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बांकीपुर में होगी प्रशांत किशोर की परीक्षा, नतीजा तय करेगा आगे का रास्ता

रशीद किदवई
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जुलाई 08, 2026 19:05 pm IST
    • Published On जुलाई 08, 2026 19:05 pm IST
    • Last Updated On जुलाई 08, 2026 19:05 pm IST
बांकीपुर में होगी प्रशांत किशोर की परीक्षा, नतीजा तय करेगा आगे का रास्ता

एक दशक से भी अधिक समय प्रशांत किशोर एक ऐसे 'अदृश्य व्यक्ति' रहे हैं, जो काफी चर्चा में रहे. उन्होंने चुनावी कैंपेन बनाने, वोटरों का मूड समझने, नेताओं के लिए सही भाषा का चुनाव करने, गठबंधन बनाने और राजनीतिक दलों को सलाह देने का काम किया. ऐसा लगता था कि वे भारतीय राजनीति को उन लोगों से बेहतर समझते हैं जो इसमें फ़ुल-टाइम काम करते हैं. उनकी असली ताकत सत्ता के आस-पास बने रहने में थी. वे चुनावी राजनीति के जोखिम उठाए बिना नतीजों को प्रभावित कर सकते थे. लेकिन बांकीपुर इस स्थिति को बदलता है.

बांकीपुर सीट पर कब होगा मतदान

बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव का मतदान 30 जुलाई को होना है. यह सीट नितिन नवनी के इस्तीफे से खाली हुई है. उन्होंने बीजेपी का अध्यक्ष बनने और राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद विधायक पद से इस्तीफा दे दिया था. आम तौर पर इसे एक सुरक्षित सीट माना जाता है. लेकिन अब इस सीट के उपचुनाव में लोगों की दिलचस्पी काफी बढ़ गई है, क्योंकि जन सुराज के प्रशांत किशोर ने वहां से चुनाव लड़ने की घोषणा की है. यह चुनावी मैदान में उनकी पहली एंट्री है. 

बिहार में 2025 के विधानसभा चुनाव  में प्रशांत किशोर ने अपनी उम्मीदवारी को लेकर अटकलें पैदा कीं, लेकिन अंततः वे चुनाव मैदान में नहीं कूदे. जन सुराज ने बड़े पैमाने पर चुनाव लड़ा. लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पाई. उनके चुनाव न लड़ने के फैसले को पार्टी के खराब प्रदर्शन के कारणों में से एक माना गया. इसने पार्टी की विश्वसनीयता को उस स्थिति की तुलना में ज्यादा नुकसान पहुंचाया जो शायद अन्यथा होता.

इसलिए, बाकीपुर कोई रोमांटिक अंदाज वाली शुरुआत नहीं है. यह पहली बार नाकाम रहने के बाद खुद को सुधारने की कोशिश है. जिस राजनीतिक रणनीतिकार ने कभी राजनीतिक दलों को जीतने के तरीके बताए थे, उसे अब यह साबित करना है कि वह खुद कैसे चुना जा सकता है.

कांग्रेस के वॉर रूम से बिहार की गलियों तक में 

किशोर के राजनीतिक सफर में एक बात खास तौर पर नजर आती है. साल 2021-2022 में, जब कांग्रेस के साथ उनकी बातचीत गंभीर लग रही थी, तो मुख्य मुद्दा यह नहीं था कि उनके पास आइडिया है या नहीं. कांग्रेस को उनकी काबिलियत पर कोई शक नहीं था. समस्या अधिकार को लेकर थी.

Prashant Kishor, Bankipur Assembly Seat, Patna

प्रशांत किशोर पहली बार कोई चुनाव लड़ रहे हैं. इसलिए पार्टी और एक नेता के रूप में यह चुनाव उनके लिए परीक्षा होगा.

खबरों के मुताबिक, किशोर पार्टी की राजनीतिक रणनीति, गठबंधन बनाने और चुनावी मशीनरी को नए सिरे से तैयार करने के लिए पूरी आजादी चाहते थे. कांग्रेस, अपने जाने-पहचाने अंदाज में, पैनल बनाने के लिए तो तैयार दिखी, लेकिन उन्हें वैसी आजादी देने को तैयार नहीं थी जैसी वह चाहते थे. उनको लेकर चिंता इस बात की थी कि उन्हें किस रूप में देखा जाए सलाहकार, पदाधिकारी, सदस्य, रणनीतिकार या व्यवस्था में खलल डालने वाले शख्स के तौर पर. 

कांग्रेस से किशोर का अलग होना केवल बातचीत का नाकाम होना नहीं था; यह एक मनोवैज्ञानिक बदलाव भी था. अगर स्थापित पार्टियां उन्हें बदलने का अधिकार नहीं देंगी, तो वह अपना खुद का मंच बनाएंगे. 'जन सुराज' इसी सोच का नतीजा है.

