- अगले साल नागपुर में विकसित होने वाले रोबो सैनिक -40 डिग्री की ठंड में भी सीमा पर गश्त करने में सक्षम होंगे.
- सोलर ग्रुप द्वारा सोलर रोबोटिक्स और यूएवी विनिर्माण परियोजना का भूमिपूजन CM और केंद्रीय मंत्री ने किया.
- एंटी-ड्रोन भार्गवास्त्र सिस्टम चार-पांच महीनों में तैयार हो जाएगा. इससे 60 मिसाइलें एक साथ दागी जा सकेंगी.
माइनस 40 डिग्री की कड़ाके की ठंड में भी सीमा पर गश्त करने के लिए भारतीय रोबोट अगले साल नागपुर से आएंगे. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने शनिवार को नागपुर में यह कहा था. अब उनकी इस बात की पुष्टि नागपुर के सोलर ग्रुप के अध्यक्ष सत्यनारायण नुवाल ने की है. उन्होंने बताया कि अगले साल ऐसे पहले रोबोटिक जवान का प्रोटोटाइप बनकर तैयार हो जाएगा.
नागपुर के सोलर ग्रुप द्वारा शनिवार को 'सोलर रोबोटिक्स और यूएवी विनिर्माण परियोजना' (Solar Robotics and UAV Manufacturing Project) का भूमिपूजन किया गया. यह भूमिपूजन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के हाथों संपन्न हुआ. इसी परियोजना के माध्यम से अगले साल तक ऐसा पहला रोबोट तैयार होगा, जो भारत की सीमा पर माइनस 40 डिग्री की कड़ाके की ठंड में भी गश्त करने में सक्षम होगा.

जाबांज जवानों के बजाय रोबोट करेंगे काम: नुवाल
NDTV से एक खास बातचीत के दौरान सत्यनारायण नुवाल ने कहा कि “एक साल में यह फैसिलिटी पूरी होगी और उसके बाद 2 महीने में रोबोट का प्रोटोटाइप पूरा कर लेंगे. उत्तर पूर्वी सीमा पर जहां हमारे जवान माइनस 40 डिग्री कड़ाके की ठंड में गश्त देते हैं, वहीं सीमापार रोबोट दिखाई देते हैं. जब कुछ महीने पहले हमने सुना कि चीन ने रोबोट बनाया, वियतनाम ने बनाया और आज भी विपरीत परिस्थिति में हमारे जवान गश्त लगाते हैं. इस सोच के बाद यह काम शुरू किया. भीषण ठंड में हमारे जांबाज जवानों के बजाय रोबोट वहां काम करे, यह योजना है.”
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अगले कुछ महीने में 'भार्गवास्त्र' हो जाएगा सक्रिय
इतना ही नहीं दुनिया का सबसे अनोखा एंटी-ड्रोन सिस्टम अगले कुछ ही महीनों में चालू होने की संभावना है. उन्होंने बताया कि “अगले चार-पांच महीनों में भारत में 'भार्गवास्त्र' नामक एक ऐसी पहली और अनूठी एंटी-ड्रोन प्रणाली (Anti-Drone System) सक्रिय होने जा रही है, जो विकसित देशों के पास मौजूद प्रणालियों से भी अलग और विशिष्ट होगी. दुश्मन के ड्रोन हमलों को नाकाम करने के लिए इससे एक साथ साठ छोटी लेकिन अचूक मिसाइलें दागी जा सकेंगी.”
उन्होंने भरोसा दिलाया कि “भारत का यह पहला एंटी-ड्रोन सिस्टम 'भार्गवास्त्र' कई मायनों में दुनिया का पहला सिस्टम साबित होगा. इस सिस्टम के अब तक गोपालपुर और पोखरण में कुल चार सफल परीक्षण हो चुके हैं और आवश्यक रडार जल्द ही मिल जाएगा, जिसके चार महीने बाद यह एंटी-ड्रोन सिस्टम तैनाती के लिए तैयार होगा.”
रडार के कारण 'भार्गवास्त्र' में हो रही है देरी: नुवाल
देरी के कारणों की बात करते हुए उन्होंने बताया कि “किसी कारण से एक रडार की प्रतीक्षा है. चार महीने में डिलीवरी की बात की थी लेकिन अब सोलह महीने हो गए हैं. अब वो कह रहे हैं कि एक हफ्ते में डिलीवरी करेंगे. केवल उस रडार के लिए रुके हैं. पूरा भार्गवास्त्र तैयार है. रडार आने के बाद 2 या 3 महीने लगेंगे. यह हमारे कंपनी के लिए ही नहीं पूरे देश के लिए बहुत बड़ी बात होगी.”
