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प्रशांत किशोर, जन सुराज और बिहार: क्या अमेरिकी चुनावी मॉडल भारत में असफल है?

राजन झा
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जुलाई 20, 2026 17:38 pm IST
    • Published On जुलाई 20, 2026 14:02 pm IST
    • Last Updated On जुलाई 20, 2026 17:38 pm IST
प्रशांत किशोर, जन सुराज और बिहार: क्या अमेरिकी चुनावी मॉडल भारत में असफल है?

बराक ओबामा के राष्ट्रपति चुनाव अभियान को अमेरिकी लोकतंत्र में एक मील का पत्थर माना जाता है. 'Yes We Can' और 'Change we can believe in' जैसे शानदार नारें इस अभियान से निकले थे. इसी अभियान ने पहले अफ़्रीकी-अमेरिकी को व्हाइट हाउस पहुंचाया था. लेकिन ओबामा की जीत का एक ऐसा पहलू है जिस पर ज़्यादा चर्चा नहीं हुई. दरअसल उनके चुनाव अभियान ने दुनिया के सबसे बड़े विज्ञापन कॉम्पिटिशन में भी इतिहास रचा और प्रतिष्ठित 'कान्स अवॉर्ड' (Cannes Award) जीता. यही वजह है कि अमेरिका के मशहूर राजनीतिक आलोचक प्रोफ़ेसर नोआम चॉम्स्की ने अमेरिकी चुनाव को पीआर कंपनियों द्वारा चलाया जाने वाला 'पब्लिक रिलेशंस का तमाशा' कहा है, जहां वोटरों को गुमराह करके बेतुके और बिना जानकारी वाले फ़ैसले लेने के लिए उकसाया जाता है. यह राजनीतिक गिरावट अब सिर्फ़ अमेरिका तक सीमित नहीं रही; अमेरिकी चीज़ों की तरह ही हम भारतीय भी इसे बड़े चाव से अपना रहे हैं. भारतीय लोकतंत्र में इस सोच का बीज बोने वाले व्यक्ति प्रशांत किशोर थे, जिन्होंने नरेंद्र मोदी के 2014 के प्रधानमंत्री पद के अभियान को 'अच्छे दिन' जैसे अस्पष्ट वादों के सहारे इसी तरह चलाया था. भारतीय राजनीति में प्रशांत किशोर का तेज़ी से उभार, भारतीय चुनावों के 'अमेरिकीकरण' की भी कहानी है. यहां चुनाव वैचारिक अपील या शासन के किसी वैकल्पिक मॉडल के आधार पर नहीं, बल्कि एक पीआर एक्सरसाइज़ के तौर पर लड़े जाते हैं, जहां मकसद चुनाव अभियान के आकर्षक नारों और नेता की व्यक्तिगत लोकप्रियता से वोटरों को सम्मोहित करना होता है.

भारतीय राजनीति में पीआर तकनीक

प्रशांत किशोर के मामले का अलग से विश्लेषण करने की ज़रूरत है, क्योंकि वह भारतीय चुनावों की आम समस्या, यानी कॉर्पोरेट फंडिंग को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं; संगठित पूंजी तो शुरू से ही भारतीय लोकतंत्र का हिस्सा रही है. हालांकि, भारतीय राज्य के तेज़ी से नव-उदारवादी (Neo-liberal) बनने का असर भारतीय लोकतंत्र पर दिखने लगा था, जैसा कि 2004 के चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी के 'इंडिया शाइनिंग' और 'भारत उदय' नारों से साफ़ हुआ था, जिन्हें दिवंगत प्रमोद महाजन ने तैयार किया था. लेकिन 2004 के चुनाव में बीजेपी की चौंकाने वाली हार ने साबित कर दिया कि भारतीय मतदाता असल मुद्दों की जगह दिखावे को चुनने के लिए तैयार नहीं थे. इसके एक दशक बाद, अपनी लोकप्रियता और 'गुजरात मॉडल' के आकर्षण के दम पर नरेंद्र मोदी का उदय हुआ. इसने भारतीय चुनाव प्रणाली में बुनियादी बदलाव का एक बेहतरीन मौका दिया. पर्दे के पीछे रहकर रणनीति बनाने वाले प्रशांत किशोर ने 'चाय पे चर्चा' जैसी नई पीआर तकनीकों का इस्तेमाल कर चुनाव प्रचार को आगे बढ़ाया. प्रचार को इतना व्यक्तिगत बना दिया गया कि भारतीय मतदाता यह भूल गए कि उन्हें संसदीय प्रणाली में संसद सदस्य चुनना है न कि राष्ट्रपति प्रणाली में देश का प्रमुख.साल 2014 के चुनाव प्रचार की ज़बरदस्त सफलता ने न केवल नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को राजनीतिक फ़ायदा पहुंचाया, बल्कि प्रशांत किशोर के राजनीतिक रणनीतिकार के करियर की भी शुरुआत की. बाद के सालों में उन्होंने कई राजनीतिक दलों के साथ अपने प्रयोगों और तकनीकों को दोहराया. इनमें राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस, अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस शामिल हैं. यह भारतीय राजनीतिक वर्ग की कमज़ोर होती स्थिति और अपनी विचारधारा व संगठन के ज़रिए मतदाताओं से जुड़ने में उनकी अक्षमता को दर्शाता है.

