- नीतीश कुमार ने लगभग तीन दशक तक बिहार में राजनीति की, जिसमें उन्होंने कई बार मुख्यमंत्री पद संभाला
- नीतीश ने लालू यादव को 1990 में मुख्यमंत्री बनाने में मदद की, लेकिन बाद में बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया था
- 2005 में नीतीश ने पहली बार CM के रूप में एनडीए की सरकार बनाई, जिससे बिहार में बीजेपी की स्थिति सुदृढ़ हुई
नीतीश कुमार अगले कुछ महीनों के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे, यह बात बिहार की जनता पचा नहीं पा रही है. मगर धीरे-धीरे इस बात के लिए भी अपने को तैयार कर रही है कि बिहार में नीतीश कुमार के युग का अंत हो रहा है. नीतीश कुमार के तीन दशक की राजनीति के बारे में लिखा जाए, तो वो इतना नीरस नहीं होगा कि अमुक साल में जीते फिर मुख्यमंत्री बने, फिर 20 साल तक बनते ही रहे और बिहार को कहां से कहां तक पहुंचा दिया. इतने काम किए और अब मुख्यमंत्री पद छोड़ कर राज्यसभा जा रहे हैं. जी नहीं, इतना आसान और सरल नहीं है नीतीश कुमार की राजनीतिक पारी.
इमोशन, ड्रामा और दुश्मनी
नीतीश कुमार की राजनीतिक पारी एक हिंदी सिनेमा से कम नहीं हैं, उसमें इमोशन है, ड्रामा है, बार बार पलट कर बदला लेना है, दोस्ती है तो दुश्मनी भी है और बदला भी है. किसी पर भरोसा ना करने की नीति भी है तो पुराने दोस्त छोड़ कर नए दोस्त बनाने का माद्दा भी. एक योद्धा की तरह दो दशकों तक एकछत्र राज चलाने की कहानी है नीतीश कुमार, तो अंत में सब कुछ छोड़ कर बेटे को हवेली की चाबी देकर नेपथ्य में जाने की कहानी का नाम भी है नीतीश कुमार.

तब लालू को बनवाया था मुख्यमंत्री
कहानी की शुरुआत होती है 1990 से जब नीतीश कुमार ने लालू यादव को मुख्यमंत्री बनाने में मदद की, तब शायद नीतीश कुमार को लग रहा था कि लालू यादव के सहारे ही वो बिहार में राजनीति की सफलता की सीढ़ी चढ़ पाएंगे. वजह भी साफ थी 18 फीसदी यादव के सामने 3 फीसदी कुर्मी वोट काफी कम था. मुख्यमंत्री बनने के लिए. वी पी सिंह राम सुंदर दास को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे, जबकि देवीलाल, लालू यादव को बनाना चाहते थे. मगर चंद्रशेखर रघुनाथ झा को मुख्यमंत्री देखना चाहते थे. मुख्यमंत्री पद के लिए वोटिंग हुई, नीतीश कुमार, लालू यादव के साथ रहे और लालू यादव मुख्यमंत्री बने.
नीतीश फिर बीजेपी के करीब आए
फिर नीतीश कुमार, लालू यादव से अलग हो गए. ऊंची जाति के खिलाफ पिछड़ी जाति का गठबंधन टूटने लगा. 1995 में नीतीश कुमार ने समता पार्टी बनाई और केवल 7 सीट ही जीत पाए. अब जरा सोचिए किसी भी नेता की हिम्मत टूट जाती यदि इतनी बड़ी हार मिलती, लेकिन नीतीश कुमार ने हार नहीं मानी. बिहार की जमीन नहीं छोड़ी लड़ते रहे. 1990 से 1995 फिर 1997 तक लालू यादव मुख्यमंत्री रहे. फिर राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनीं. 2000 का चुनाव हुआ, तब तक नीतीश कुमार समझ चुके थे कि यदि लालू यादव को हराना है, तो बीजेपी से हाथ मिलाना ही होगा. बीजेपी ने तब धीरे-धीरे बिहार में अपने पांव पसारने शुरू कर दिया थे. उसे तलाश थी एक मजबूत पिछड़े नेता की जो उन्हें नीतीश कुमार के रूप में मिला. तब तक दिल्ली में 13 दिन ,13 महीनों के बाद 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बन चुकी थी, जो पूरे पांच साल तक चली. इसने बीजेपी को बिहार में उदय होने का मौका दिया.