प्रशांत के बांकीपुर में जीतने की कितनी संभावना है 

प्रशांत किशोर के लिए बांकीपुर एक आकर्षक चुनाव मैदान है. यह पटना की सबसे चर्चित और वीआईपी शहरी सीटों में से एक है. यह पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है और राजधानी की राजनीतिक सोच का अहम केंद्र है. यह इलाका शहरी है, सबकी नजर में रहता है, मीडिया के लिए अनुकूल है और राजनीतिक रूप से जागरूक है. यहां के वोटर गवर्नेंस, जन-सेवाओं, भ्रष्टाचार, नौकरियों, इंफ्रास्ट्रक्चर और मिडिल क्लास की उम्मीदों जैसे मुद्दों पर प्रतिक्रिया दे सकते हैं. जो नेता सिस्टम और सरकारी क्षमता की बात करता है, उसके लिए बांकीपुर एक ऐसा चुनावी क्षेत्र है, जहां लोग उसकी बात को समझ सकते हैं. लेकिन यह एक जाल भी है. बांकीपुर कोई नई या अनछुई जमीन नहीं है. वह बीजेपी का गढ़ है और ज्यादातर पैमानों पर देखा जाए तो यह एक बहुत मजबूत गढ़ है.

बांकीपुर सीट 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई थी. उससे पहले, यह इलाका पटना पश्चिम विधानसभा सीट का हिस्सा था. 1980 के दशक में यहां कांग्रेस और जनता दल का प्रभाव दिखता था. लेकिन 1990 के दशक के मध्य से, यह चुनावी क्षेत्र और उससे पहले का इलाका तेजी से बीजेपी की ओर झुका. साल 1995 में बीजेपी नेता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा यहां से जीते. वो 2005 तक विधायक रहे. उनके निधन के बाद, बेटे नितिन नवीन को यह सीट राजनीतिक विरासत में मिली. पिता और पुत्र, दोनों ने मिलकर इस शहरी सीट पर बीजेपी का लगभग लगातार कब्जा बनाए रखा. नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा चार बार जीते और नितिन नवीन ने पांच बार जीत दर्ज की. 1985 के बाद से दो मौकों को छोड़कर, बीजेपी हर बार बांकीपुर से जीती है. वोटिंग फीसद अक्सर कम रहा है, लेकिन BJP की जीत बहुत जबरदस्त रही है.

बांकीपुर का चुनाव परिणाम प्रशांत किशोर को क्या देगा

एक उपचुनाव से बिहार की सत्ता का ढांचा नहीं बदलेगा. सरकार नहीं गिरेगी. विपक्ष फिर से खड़ा नहीं होगा. बांकीपुर से राज्य का नक्शा नहीं बदलेगा. लेकिन यह किशोर की विश्वसनीयता को नया रूप दे सकता है.

अभी दांव पर विधायी सत्ता नहीं, बल्कि राजनीतिक गंभीरता है. 2025 के बाद 'जन सुराज' के लिए सबसे बड़ी चुनौती हारना नहीं है. नई पार्टियां हारती हैं. उसकी गहरी समस्या यह है कि इसने अपनी बौद्धिक और नैतिक ऊर्जा को पर्याप्त चुनावी ताकत में नहीं बदला. उसे वोट कम मिले, लेकिन चर्चा ज्यादा हुई. बांकीपुर इस कमी को दूर कर सकता है.

यह जीत किशोर को एक राजनीतिक रणनीतिकार से सत्ता के दावेदार में बदल देगी. इससे उन्हें विधानसभा का मंच, लगातार पहचान और एक सीधा चुनावी क्षेत्र मिलेगा. इससे उनके विरोधियों की उस दलील की हवा भी निकल जाएगी कि वे केवल वोट कटवा या मीडिया-प्रेमी चुनावी रणनीतिकार हैं, जो असली राजनीति में टिक नहीं सकता है.

बांकीपुर में उनका सम्मानजनक प्रदर्शन भी मायने रखेगा. अगर प्रशांत किशोर बीजेपी की जीत की मार्जिन को बिगाड़ देते हैं, शहरी सत्ता-विरोधी रुझान को एकजुट कर पाते हैं या किसी अहम सीट पर विपक्ष से आगे निकल जाते हैं तो वह यह कह सकेंगे कि 'जन सुराज' को अपना शुरुआती चुनावी क्षेत्र मिल गया है-शहरी, महत्वाकांक्षी, बेचैन और सुशासन-केंद्रित अपील को अपनाने वाला. लेकिन कमजोर नतीजे बहुत बुरे साबित होंगे. इससे पता चलेगा कि बिहार प्रशांत किशोर की बात तो सुनता है, लेकिन अभी सत्ता सौंपने के लिए उन पर भरोसा नहीं करता है.

बीजेपी की नजर किस चीज पर रहेगी 

बांकीपुर की बात करें तो यहां बीजेपी की एक बड़ी रणनीति भी काम कर रही है. साल 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को अपने दम पर बहुमत नहीं मिला था, इसलिए वह लोकसभा के ऐसे उपचुनावों को लेकर सतर्क रही है, जिनसे बचा जा सकता है. हर संसदीय सीट कीमती होती है. यही वजह है कि पार्टी ने आमतौर पर सांसदों को राज्य की भूमिकाओं या संवैधानिक पदों पर भेजकर लोकसभा में अनावश्यक रूप से सीटें खाली करने से परहेज किया है.

