गौ रक्षा के इस दौर में महाराष्ट्र सरकार ने पत्रकारों की रक्षा के लिए एक बिल पेश किया और पास भी हो गया. बीजेपी ने चुनावी वादा किया था जो पूरा हो गया. यह बिल अगर पास हुआ तो महाराष्ट्र में पत्रकारों या मीडिया संस्थानों पर हमला करना दंडनीय अपराध हो जाएगा. मीडिया संस्थान के प्रबंधन यानी मैनेजमेंट को इस कानून से कोई लाभ नहीं होगा क्योंकि उन्हें इस कानून के तहत संरक्षण नहीं मिलेगा. हमारे सहयोगी प्रसाद काथे ने बताया कि इसके तहत कॉन्ट्रैक्ट, ऑनलाइन, फ्रीलांस पत्रकारों को भी संरक्षण मिलेगा और यह ग़ैर ज़मानती अपराध होगा. बिल के अनुसार पत्रकार पर हमला करने वाले को 3 साल की सज़ा होगी और 50 हज़ार का जुर्माना होगा. पत्रकारिता की आड़ में ग़लत काम करने वालों को भी यही सब सज़ा मिलेगी. पत्रकार पर हमला करने वालों को उसके इलाज का ख़र्च उठाना होगा. मीडिया संस्थान पर हमला करने वाले को नुकसान की भरपाई करनी होगी. महाराष्ट्र व अन्य राज्यों में डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए भी कानून है. इस तरह से सबके लिए अलग-अलग कानून बनेंगे तो एक दिन वकील सुरक्षा कानून, विधायक सुरक्षा कानून, पायलट सुरक्षा कानून, एयरहोस्टेटस सुरक्षा कानून भी बन जाएगा. तब एक दिन कोई ग़रीब जाएगा और कहेगा सरकार हमारी सुरक्षा के लिए भी कानून बना दो. पत्रकारों को इस वक्त सबसे ज्यादा सुरक्षा की ज़रूरत इस बात से है कि उनकी ख़बर छप जाए और जहां काम करते हैं वहां कम से कम पत्रकारिता अपने मूल्यों के हिसाब से हो जाए. एनि वे टॉपिक चेंज करते हैं और गौ रक्षा पर आते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और 6 राज्यों को नोटिस जारी कर तीन हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है. तहसीन पूनावाला और शहज़ाद पूनावाला ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है कि गौ रक्षा के नाम पर दलितों और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाले संगठनों पर उसी तरह प्रतिबंध लगाया जाए जैसे सिमी जैसे संगठन पर लगाया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा था लेकिन जवाब नहीं मिला तो नोटिस जारी कर दिया है. केंद्र के अलावा गुजरात, राजस्थान, झारखंड, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक सरकार को नोटिस जारी किया गया है. जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस ए एम खान्विलकर इस मामले की सुनवाई कर रहे हैं. 3 मई को इस मामले में सुनवाई होगी.
राजस्थान में गौ रक्षा के लिए स्टांप ड्यूटी में मामूली वृद्धि की गई है फिर भी विरोध हो रहा है. दस रुपये से लेकर डेढ़ सौ की वृद्धि गाय के नाम पर तो बर्दाश्त की ही जा सकती है लेकिन जो ग़रीब है उसे राहत मिल जाए तो उसमें भी बुराई नहीं.
