यह ख़बर 19 नवंबर, 2014 को प्रकाशित हुई थी

बात पते की : राम का नाम बदनाम न करो

बात पते की : राम का नाम बदनाम न करो

हिसार में बाबा रामपाल के समर्थक (फाइल फोटो)

नई दिल्ली:

वो कौन लोग हैं जो रामपाल जैसे किसी बाबा को अपना गुरु मान बैठते हैं और उसके लिए अपनी जान देने की बात करते हैं। रैप गाने वाला और फिल्मों में काम करने का शौकीन कोई बाबा राम रहीम कैसे हज़ारों लोगों की श्रद्धा के केंद्र में चला आता है।

यह कैसी अंधी आस्था है जो धर्म के नाम पर चल रहे इन डेरों−डंडों में अपने भगवान खोजती है और उनसे किसी चमत्कार की उम्मीद में कभी−कभी अपना सबकुछ गवां बैठती है, क्या ये भोले और नादान लोग हैं जिन्हें सदियों से चले आ रहे अंधविश्वास इन बाबाओं तक भटकाते हुए ले आते हैं या फिर दुनिया के तमाम मोर्चों पर नाउम्मीदी इन्हें फिर से धर्म और देवताओं की शरण में जाने को मजबूर करती है, कहते हैं जब सारे भरोसे टूट जाते हैं तो इंसान धर्म और भगवान की शरण में जाता है।

लेकिन, यह भोला भक्त भूल जाता है कि देवता भी बस उम्मीद बंधाते हैं आते नहीं हैं और धर्म इस दौर में कई तरह की ठेकेदारियों का दूसरा नाम हो गया है।

लेकिन, ये कमज़ोर और गरीब अकेले नहीं हैं जो बाबाओं के दरवाज़े आकर गुहार लगाते हैं हिंदुस्तान के डरे हुए अमीर भी इन बाबाओं के दरबार में जाते हैं− इस भरोसे से कि बाबा उनके पाप छुपा लेंगे दुनिया में उनकी सारी गलत−सही हरक़तों के लिए कवच का काम करते रहेंगे।

इस ढंग से देखें तो हिंदुस्तान की सामाजिक−आर्थिक विडंबनाएं उसकी आध्यात्मिक विडंबनाओं में भी बदल रही हैं। अपने पर भरोसा रखने वाला सहज आस्थाओं वाला एक मुल्क ढोंगी बाबाओं के चक्कर में पड़ रहा है।

ये बाबा देह का इलाज भी करना चाहते हैं और देश का भी ये अध्यात्म की दुकान भी लगाए बैठे हैं राजनीति के गलियारे में भी झांकते रहते हैं− और इन सबके बीच अपने−आप को भगवान भी घोषित कर देते हैं। अंतत हम पाते हैं कि जिस लोभ−लालच और माया से मुक्त होने का उपदेश ये बाबा देते हैं ख़ुद उसी में आकंठ डूबे रहते हैं तमाम तरह के पाप करते हैं और एक दिन मुजरिम की तरह पकड़े भी जाते हैं।

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संकट यह है कि बाबाओं और धर्म के ये पाखंड इसलिए भी कायम रहते हैं कि दूसरे तमाम तरह के पाखंडों को जैसे हमने सामाजिक स्वीकृति दे रखी है। इनसे निजात मिले तो बाबाओं से भी मुक्ति मिले।