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This Article is From Nov 14, 2025

जो कभी नहीं हुआ, वो इस बार हो गया... NDA ने कैसे हासिल की ये छप्परफाड़ जीत

2025 में एनडीए ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाने जा रहा है. अगर रुझान नतीजों में बदले तो यह एनडीए की सबसे बड़ी जीत होगी. एनडीए ने यह जीत कैसे हासिल की, इस जीत के 3 सबसे बड़े फैक्टर क्या हैं, आइए बताते हैं. 

जो कभी नहीं हुआ, वो इस बार हो गया... NDA ने कैसे हासिल की ये छप्परफाड़ जीत
  • बिहार चुनाव नतीजों में एनडीए ने शाम 4 बजे तक 208 सीटों पर जीत की बढ़त बना ली, जो एक रिकॉर्ड है
  • NDA की इस जीत में नीतीश की कल्याणकारी योजनाओं, महिला वोटरों का बंपर सपोर्ट प्रमुख कारणों में हैं
  • RJD के मुस्लिम-यादव वोट बैंक में भी एनडीए ने इस बार तगड़ी सेंध लगाई है. विपक्ष के कई किले ध्वस्त हो रहे हैं

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में एनडीए नया इतिहास रचने जा रहा है.  2010 में उसने 206 सीटें जीतकर नया रिकॉर्ड बनाया था. तब भी बीजेपी और जेडीयू साथ में थे. और अब 2025 में फिर से बीजेपी-जेडीयू की जोड़ी ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाने जा रही है. शाम 4 बजे तक एनडीए 208 सीटों पर जीत की तरफ बढ़ रहा था. अगर यही रुझान नतीजों में बदले तो यह एनडीए की अब तक की सबसे बड़ी जीत होगी. एनडीए ने यह जीत कैसे हासिल की, इस जीत के 3 सबसे बड़े फैक्टर क्या हैं, आइए बताते हैं. 

NDA 208 सीटों पर जीत की तरफ

2020 के विधानसभा चुनाव से तुलना करें तो उस समय एनडीए ने रिकॉर्ड 206 सीटें हासिल की थीं. इसमें जेडीयू की 115 सीटें और बीजेपी को 91 सीटें मिली थीं. लेकिन इस बार वह रिकॉर्ड भी ध्वस्त होता दिख रहा है. बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की मतगणना शुरू होने के साथ ही एनडीए ने जो बढ़त बनाई, वह वक्त बीतने के साथ लगातार बढ़ती चली गई. दोपहर बाद 4 बजे तक एनडीए 208 सीटों पर जीत की तरफ बढ़ रहा था. इसमें बीजेपी 96 सीट, नीतीश कुमार की जेडीयू 84, चिराग पासवान की एलजेपी (रामविलास) 19 सीटें, जीतनराम मांझी की HAM 5 सीटें और उपेंद्र कुशवाहा की रालोमो के खाते में 4 सीटें जाती दिख रही थी. 

ऐसे बढ़ा एनडीए की जीत का ग्राफ

2005 में बीजेपी और जेडीयू ने मिलकर चुनाव लड़ा था. इस जुगलबंदी ने 143 सीटें हासिल की थीं.  जेडीयू को 88 और बीजेपी को 55 सीटें मिली थीं. नीतीश कुमार लालू यादव के 15 साल के शासन को खत्म करके मुख्यमंत्री बने थे. आरजेडी 54 और कांग्रेस 9 पर सिमट गई थी.  

2010 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी और जेडीयू की जोड़ी ने इतिहास रच दिया था. तब एनडीए को रिकॉर्ड 206 सीटें मिली थीं. जेडीयू ने 115 और बीजेपी ने 91 सीटें जीती थीं. आरजेडी को 22 और कांग्रेस को 4 सीटों से ही संतोष करना पड़ा था. 

