बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में प्रशांत किशोर को जीत मिली है. सालों तक चुनावी रणनीतिकार के तौर पर काम करने वाले प्रशांत किशोर अब माननीय विधायक के तौर पर बिहार विधानसभा में बैठेंगे. यह जीत ऐसी है कि यदि प्रशांत किशोर की जीत के चर्चे हैं तो उससे कहीं ज्यादा भाजपा की हार के भी चर्चे होंगे. ऐसा इसलिए क्योंकि यह सीट बीते 20 सालों से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के पास थी. 2006 में वह यहां से जीते थे, जब यह सीट पश्चिम पटना कहलाती थी. उनसे पहले 1995 के बाद से लगातार नितिन नवीन के पिता नवीन किशोर सिन्हा विधायक रहे थे. फिर पिता के निधन के बाद नितिन नवीन यहां से लगातार चुने जाते रहे.
उन्हें इसी साल भाजपा का अध्यक्ष चुना गया और फिर वह राज्यसभा सांसद बन गए तो बांकीपुर सीट से वह दूर हटे. माना जा रहा था कि नितिन नवीन की विरासत वाली सीट है तो भाजपा के लिए जीतना आसान होगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और नतीजा चौंकाने वाला रहा है. यहां पर प्रशांत किशोर ने बड़ी जीत हासिल कर ली है. यह पीके के राजनीतिक करियर के लिए मील का पत्थर है तो वहीं भाजपा के लिए यह नतीजा कई सवाल छोड़ने वाला है. आखिर 30 साल की विरासत वाली इस सीट पर भाजपा क्यों हार गई? वह भी तब जबकि 200 से ज्यादा विधायकों के साथ भाजपा और जेडीयू की गठबंधन सरकार बिहार की सत्ता में है.
इसका एक कारण चेहरा भी है. नितिन नवीन जब दिल्ली की राजनीति में शिफ्ट हुए तो बांकीपुर से उतारे गए भाजपा कैंडिडेट काफी कमजोर नजर आए. भाजपा ने नीरज सिन्हा को उतारा, जो मंडल लेवल के कार्यकर्ता हैं. उनका पहले का कोई चुनावी अनुभव नहीं था. इसके अलावा प्रशांत किशोर जब खुद उतरे तो उनके मुकाबले प्रचार, भाषण और रणनीति में कमजोर दिखे. वहीं प्रशांत किशोर ने पूरे चुनाव में सकारात्मक प्रचार किया. वह लगातार अपने एजेंडे के बारे में बात करते रहे, लेकिन भाजपा पर निशाना नहीं साधा. यही नहीं नितिन नवीन पर भी निजी हमले करने से वह बचते दिखे.
पूरा चुनाव दोतरफा ही रहा और विजेता बनकर निकले पीके
इस चुनाव में प्रशांत किशोर की एक सफलता यह भी रही कि उन्होंने चुनाव को दोतरफा ही रहने दिया. पूरे चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल मुकाबले में कभी नहीं दिखी. आरजेडी कैंडिडेट रेखा कुमारी को 10 हजार के आसपास वोट ही मिल पाए. ऐसे में दोतरफा मुकाबले में बड़ा वोट प्रशांत किशोर के साथ ही गया. अहम बात यह भी है कि पीके ब्राह्मण समुदाय से आते हैं.
पीके के नाम पर भाजपा नहीं चला सकी जंगलराज के डर जैसा कार्ड?
भले ही वह जाति की राजनीति न करने की बात करते हैं, फिर भी यह सच है कि वह सवर्ण जाति से आते हैं. इसीलिए भाजपा के वोटरों का भी एक हिस्सा उनकी तरफ चला गया. पीके को जिताने में भाजपा के वोटरों को वह रिस्क भी नहीं दिखता, जो आरजेडी के जंगल राज के नाम पर बताया जाता है. ऐसे में पीके की साफ इमेज, पॉजिटिव कैंपेन ने उन्हें फायदा पहुंचाया. इसके अलावा भाजपा की ओर से एक सामान्य कार्यकर्ता को उतारने की रणनीति ही भारी पड़ गई और पीके का करिश्मा भारी पड़ गया.
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