- बिहार की राजनीति में खरमास की अवधि खत्म होते ही सभी प्रमुख पार्टियां संगठनात्मक गतिविधियों को तेज़ कर रही हैं
- भाजपा ने संजय सरावगी को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया है और संगठन में युवा तथा ज़मीनी कार्यकर्ताओं को बढ़ावा देगी
- जनता दल यूनाइटेड सदस्यता अभियान चला रही है जिससे पंचायत स्तर तक संगठन को मजबूत और सक्रिय बनाने का प्रयास है
खरमास की अवधि खत्म होते ही बिहार की राजनीति में एक बार फिर संगठनात्मक गतिविधियां तेज़ होने जा रही हैं. सत्ताधारी दल हों या विपक्ष, लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियां अपने-अपने संगठन को मज़बूत करने की तैयारी में जुट गई हैं. आने वाले हफ्तों में भाजपा, जदयू और राजद में फेरबदल, नई नियुक्तियां और संगठन विस्तार की तस्वीर साफ दिखाई देने लगेगी.बिहार की राजनीति में संगठन की भूमिका हमेशा से अहम रही है. यहां चुनाव सिर्फ बड़े नेताओं के भाषणों से नहीं जीते जाते, बल्कि बूथ स्तर के कार्यकर्ता, पंचायत और प्रखंड इकाइयों की सक्रियता ही असली ताकत बनती है. यही वजह है कि चुनाव से पहले हर पार्टी संगठन को दुरुस्त करने में पूरी ताकत झोंक देती है. खरमास के दौरान राजनीतिक गतिविधियां आमतौर पर धीमी रहती हैं, लेकिन इसके बाद बैठकों, नियुक्तियों और अभियानों का दौर शुरू हो जाता है.
भारतीय जनता पार्टी में संगठनात्मक बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. पार्टी ने हाल ही में संजय सरावगी को बिहार भाजपा का नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया है. अब खरमास के बाद उनकी सबसे बड़ी चुनौती होगी, अपनी पूरी टीम तैयार करना. भाजपा सूत्रों के मुताबिक, नए प्रदेश अध्यक्ष संगठन में ताज़गी लाने के लिए कई स्तरों पर बदलाव कर सकते हैं. जैसे प्रदेश पदाधिकारियों की नई सूची, कई जिलों में नए जिलाध्यक्ष और मंडल और बूथ स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ताओं को ज़िम्मेदारी देने की चर्चा है.
पार्टी नेतृत्व चाहता है कि संगठन में युवा चेहरे और ज़मीनी कार्यकर्ताओं को आगे लाया जाए. साथ ही, जातीय और क्षेत्रीय संतुलन का भी ध्यान रखा जाएगा, ताकि हर इलाके और वर्ग को प्रतिनिधित्व मिल सके. भाजपा के अंदर यह भी चर्चा है कि नए प्रदेश अध्यक्ष के नेतृत्व में संगठन को ज़्यादा अनुशासित और सक्रिय बनाया जाएगा. कमजोर जिलों की पहचान कर वहां विशेष ध्यान दिया जाएगा. पार्टी का मानना है कि मज़बूत संगठन ही सरकार और गठबंधन की सबसे बड़ी ताकत है.
पार्टी का मानना है कि सरकार में रहते हुए संगठन को मज़बूत रखना और भी ज़रूरी हो जाता है.सूत्रों के मुताबिक, सदस्यता अभियान के बाद जदयू में भी कुछ संगठनात्मक फेरबदल हो सकते हैं. जिला और प्रखंड स्तर पर नए पदाधिकारी बनाए जा सकते हैं. इससे पार्टी को ज़मीनी स्तर पर नई ऊर्जा मिलने की उम्मीद है.
विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल में भी संगठनात्मक बदलाव की तैयारी चल रही है. पार्टी नेतृत्व मानता है कि आने वाले चुनावों में सरकार को चुनौती देने के लिए मजबूत संगठन बेहद ज़रूरी है. राजद इस समय संगठन की समीक्षा कर रही है. राजद कमजोर जिलों में नए प्रभारी, युवा और छात्र संगठनों को सक्रिय करना और ज़मीनी कार्यकर्ताओं को ज़्यादा महत्व देना जैसे कदम उठा की सोच रही है. पार्टी सूत्रों का कहना है कि कई जगहों पर संगठन सुस्त पड़ा है, जिसे अब सक्रिय किया जाएगा.
राजद में बदलाव के दौरान सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन पर भी खास ध्यान दिया जाएगा. पार्टी यह सुनिश्चित करना चाहती है कि हर वर्ग और इलाके को संगठन में उचित जगह मिले. इससे पार्टी का आधार और मज़बूत हो सके. दिलचस्प बात यह है कि सत्ताधारी और विपक्षी दलों की सोच इस मामले में काफ़ी हद तक एक जैसी है. सभी मानते हैं कि चुनाव से पहले संगठन मज़बूत होना चाहिए, कार्यकर्ताओं में जोश और भरोसा होना चाहिए और ज़मीनी स्तर पर पकड़ मज़बूत होनी चाहिए . इसीलिए खरमास के बाद बैठकों, दौरों और अभियानों की संख्या बढ़ेगी.
यह संगठनात्मक दौर इस बात का संकेत है कि बिहार की राजनीति अब लंबे चुनावी मोड में प्रवेश कर चुकी है. भले ही चुनाव में अभी समय हो, लेकिन पार्टियां अभी से तैयारी में जुट गई हैं. जिस पार्टी का संगठन ज़्यादा मज़बूत होगा, उसे आने वाले समय में राजनीतिक बढ़त मिलने की संभावना भी उतनी ही ज़्यादा होगी. कुल मिलाकर, खरमास के बाद बिहार में संगठनात्मक सियासत एक बार फिर तेज़ होने जा रही है.
भाजपा नए प्रदेश अध्यक्ष के नेतृत्व में अपनी टीम बनाएगी, जदयू सदस्यता अभियान के ज़रिये संगठन का विस्तार करेगी और राजद भी बदलाव कर संगठन को मज़बूत करने की कोशिश करेगी. आने वाले हफ्तों में यह साफ हो जाएगा कि कौन-सी पार्टी संगठन के मोर्चे पर सबसे मज़बूत होकर उभरती है. यही संगठन आगे चलकर चुनावी मैदान में पार्टियों की असली ताकत साबित होगा.
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