राजनीति में रिश्ते और समीकरण समय के साथ बनते-बिगड़ते रहते हैं. यह सिर्फ राजनीति के बाजारीकरण का मामला नहीं है, बल्कि सत्ता के सुख और प्रभाव के लिए होने वाली राजनीतिक उठापटक और अवसरवादी जोड़-तोड़ भी लगातार देखने को मिलती रहती है. तमिलनाडु में अप्रत्याशित जीत तमिलगा वेत्री कषगम (TVK) के तमिलनाडु के मेगा स्टार थलपति विजय उर्फ जोसेफ विजय की हुई है, लेकिन राजनीतिक बंदरकूद से कांग्रेस पार्टी सत्ता में भागीदारी करना चाहती है. लगता है कि इसी रणनीति के तहत कांग्रेस ने पुराने गठबंधन डीएमके से राजनीतिक दूरी बनाकर विजय उर्फ जोसेफ से हाथ मिलाने का फैसला किया. इसे अवसरवादिता कहें या बदलते राजनीतिक समीकरण और प्रदेश के भविष्य को देखते हुए लिया गया फैसला. यह चर्चा का विषय बना हुआ है. लगता है कि चुनाव से पहले TVK के साथ गठबंधन नहीं करने की भारी भूल के बाद सुधार करते हुए यह फैसला लिया गया, ताकि हाथ से मौका न निकल जाए. इस घटनाक्रम ने फिर साबित कर दिया कि राजनीति में गठबंधन स्थायी नहीं होते, सत्ता की संभावनाएं ही सबसे स्थायी होती हैं.
ऐसी स्थिति क्यों बनी?
दरअसल पांच राज्यों में हुए चुनाव— पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुदुचेरी में इकलौता राज्य तमिलनाडु है, जहां किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला. TVK को 108, डीएमके गठबंधन को 72 और एआईएडीएमके गठबंधन को 54 सीटें मिलीं. TVK को सरकार बनाने के लिए तमिलनाडु की 234 विधानसभा सीटों में 118 चाहिए. कांग्रेस को डीएमके गठबंधन में 5 सीटें मिली थीं. विजय ने कांग्रेस से समर्थन मांगा और कांग्रेस ने समर्थन देने का ऐलान कर दिया. ऐसे में विजय की एंट्री कांग्रेस के लिए एक नए राजनीतिक अवसर की तरह दिखाई दे रही है. कांग्रेस यह समझती है कि तमिलनाडु में केवल पुराने गठबंधनों के भरोसे उसकी राजनीति आगे नहीं बढ़ सकती. इसलिए विजय जैसे लोकप्रिय चेहरे के साथ भविष्य की संभावनाएं तलाशना केवल एक राजनीतिक प्रयोग नहीं, बल्कि अस्तित्व बचाने की रणनीति भी हो सकती है.
विजय से हाथ मिलाने का राज
कांग्रेस पार्टी को लगता है कि तमिलनाडु की राजनीति में हीरो की पूछ होती है. एक जमाने में एम. जी. रामचंद्रन, जयललिता और एम. करुणानिधि फिल्म जगत से जुड़े थे, लेकिन उनकी गैरमौजूदगी में फिर से विजय उभरकर आए हैं. ऐसे में तमिलनाडु की राजनीति में विजय दूर के खिलाड़ी हो सकते हैं, इसलिए ऐसा फैसला लिया गया. दूसरी वजह यह है कि कांग्रेस को लगता है कि जब तक पार्टी अपने पैर पर नहीं खड़ी और मजबूत नहीं होगी, तब तक गठबंधन के साथी और सरकार के लोग उसे अहमियत नहीं देंगे. इसी का नतीजा था कि 2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी ने उत्तरी और दक्षिणी भारत में पार्टी को मजबूत करने के लिए दो जगह से लोकसभा का चुनाव लड़ा था, हालांकि अमेठी की जीत के बाद राहुल ने वायनाड छोड़ दिया था, जहां से उनकी बहन प्रियंका गांधी वायनाड से सांसद चुनी गईं. इसे ऐसे भी देखा जा सकता है कि केरल विधानसभा चुनाव में शायद इसका फायदा हुआ और कांग्रेस की जीत हुई. कांग्रेस का मानना है कि यह फैसला लोकसभा और विधानसभा दोनों के लिए फायदेमंद है और दक्षिण भारत में पार्टी अपनी अहमियत बनाकर रखना चाहती है.
विजय से करार, इंडिया गठबंधन में होगी दरार?
कांग्रेस के इस फैसले से इंडिया गठबंधन में एक सस्पेंस की स्थिति बन गई है, किस पर भरोसा किया जाए और किस पर नहीं. चूंकि लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्ष एकजुट हो जाता है, लेकिन विधानसभा चुनाव में यह गठबंधन ताश के पत्तों की तरह ढह भी जाता है. विधानसभा और लोकसभा चुनाव में एक-दूसरे को हैसियत दिखाते हैं. अपने ही सहयोगी क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस को भाव नहीं देतीं, मतलब हैसियत दिखाती हैं. एक राष्ट्रीय पार्टी की भूमिका और अहमियत कई बार एक पिछलग्गू पार्टी जैसी हो जाती है. चाहे उत्तर प्रदेश हो या बिहार, फिर झारखंड हो या महाराष्ट्र, सीट बंटवारे में कांग्रेस की राष्ट्रीय पार्टी जैसी निर्णायक भूमिका नहीं दिखती है. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने लोकसभा से लेकर विधानसभा तक कांग्रेस से गठबंधन करने से मना कर दिया. यही नहीं, संसद में टीएमसी कई बार स्वतंत्र रणनीति अपनाती रही है.