अब, जब प्रशांत किशोर और उनकी 'जन सुराज' पार्टी को 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में भारी राजनीतिक हार का सामना करना पड़ा है, तो इससे कुछ हद तक इस सवाल का जवाब मिल जाता है कि बिहार जैसे बेहद सामंती और आर्थिक रूप से पिछड़े राज्य में भारतीय चुनाव प्रचार का यह 'अमेरिकीकरण' वाला तरीका कितना सफल होगा. इसके साथ ही, यह भी पता चलता है कि क्या बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर का आना राज्य में दशकों से चली आ रही 'सामाजिक न्याय' की राजनीति के अंत का संकेत है.

बिहार की सामाजिक न्याय की राजनीति

प्रशांत ने विधानसभा क्षेत्र बांकीपुर के उपचुनाव में अपनी उम्मीदवारी की घोषणा की है. यह सीट बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफ़े से खाली हुई है. इससे यह साबित होता है कि बिहार के मौजूदा राजनीतिक ढांचे में, जहां जातिगत पहचान ही सबसे बड़ी सच्चाई है, वैकल्पिक ताकतों को भी उसी ढांचे को अपनाना पड़ा. एक राज्य के तौर पर बिहार एक पहेली जैसा है, क्योंकि यहां बहुत ज़्यादा राजनीतिक हलचल के साथ-साथ घोर गरीबी भी है और बिना किसी खुले सांप्रदायिकता के गहरी जाति-व्यवस्था ही राजनीतिक चर्चाओं को तय करती है. सामाजिक न्याय की राजनीति को कई विश्लेषक बिहार की आर्थिक बदहाली की मुख्य वजह मानते हैं.यह समाज के ताने-बाने में भी गहराई से जुड़ी हुई है.भूमि सुधारों की विफलता, शहरीकरण और औद्योगीकरण के अभाव जैसे ऐतिहासिक कारणों ने बिहार के सामाजिक ढांचे के आधुनिकीकरण में बाधा डाली है और सामंती विशेषताओं को बढ़ावा दिया है, जैसे आबादी के एक बड़े हिस्से का ज़मीन के मालिकों (अभिजात्य वर्ग) पर बहुत ज़्यादा निर्भर रहना. इसका नतीजा यह हुआ कि कर्पूरी ठाकुर द्वारा शुरू किए गए और लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जैसे नेताओं द्वारा आगे बढ़ाई गई सामाजिक न्याय की राजनीति को इस गठजोड़ को तोड़ने और पिछड़े वर्गों को उनके 'वितरणात्मक न्याय' (संसाधनों के बंटवारे के न्याय) के विचारों के ज़रिए बंधनों से मुक्त करने का श्रेय दिया जाता है. हालांकि, नीतीश-लालू की जोड़ी बिहार के शोषणकारी सामाजिक ढांचे में कोई खास बदलाव लाने में नाकाम रही, क्योंकि उनके शासनकाल में बड़े पैमाने पर कुशासन, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद रहा है. उनकी विफलता ही 'सामाजिक न्याय' की राजनीति का मुख्य कारण बन गई. 90 के दशक में यह बिहार की राजनीति का मुख्य विषय बन गया, क्योंकि मंडल के बाद के दौर में आई सामाजिक-राजनीतिक जागृति का सामना एक गरीब समाज से हो रहा था.

बीजेपी का समावेशी हिंदुत्व

बिहार की राजनीति में एक और समानांतर विषय बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीति है, जो हिंदुत्व के एजेंडे पर आधारित है और पारंपरिक रूप से उच्च जातियों को आकर्षित करती है. 2014 के बाद के दौर में, बीजेपी ने अपने पारंपरिक सवर्ण आधार से आगे बढ़ने की कोशिश की. इसके लिए उन्होंने ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) का उप-वर्गीकरण करने और हिंदू-निषाद व हिंदू-कुशवाहा जैसी मिली-जुली पहचान बनाने जैसी रणनीतिक पहल की. इसका मकसद सांप्रदायिकता को एक समावेशी हिंदुत्व के रूप में पेश करना था, जहां निचली जातियां उच्च जातियों के विशेषाधिकारों को चुनौती दिए बिना सांस्कृतिक जुड़ाव महसूस कर सकें. क्रिस्टोफ़ जैफ़्रेलॉट जैसे विद्वान सूक्ष्म स्तर पर की गई इस सामाजिक इंजीनियरिंग को हिंदुत्व का 'पोस्ट-मंडलकरण' (मंडल के बाद का दौर) कहते हैं, जहां स्थानीय जाति-पदानुक्रम को खत्म करने के बजाय उसे अपना लिया जाता है.

ऐसे समय प्रशांत किशोर का आगमन बिहार की राजनीति में एक अहम मोड़ साबित हुआ, क्योंकि वे सामाजिक न्याय और हिंदुत्व के प्रतिस्पर्धी ढांचों से हटकर एक नई राजनीतिक जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं. प्रशांत किशोर पलायन, औद्योगीकरण की कमी और बिहारी गौरव जैसे मुद्दों को उठाकर बिहार की राजनीति के उस चक्र को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, जो खुद-ब-खुद चलता रहता है. उनकी कोशिशों का नतीजा क्या होगा, यह तो आने वाले हफ़्तों में बिहार के वोटर ही तय करेंगे. लेकिन उनका राजनीतिक सफ़र निश्चित रूप से बिहार की राजनीति के तौर-तरीकों को बदल रहा है.

(डिस्क्लेमर: लेखक बिहार के ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के एचपीएस कॉलेज, मधेपुर में राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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Prashant Kioshor, Bihar Election, Social Justice
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