2015 के असेंबली इलेक्शन में उलटफेर हुआ और नीतीश कुमार ने बीजेपी को छोड़ लालू यादव की आरजेडी से हाथ मिला लिया. उस वक्त बीजेपी को 53 सीटों पर ही जीत नसीब हो सकी. जेडीयू को 71 सीटें और आरजेडी को 80 सीटें मिलीं. कांग्रेस का आंकड़ा भी 19 सीटों तक बढ़ गया. नीतीश सीएम और तेजस्वी यादव डिप्टी सीएम बने. लेकिन हालात कुछ ऐसे बने कि नीतीश ने बीच में ही इस्तीफा देकर बीजेपी से हाथ मिला लिया. नीतीश बीजेपी के सपोर्ट से सीएम बन गए. 

2020 में बीजेपी और जेडीयू ने मिलकर चुनाव लड़ा, लेकिन एलजेपी अलग हो गई. चिराग पासवान की पार्टी ने अलग चुनाव लड़ा. उन्हें सीटें तो एक ही मिली, लेकिन नीतीश की पार्टी का बड़ा नुकसान कर दिया. 143 सीटों पर लड़ने वाली जेडीयू सिर्फ 43 सीटें ही जीत सकी. इस चुनाव में बीजेपी के खाते में 74 सीटें आईं. आरजेडी को 75 सीटें मिलीं. 

एनडीए की जीत के 3 बड़े फैक्टर

महिलाओं का अभूतपूर्व सपोर्ट 

इस बार के चुनावों के रुझानों से साफ है कि महिला मतदाताओं ने खुलकर एनडीए को वोट किया है. महिलाओं ने जाति, धर्म, क्षेत्र के दायरों से ऊपर उठकर नीतीश कुमार और पीएम मोदी के चेहरे को चुना है. नीतीश सरकार की महिला केंद्रित नीतियों, शराबबंदी, सुरक्षा, सुविधा और अच्छे भविष्य के वादों ने महिलाओं के मन में  जगह बना ली है. नीतीश की महिलाओं के खाते में 10 हजार रुपये डालने, विधवा पेंशन बढ़ाने, छात्राओं को मुफ्त साइकिल व यूनिफॉर्म जैसी योजनाओं ने महिला मतदाताओं को लुभाने में बड़ा योगदान दिया है. इसके अलावा एनडीए के बूथ मैनेजमेंट की भी अहम भूमिका रही है. 

MY फैक्टर चकनाचूर

इस प्रचंड आंधी में एनडीए को हर वर्ग का वोट मिला. आरजेडी का MY फैक्टर भी धूल चाटता नजर आया. मुस्लिम और यादव वोटों पर अब तक बिहार में आरजेडी का एकछत्र राज माना जाता रहा है, लेकिन इस चुनाव में ये वोट भी एनडीए के पक्ष में बंट गए हैं. बिहार की 39 मुस्लिम बहुल सीटों में से एनडीए 27 सीटों पर आगे चल रहा है या जीत दर्ज कर चुका है. ये रुझान नतीजों में बदले तो महागठबंधन को 12 सीटों का नुकसान और एनडीए को 11 सीटों का फायदा हो सकता है. इसी तरह, बिहार की 126 यादव बहुल सीटों में से 100 पर एनडीए आगे है. अब तक इस वोट बैंक पर अपना हक जताता रहा महागठबंधन महज 22 सीटों पर सिमटता दिख रहा है. 

'सुशासन बाबू' की इमेज

नीतीश ने अपने कार्यकाल में लालू सरकार की जंगलराज की छवि को तोड़ने और कानून व्यवस्था की स्थिति को सुधारने के लिए लगातार प्रयास किए. इसका परिणाम भी देखने को मिला है. इस बार बिहार में छठ मनाने गए कई लोगों का कहना था कि पहले उन्हें दिन में भी गांव तक जाने में डर लगता था, लेकिन अब रात में भी वह बेझिझक सफर कर पा रहे हैं. ये निडरता नीतीश सरकार की जीत का सबूत है. इसके अलावा नीतीश ने कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं, जिससे लोगों में विश्वास बढ़ा है. सड़क, बिजली, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं ने वोटरों का मन जीत लिया है. 

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