- बिहार के पूर्वी चंपारण के किसान बाल किशुन राम ने अपनी दिवंगत पत्नी की याद में 65 फुट ऊंचा भव्य मंदिर बनवाया है
- यह मंदिर प्रेम, समर्पण और भावनाओं का प्रतीक है, जिसे स्थानीय लोग चंपारण का ताजमहल कहकर सम्मानित करते हैं
- मंदिर के गर्भगृह में देवी-देवता की जगह शारदा देवी की प्रतिमा स्थापित की गई है जो इसे अनोखा बनाती है
बिहार के पूर्वी चंपारण से एक बेहद भावुक और अनोखी कहानी सामने आई है. जहां बाल किशुन राम नाम के एक किसान ने अपनी दिवंगत पत्नी की याद में ऐसा कदम उठाया है, जिसे जानकर हर कोई हैरान है. उन्होंने अपने प्रेम को एक अनोखे रूप में साकार कर एक ऐसी मिसाल कायम की है जो दिल छू लेने वाली है.

पत्नी की याद में बनाया 65 फुट ऊंचा भव्य मंदिर
पूर्वी चंपारण जिले के रहने वाले बाल किशुन राम ने अपनी पत्नी शारदा देवी के निधन के बाद उनकी स्मृति में 65 फुट ऊंचा भव्य मंदिर बनाया है. यह मंदिर महज एक संरचना नहीं, बल्कि गहरे प्रेम, समर्पण और अटूट भावनाओं का प्रतीक बन चुका है. स्थानीय लोग इसे देखकर इसे “चंपारण का ताजमहल” कहने लगे हैं. इतिहास में मुगल सम्राट शाहजहां ने मुमताज की याद में ताजमहल बनवाया था. उसी तरह आज एक साधारण किसान ने अपने प्रेम को अमर कर दिया है. इस मंदिर का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है.

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शोक से उभरा प्रेम और संकल्प
इस मामले की जानकारी के अनुसार, कुछ वर्ष पहले शारदा देवी का निधन हो गया था. इसके बाद बाल किशुन राम लंबे समय तक सदमे में रहे. धीरे-धीरे खुद को संभालने के बाद उन्होंने तय किया कि वह अपनी पत्नी की यादों को सिर्फ दिल तक सीमित नहीं रखेंगे. वे कुछ ऐसा करेंगे जो उनके प्रेम को हमेशा जीवित रखे.

मंदिर की अनोखी विशेषताएं
किसान द्वारा निर्मित यह मंदिर सामान्य मंदिरों से बिल्कुल अलग दिखाई देता है. 65 फुट ऊंचा निर्माण, जो इलाके की सबसे आकर्षक संरचनाओं में शामिल हो गया है. मंदिर के गर्भगृह में देवी-देवता की प्रतिमा नहीं, बल्कि शारदा देवी की प्रतिमा स्थापित की गई है. मंदिर के निर्माण में बेहतरीन पत्थरों का उपयोग किया गया है, जो इसे भव्य स्वरूप देता है.

हर दिन होती है पूजा-अर्चना
बाल किशुन राम रोज मंदिर पहुंचकर अपनी पत्नी की प्रतिमा की पूरे सम्मान के साथ पूजा-अर्चना करते हैं. जैसे आमतौर पर मंदिरों में भगवान की सेवा होती है, वैसे ही वे अपनी पत्नी की यादों को सम्मान देते हैं.

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अटूट प्रेम और संघर्ष की कहानी
एक साधारण किसान के लिए इतना बड़ा मंदिर बनवाना आसान नहीं था. आर्थिक और मानसिक चुनौतियाँ सामने आईं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. ग्रामीण बताते हैं कि निर्माण के दौरान कई आर्थिक संकट आए, लेकिन बाल किशुन राम ने अपनी पूरी जमा-पूंजी और जीवनभर की कमाई लगा दी. दिन-रात मेहनत कर आखिरकार उन्होंने अपनी पत्नी की याद में इस अद्भुत “प्रेम मंदिर” का निर्माण पूरा किया.

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