गौ रक्षा के नाम पर हिंसा, राजनीति के अलावा इन्हीं मुद्दों के संदर्भ में बहुत सी ऐसी कहानियां हैं जिन्हें हम जानें तो उनकी मदद से राजनीतिक मसले को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं. गौ रक्षा को लेकर टीवी और अखबारों पर चलने वाली बहसें हर घटना के बाद उन्हीं सारे दावों के साथ हाज़िर हो जाती हैं. जैसे बहुत से लोग इसी बात से हैरत में थे कि पहलू ख़ान गो पालक थे, रमज़ान में दूध के कारोबार के लिए गाय खरीदी थी. हमारे सहयोगी हर्षा ने एक रिपोर्ट भेजी है मारवाड़ मुस्लिम आदर्श गौशाला की. जोधपुर के बाड़मेर रोड पर बुजवाड़ गांव में ये गौशाला है. 2004 से चल रही इस गौशाला को मौलाना आज़ाद स्कूल के संचालक चलाते हैं. आस पास के गांवों में जब गाएं बीमार हो जाती हैं, लाचार हो जाती हैं और दूध दे सकने की स्थिति में नहीं होती तो लोग छोड़ देते हैं. इसलिए नहीं कि तब उन्हें गायों से प्यार नहीं रह जाता, इसलिए भी गाय पालने वाले बीमार और बूढ़ी गाय का ख़र्चा नहीं उठा सकते हैं. लिहाज़ा टीका लगाकर छोड़ देते हैं. कुछ लोग तो कसाई को बेच देते हैं मगर बहुत लोग गाय को बेचने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं. लिहाज़ा ऐसी गायों को अतीक मोहम्मद साहब अपनी गौशाला में ले आते हैं. यहां 200 से अधिक गायें हैं. सब की सब बीमार और लाचार. इनके इलाज के लिए पशु चिकित्सक हैं, एबुंलेंस भी है और दूर दराज़ के गावों में जाकर इलाज भी करवा देते हैं. अतीक मोहम्मद ने बताया कि वे स्कूल भी चलाते हैं जहां सभी समुदाय के बच्चे पढ़ते हैं. यही नहीं, अतीक अहमद की गौशाला में बीमार गायों का नाम भी रखा जाता है. गंगा, जमुना, सरस्वती, आनंदी, अंजली, अंजूड़ी, गीता, मोडकी, कालकी, अनोपड़ी, धोलकी, कंचूड़ी, सीता, लक्ष्मी. अतीक की गौशाला में गायों के ये नाम हैं. एक गाय का नाम सुल्तान और मुमताज भी है. अतीक मोहम्मद ने कहा कि वे अहसान नहीं कर रहे बल्कि अपना फ़र्ज़ निभा रहे हैं. इनकी गौशाला का गेट बंद नहीं होता और गायें बांधी नहीं जाती. क्योंकि बांध देने से गाय कीचड़ में देर तक रहती है इससे उसके खुर यानी पांव खराब हो जाते हैं और खड़ी नहीं रह पाती है.
मैंने ये कहानी इसलिए नहीं बनाई कि इसे सुनते ही आप फिल्मी स्टाईल में झगड़ा छोड़कर सेकुलर हो जाएं. मैं उम्मीद भी नहीं करता. जो ज़हर हमारे दिमाग़ में घोला गया है वो पीढ़ियों बाद जाएगा, अतीक मोहम्मद की कहानी से नहीं जाएगा. हमें समझना होगा कि हमारी कृषि व्यवस्था में मवेशी पालन अनिवार्य अंग है. राजस्थान से लेकर बिहार तक में मवेशियों के अनगिनत मेले लगते हैं. बहुत से समुदाय ऐसे हैं जो गायों के झुंड को लेकर एक राज्य से दूसरे राज्य चले जाते हैं ताकि उन्हें हरी घास मिल सके. गौ रक्षा की राजनीति इन साधारण लोगों के ऊपर कानून की जटिलताएं थोप रही है. आपने हाईवे के किनारे देखा होगा दो चार लोग सैंकड़ों की संख्या में गाय बैल लिये चले जा रहे हैं. दरअसल ये पलायन कर रहे होते हैं. अब इन्हें क्या पता कि कलेक्टर से अनुमति लेनी होगी. बेवजह एक कानून इन लोगों की ज़िंदगी में घुस जाता है.
This Article is From Apr 07, 2017
प्राइम टाइम इंट्रो : नकली गौरक्षकों के बहकावे में आने से पहले
Ravish Kumar
- ब्लॉग,
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Updated:अप्रैल 07, 2017 23:33 pm IST
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Published On अप्रैल 07, 2017 23:33 pm IST
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Last Updated On अप्रैल 07, 2017 23:33 pm IST
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