इंडिया गठबंधन का रिश्ता भी अजीब है. कांग्रेस से ममता बनर्जी ने गठबंधन नहीं किया, लेकिन इंडिया गठबंधन के कई नेता ममता बनर्जी के समर्थन में प्रचार करते दिखे. वहीं इंडिया गठबंधन की उथल-पुथल में समाजवादी पार्टी के मुखिया हार के बाद ममता बनर्जी और एम. के. स्टालिन से मिले, जबकि कांग्रेस से टीएमसी और डीएमके की आंतरिक मतभेद बने रहते हैं. गौर करने की बात यह भी है कि जिस इंडिया गठबंधन के सूत्रधार नीतीश कुमार थे, आपसी खींचतान और अनिर्णय की वजह से नीतीश को इंडिया गठबंधन छोड़कर फिर एनडीए में जाना पड़ा. यदि नीतीश इंडिया गठबंधन का हिस्सा होते तो शायद लोकसभा के परिणाम और राजनीतिक स्थिति अलग हो सकती थी. अब सवाल है कि डीएमके से रिश्ता तोड़कर विजय से हाथ मिलाने के बाद इंडिया गठबंधन एक-दूसरे को संदेह की नजरों से देखेगा.
डीएमके से खट्टे-मीठे रिश्ते
तमिलनाडु लंबे समय से द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) की राजनीति के बीच बंटा रहा है. कांग्रेस ने भी अक्सर अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए इन्हीं क्षेत्रीय दलों का सहारा लिया. कभी डीएमके के साथ, कभी एआईएडीएमके के साथ, लेकिन अपनी स्वतंत्र शक्ति खड़ी करने में कांग्रेस लगातार कमजोर होती गई. हालांकि कांग्रेस हो या बीजेपी, डीएमके और एआईएडीएमके किसी के लिए अछूती नहीं रही हैं. तमिलनाडु में राजीव गांधी की हत्या के बाद डीएमके और कांग्रेस के बीच तनातनी बढ़ी थी. इंद्र कुमार गुजराल की सरकार से कांग्रेस पार्टी ने 1998 में समर्थन वापस लिया था. जैन आयोग की अंतरिम रिपोर्ट में डीएमके पर एलटीटीई के प्रति नरम रुख रखने के आरोप लगे थे, जबकि एलटीटीई पर राजीव गांधी की हत्या का आरोप था. कांग्रेस चाहती थी कि गुजराल सरकार डीएमके के मंत्रियों को हटाए, लेकिन गुजराल इसके लिए तैयार नहीं हुए थे. वहीं 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को गिराने में जयललिता का अहम किरदार था. जयललिता चाहती थीं कि करुणानिधि की नेतृत्व वाली सरकार को बर्खास्त किया जाए, लेकिन वाजपेयी तैयार नहीं थे, मतलब तमिलनाडु की पार्टी का केंद्र के गठबंधन में अदला-बदली हो गई. जयललिता कांग्रेस के करीब पहुंच गईं और डीएमके बीजेपी के करीब.
सत्ता ही सबसे स्थायी सत्य
कांग्रेस ही नहीं बल्कि बीजेपी में भी चुनावी रणनीति बदलती रहती है. महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना की जीत 2019 में हुई थी, लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर बीजेपी और शिवसेना के बीच टकराव हो गया. देवेंद्र फडणवीस ने अजित पवार के साथ सरकार बनाने की कोशिश की, लेकिन वह ज्यादा दिन टिक नहीं पाई. फिर उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई और अंततः बीजेपी और शिवसेना का रिश्ता टूट गया. बीजेपी ने अपनी राजनीतिक जमीन बढ़ाने के लिए असम में कांग्रेस के हिमंता बिस्वा सरमा, पश्चिम बंगाल में टीएमसी के सुवेंदु अधिकारी और बिहार में आरजेडी और जेडीयू के सम्राट चौधरी जैसे नेताओं को पार्टी में शामिल किया. अब इन नेताओं की भूमिकाएं अपने-अपने राज्यों में बढ़ गई हैं, सभी अपने-अपने राज्यों में मजबूत स्थिति में हैं.
इससे यह बात साफ होती है कि भारतीय राजनीति में विचारधारा से ज्यादा महत्वपूर्ण सत्ता का संतुलन होता है. जब नया शक्ति केंद्र उभरता है तो पुराने गठबंधन भी नए रास्ते तलाशने लगते हैं. तमिलनाडु में विजय को लेकर शुरू हुआ यह सियासी अध्याय आने वाले समय में दक्षिण भारतीय राजनीति की दिशा बदल सकता है.
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): धर्मेन्द्र कुमार सिंह, चुनाव और राजनैतिक विश्लेषक हैं. इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.