उन्होंने कहा कि इसमें जो मिसाइल है उसकी लंबाई 700mm की है और पौने चार किलो वजन है. इसी में गाइडिंग सिस्टम है, सीकर है, जो एक बड़े से बड़े मिसाईल में है वो पूरा सिस्टम उसमें हैं और सबसे बड़ी बात यह कि 64 मिसाइल एक साथ फायर हो सकती है या जरूरत हो तो एक मिसाइल को भी फायर किया जा सकता है. ऐसा सिस्टम मुझे लगता है कि अभी तक कहीं बना नहीं है. यदि बन गया तो अपने आप में बहुत बड़ा है, यदि रडार आ गया तो इसका बनना पक्का है. चार पांच महीने में निश्चित रूप से तैयार कर लेंगे.
उन्होंने यह भी कहा कि “भारतीय सेना ने हमें 2.5 किलोमीटर की दूरी का लक्ष्य दिया था, लेकिन हमने 5 किलोमीटर की क्षमता वाला सिस्टम बनाया है, जिसे भविष्य में 30 किलोमीटर तक बढ़ाया जा सकता है.”
अगले वर्ष से 10,000 यूएवी मिलिट्री ड्रोन का उत्पादन: नुवाल
देश के निजी क्षेत्र में रक्षा उत्पादन करने वाला पहला और सबसे बड़ा नागपुर का सोलर ग्रुप है, जिसे नागास्त्र के पांच वेरिएंट्स और पिनाका जैसी मिसाइल्स के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए जाना जाता है. साल 2010 में जब देश में निजी क्षेत्र को रक्षा उत्पादों के निर्माण की अनुमति नहीं थी यानी लाइसेंस नहीं मिलता था, तब से ही सत्यनारायण नुवाल ने इस दिशा में पहल की. वे बताते हैं, कि “हम उम्मीद करते थे कि काश देश में कोई ऐसा नेता, कोई ऐसी सरकार आए जो इसकी अहमियत समझे, लेकिन उस समय रक्षा उत्पादनों के विषय में निजी क्षेत्र की भागीदारी पर देश का जोर नहीं था.”
वर्ष 2014 के अक्टूबर माह में उन्हें हरी झंडी मिली और इस ग्रुप ने जो रक्षा उत्पाद तैयार किए, उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर में जलवे बिखेरे. ऐसा भी कई बार हुआ है कि रक्षा संबंधी नए उत्पादों को कोई भी व्यावसायिक मांग या वादे के बगैर उन्होंने स्वयं मोटी लागत लगाकर विकसित किया और फिर उन्हीं उत्पादों ने किसी रक्षा ऑपरेशन या राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपना दमखम दिखाया. शनिवार को नागपुर में जिस प्लांट का भूमिपूजन हुआ वहां अगले वर्ष से दस हजार यूएवी मिलिट्री ड्रोन का प्रतिवर्ष उत्पादन होगा.
रक्षा क्षेत्र में हम दूसरों पर निर्भर नहीं हो सकते: नुवाल
NDTV से बातचीत करते हुए उन्होंने अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच जंग का उदाहरण देते हुए कहा कि उस जंग से यह साबित हो गया कि भविष्य में युद्ध मशीनें लड़ेंगी. फिर वे ड्रोन हों या रोबोट. ऐसे में हमें आगे आकर यह जिम्मेदारी संभालनी होगी. भारत के युवा वैज्ञानिक और उद्योग जगत से उन्होंने उम्मीद जताते हुए कहा कि हमारे देश में इतना टैलेंट है जो विदेश की कंपनियों में नए उत्पाद तैयार करता है, उसे अपने देश के विषय में सोचना चाहिए.
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि मिसाइल में जो सॉफ्टवेयर होता है, वह हम खुद बनाते हैं. उसी तरह सेंसर और चिप्स की आवश्यकता होती है, उन्हें भारत में ही बनाने के लिए कोई रास्ता ढूंढा जाए तो बेहतर होगा. दूसरी तरफ अन्य उद्योगों में जो रोबोट हैं या सेंसर और चिप्स हैं, उन्हें कहीं से भी पार्ट्स लाकर बना सकते हैं, लेकिन रक्षा क्षेत्र में हम दूसरों पर निर्भर नहीं रह सकते हैं. ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यही फोकस भी है. लेकिन देश के बारे में सोचने का काम अकेले प्रधानमंत्री का नहीं बल्कि हम सबका है.
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