवी को विदेशी मुद्रा कानून (COFEPOSA) के तहत गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया गया.
गायत्री देवी की गिरफ्तारी के तुरंत बाद, संजय गांधी के मशविरे पर जयगढ़ किले में सेना, आयकर विभाग और पुलिस का एक बड़ा साझा दस्ता दाखिल हुआ. सदियों से शांत पड़े इस किले में अचानक मशीनों और हथौड़ों की आवाजें गूंजने लगीं.

सेना के हेलीकॉप्टर और हवा में उड़ती अफवाहें
जयगढ़ में चल रही खुदाई को बेहद गुप्त रखा गया था. पूरे इलाके की घेराबंदी कर दी गई थी. जब आसमान में सेना के हेलीकॉप्टर मंडराने लगे और खुद संजय गांधी वहां मुआयना करने पहुंचे, तो जयपुर की जनता के बीच बातें चलने लगीं कि खजाना मिल गया है.
यही शोर पाकिस्तान तक पहुंचा और भुट्टो ने भारत-पाकिस्तान के बीच हुए समझौतों का हवाला देकर अपना दावा ठोक दिया.
खुदा पहाड़, निकली चुहिया
पांच महीने के लंबे ड्रामे के बाद नवंबर 1976 में यह सर्च ऑपरेशन बंद कर दिया गया. इसके बाद इंदिरा गांधी ने भुट्टो की चिट्ठी का जवाब दिया. उन्होंने बड़े नपे-तुले अंदाज में लिखा, "मैंने हमारे कानूनी विशेषज्ञों से आपके दावे पर विचार करने को कहा था. उनका साफ मानना है कि पाकिस्तान के इस दावे का कोई कानूनी आधार नहीं है. और वैसे, आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि वहां ऐसा कोई 'खजाना' मिला ही नहीं है."
इमरजेंसी खत्म होने के बाद गायत्री देवी को जेल से रिहा किया गया. सरकारी तौर पर यह घोषणा की गई कि जयगढ़ किले में कोई खजाना नहीं मिला, वहां केवल 230 किलोग्राम चांदी बरामद हुई थी. इस पर बॉलीवुड में फिल्म 'बादशाहो' बन चुकी है. जिसमें अजय देवगन मुख्य किरदार में थे.

सस्पेंस आज भी बरकरार
सरकारी फाइलों ने तो केस बंद कर दिया, लेकिन इस कहानी के कुछ अनसुलझे सवाल आज भी हवा में तैर रहे हैं.
दिल्ली-जयपुर हाईवे का रहस्य
आखिर उस दौरान दिल्ली-जयपुर हाईवे को आम जनता के लिए एक पूरे दिन के लिए बंद क्यों किया गया था? प्रत्यक्षदर्शियों और चर्चाओं के मुताबिक, उस दिन सेना के 50 से 60 ट्रकों का काफिला जयपुर से दिल्ली की तरफ रवाना हुआ था. उन ट्रकों में क्या था?
टनल का राज
अगर मानसिंह ने खजाना आमेर किले में छिपाया था, तो खुदाई जयगढ़ में क्यों हुई? दरअसल, अरावली की पहाड़ियों पर बने जयगढ़ और नीचे स्थित आमेर किले के बीच एक गुप्त सुरंग है, जो इन दोनों को जोड़ती है. क्या वो खजाना वाकई था ही नहीं, या फिर उसे बेहद खामोशी से दिल्ली पहुंचा दिया गया? यह रहस्य आज भी जयगढ़ की दीवारों में दफ्न है. इतिहासकारों ने इस पूरे घटनाक्रम को 'अंधेरे में तीर चलाने' जैसा करार दिया है.
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