BJP, Nitin Nabin

बांकीपुर में बीजेपी की कोशिश जीत की अपनी लय को बरकरार रखने की होगी. वह वहां 1995 से जीतती आ रही है.
Photo Credit: Nitin Nabin X

बिहार में विधानसभा का गणित ज्यादा राहत देने वाला है. बीजेपी ऐसी स्थिति में है कि वह सहयोगियों के साथ सरकार में बनी रह सकती है, बिना लोकसभा जैसी सीट-दर-सीट चिंता के. शायद यही वजह है कि नितिन नवीन को बांकीपुर से हटाकर राज्यसभा भेजा गया.बीजेपी को भरोसा है कि वह बांकीपुर सीट अपने पास बनाए रख सकती है.

विपक्ष भी प्रशांत किशोर पर उतनी ही दिलचस्पी से नजर रखेगा. कांग्रेस उनका समर्थन करने के बारे में सोच रही थी, लेकिन उसके सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल ने अपना उम्मीदवार उतार दिया है. ऐसे में त्रिकोणीय मुकाबला बीजेपी का काम आसान बना सकता है. लेकिन इससे किशोर को वह भी मिलता है जिसकी उन्हें सबसे अधिक चाहत है, एक ऐसा मंच जहां वे बिहार की राजनीति के केवल दर्शक नहीं, बल्कि मुख्य किरदार हों.

आरजेडी के नेतृत्व वाले विपक्ष के लिए प्रशांत किशोर का उभार एक अलग तरह की चिंता लेकर आता है. हो सकता है कि प्रशांत किशोर तुरंत पूरे राज्य में बीजेपी को न हरा पाएं, लेकिन वे बीजेपी-विरोधी खेमे में हलचल पैदा कर सकते हैं. बिहार में विपक्ष की राजनीति अक्सर इस धारणा पर टिकी रही है कि सरकार से नाराजगी अंततः जाने-पहचाने एनडीए-विरोधी दलों की ओर ही मुड़ेगी. 'जन सुराज' इस धारणा को चुनौती देता है.

प्रशांत किशोर के मुद्दे क्या हैं

प्रशांत किशोर हमेशा से राजनीति में खाली जगहों को पहचानने में माहिर रहे हैं. बिहार में ऐसी कई जगहें हैं. लोग वंशवाद के हक से ऊब चुके हैं. वे प्रशासनिक ठहराव से परेशान हैं. पलायन,परीक्षा को लेकर अनिश्चितता, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, चरमराती सार्वजनिक सेवाओं और इस पुरानी दलील से भी लोग थक चुके हैं कि बिहार को डर और जानी-पहचानी चीज़ों में से ही किसी एक को चुनना होगा.

जन सुराज लोगों की इसी थकान और निराशा को संबोधित करता है. यह सुशासन, सम्मान, शिक्षा, रोजगार और स्थानीय समस्याओं के समाधान की बात करता है. यह मतदाताओं से पुरानी वफादारियों से आगे बढ़कर सोचने को कहता है. लेकिन बिहार केवल लोगों की थकान या निराशा से नहीं चलता. वह सामाजिक गठबंधनों से चलता है. लालू प्रसाद यादव ने केवल सामाजिक न्याय की बात नहीं की, वे पिछड़े वर्गों के हक की आवाज और पहचान बन गए. नीतीश कुमार ने केवल सुशासन पर जोर नहीं दिया, कुछ समय के लिए वे अव्यवस्था को ठीक करने वाले प्रशासनिक सुधारक बन गए. बीजेपी केवल राष्ट्रवाद और आकांक्षाओं की बात नहीं करती है, वह विचारधारा को बूथ-स्तर के संगठन के साथ जोड़ती है.

rjd, tejashwi yadav, Bihar

राष्ट्रीय जनता दल ने बांकीपुर उपचुनाव में अपना उम्मीदवार उतारकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है.
Photo Credit: Tejashwi Yadav X

किशोर किसका प्रतिनिधित्व करते हैं? यह एक अनसुलझा सवाल है.

कोई पार्टी हमेशा अपने संस्थापक की बुद्धिमत्ता के सहारे नहीं चल सकती. उसे स्थानीय संरक्षकों, जिला स्तर के नेताओं, जातियों के बीच पुल का काम करने वालों, बूथ कार्यकर्ताओं, छोटे दानदाताओं, लोगों की शिकायतों को सुनने वालों और ऐसे उम्मीदवारों की जरूरत होती है, जो संस्थापक की छाया के बिना भी अपनी पहचान बनाए रख सकें.

बांकीपुर शायद किशोर को पहली चुनावी जीत दिला दे. लेकिन अकेले इससे जन सुराज को सामाजिक आधार नहीं मिलेगा. वह काम लंबा, धीमा और कम आकर्षक है.

(डिस्क्लेमर: लेखक देश के जाने-माने पत्रकार, राजनीतिक समिक्षक और लेखक हैं. वो कांग्रेस की राजनीति के जानकार हैं. उन्होंने '24 अकबर रोड', 'सोनिया: ए बायोग्राफी' जैसी कई किताबें भी लिखी हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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