जब नीतीश केवल 7 दिन के लिए पहली बार बने CM
साल 2000 में नीतीश कुमार बीजेपी के साथ लड़े 121 सीटें मिली और नीतीश कुमार केवल 7 दिन के लिए पहली बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन सरकार गिर गई. लालू यादव ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया और फिर 2005 तक राबड़ी देवी मुख्यमंत्री रहीं. फिर 2005 के चुनाव के बाद जदयू 88 सीटों पर और बीजेपी 55 सीटों पर जीतीं और पहली बार बिहार में एनडीए की सरकार बनीं और नीतीश कुमार दूसरी बार मुख्यमंत्री बने. यही वजह है कि बिहार के कई जानकार मानते हैं कि नीतीश कुमार को बिहार में बीजेपी को स्थापित करने का श्रेय जाता है, जो 20 साल बाद अब उसी नीतीश कुमार को हटा कर अपना मुख्यमंत्री बनाने जा रही है.
लालू के साथ मिलकर भी नीतीश ने लड़ा था चुनाव
नीतीश कुमार का बीजेपी के साथ ये गठबंधन इतना हिट हुआ कि 2010 में एनडीए ने इस बार से बढ़िया प्रदर्शन किया और 206 सीटें जीतीं. जदयू ने जीती 115 सीट और बीजेपी 91 सीट यानि बीजेपी अब बिहार में अपना पांव जमा चुकी थी. लालू यादव और रामविलास पासवान इकट्ठे लड़े थे और उन्हें मिली थीं सिर्फ 25 सीट. लेकिन फिर आता है कहानी में ट्विस्ट. केंद्र में बीजेपी ने 2013 में घोषित किया कि नरेन्द्र मोदी उनके प्रधानमंत्री उम्मीदवार होंगे. नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी से मंच साझा करने से भी परहेज किया और डिनर तक कैंसिल कर दिया. 2014 लोकसभा का चुनाव जदयू अकेले लड़े केवल दो सीटें जीते. मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया. 2015 का चुनाव आरजेडी के साथ मिलकर लड़े और इसका सूत्रधार रहे प्रशांत किशोर, इस बार आरजेडी और जदयू की सरकार बनी. तब पहली बार तेजस्वी यादव और तेज प्रताप भी मंत्रिमंडल में आए और उपमुख्यमंत्री बने.

सुशासन बाबू के बाद 'पलटू बाबू'
नीतीश कुमार ने उसके बाद साल 2017 में फिर पलटी मारी और बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई और तभी उन्हें बिहार में सुशासन बाबू के बाद 'पलटू बाबू' भी बुलाने लगे. लेकिन पिक्चर अभी खत्म नहीं हुई है, अभी बाकी है 2022 में नीतीश कुमार ने फिर पलटी मारी और महागठबंधन का हिस्सा बने और मुख्यमंत्री बने रहे. बिहार में तब तक चाय और पान दुकानों पर यह कहा जाने लगा कि सरकार कोई भी बने मुख्यमंत्री तो नीतीश कुमार ही होंगे. यह भी कहा जाने लगा कि बिहार में आप वोट किसी को भी दें मुख्यमंत्री तो नीतीश बाबू ही होंगे. इस बीच में नीतीश कुमार बीजेपी के खिलाफ एक गठबंधन में जुटे रहे. सोनिया गांधी, ममता बनर्जी, शरद पवार, उद्धव ठाकरे और अन्य नेताओं से मिले. ऐसा लगा कि नीतीश कुमार प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदार होंगे मगर फिर 2024 से पहले फिर पलट गए और एनडीए में चले गए. लोकसभा में मिलकर लड़े और 2025 में विधानसभा में 202 सीटें जीतीं और मुख्यमंत्री बने.
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नीतीश कुमार की सबसे बड़ी खूबी
नीतीश कुमार की सबसे बड़ी खूबी ये रही कि संख्या में कमजोर कुर्मी जाति से आने के बाद भी उन्होंने बिहार पर इतने दिनों तक राज किया. उन्हें मालूम था कि उनके अपने लिए एक अलग वोट बैंक बनाना पड़ेगा और उन्होंने वही किया. यादव के खिलाफ बाकी पिछड़ी जातियों को गोलबंद किया और उसमें से अति पिछड़ी जातियों को निकाल कर अलग से सुविधाएं दी. यह सब बिहार में कर्पूरी ठाकुर फार्मूले की तहत किया गया, उसी तरह दलितों के वोट का विभाजन किया और पासवान और रविदास जातियों को अलग कर महादलित बनाया. यही दोनों वोट बैंक नीतीश कुमार के लिए हमेशा खड़ा रहे. लालू यादव के राज का भय दिखाया गया, बार-बार जंगलराज बोला गया, जिससे महिलाओं का एक बड़ा तबका नीतीश कुमार के साथ जुड़ा जिसमें उनकी महिलाओं के लिए किए गए कल्याणकारी योजनाओं का भी बहुत योगदान रहा.

क्यों याद किया जाएगा नीतीश का शासनकाल
नीतीश कुमार के शासनकाल को याद किया जाएगा, बिहार में सड़कों का जाल बिछाने के लिए, पटना में मरीन ड्राइव बनाने के लिए, लड़कियों को साइकिल बांटने के लिए और शराबबंदी के लिए. नीतीश कुमार को बिहार में जातीय जनगणना के लिए भी याद किया जाएगा. इतना सब होने के बाद कई लोग मानते हैं कि उनकी विदाई और शानदार होनी चाहिए थी. मगर वहीं कई लोग मानते हैं कि यह सही समय है उनके विदाई कि क्योंकि अब स्वास्थ्य उनका साथ नहीं दे रहा है. अंत में इतना ही कहना चाहूंगा कि नीतीश कुमार ने बिहार को बहुत कुछ दिया, सबसे लंबे समय तक बिहार के मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड उनके पास रहेगा जो शायद ही टूटेगा. बिहार के लिए नीतीश कुमार ने जो किया उसके लिए बिहार उन्हें हमेशा आभारी रहेगा.
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