- बिहार के पूर्णियां में सिकलीगढ़ को पहली होलिका दहन स्थल माना जाता है जहां भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लिया था
- सिकलीगढ़ नरसिंह मंदिर परिसर में लगभग चौदह सौ ग्यारह इंच लंबा माणिक्य स्तंभ है जिसे मुगल भी नहीं हिला सके
- मंदिर परिसर में हिरण्यकश्यप के किले के अवशेष और वह गुफा है जहां उन्होंने भगवान शिव की तपस्या की थी
होली का त्योहार पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि वह स्थान कहां है, जहां पहली बार होलिका दहन हुआ था? बिहार के पूर्णियां जिले के बनमखी प्रखंड में स्थित सिकलीगढ़ धरहरा को वह पावन भूमि माना जाता है. मान्यता है कि यहां भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए स्वयं भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लिया था.
माणिक्य स्तंभ: मुगल भी जिसे हिला न सके
सिकलीगढ़ धरहरा स्थित प्रसिद्ध नरसिंह मंदिर के परिसर में आज भी वह 'माणिक्य स्तंभ' मौजूद है, जिसे चीरकर भगवान विष्णु नरसिंह अवतार में प्रकट हुए थे. इस स्तंभ से जुड़ी कुछ अद्भुत बातें इसे रहस्यमयी बनाती हैं. इस स्तंभ की लंबाई लगभग 1411 इंच है, जिसका अधिकांश हिस्सा जमीन के नीचे धंसा हुआ है. कहा जाता है कि मुगल काल में हाथियों की मदद से इस स्तंभ को उखाड़ने या गिराने का प्रयास किया गया था, लेकिन यह टस से मस नहीं हुआ. आज भी यह स्तंभ थोड़ा झुका हुआ है, जो उस संघर्ष की गवाही देता है.

मंदिर परिसर में आज भी राजा हिरण्यकश्यप के किले के जर्जर अवशेष और वह गुफा मौजूद है, जहां उसने भगवान शिव की तपस्या की थी. वर्तमान में यह गुफा पुरातत्व विभाग की निगरानी में है.
होलिका दहन की पौराणिक कथा
पैराणिक कथा के अनुसार, अत्याचारी राजा हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को मारने के लिए अपनी बहन होलिका को उसे गोद में लेकर अग्नि में बैठने का आदेश दिया था. होलिका के पास एक विशेष चादर थी जो उसे आग से बचाती थी.

लेकिन जैसे ही प्रह्लाद को मारने का प्रयास हुआ, राजमहल का खंभा फट गया और भगवान नरसिंह प्रकट हुए. उस क्षण होलिका की चादर उड़ गई और वह जलकर भस्म हो गई, जबकि भगवान की कृपा से भक्त प्रह्लाद सुरक्षित रहे. इसी विजय की स्मृति में यहां देश का सबसे प्रमुख होलिका दहन आयोजित किया जाता है.
खास परंपरा: राख और कीचड़ से 'धुरखेल'
सिकलीगढ़ धरहरा की होली अपनी अनूठी परंपरा के लिए भी प्रसिद्ध है. यहां होलिका दहन के बाद उसकी राख को विजय के प्रतीक के रूप में उड़ाया जाता है. लोग मिट्टी और कीचड़ के साथ होली खेलते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में 'धुरखेल' कहा जाता है. यह परंपरा सदियों से चली आ रही है.

राजकीय महोत्सव का दर्जा
इस स्थान की ऐतिहासिक महत्ता को देखते हुए बिहार सरकार ने वर्ष 2017 में इसे 'राजकीय समारोह' का दर्जा दिया था. मुख्य कारीगर गोपाल सहनी पिछले 20 वर्षों से यहां होलिका का पुतला बना रहे हैं. यहां हर साल करीब 45 फीट ऊंची होलिका तैयार की जाती है. दावा किया जाता है कि देश में कहीं भी इतना विशाल होलिका दहन नहीं होता.
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