
प्रतीकात्मक तस्वीर
कुछ साल पहले मुंबई-पुणे एक्सप्रेस-वे पर ड्राइव करने के दौरान शायद आपकी नज़र रास्ते में लगाए गए बोर्ड पर पड़ती होगी, जिस पर कार के टायरों में नॉर्मल हवा की जगह नाइट्रोजन गैस भरने की सलाह दी गई थी। लेकिन क्यों? ये सवाल जब भी किसी हवा भरने वाली दुकान पर पूछा गया तो वहां बैठे शख्स से यही जवाब मिला कि नाइट्रोजन गैस टायर को ठंडा रखती है। लेकिन कैसे, ये कोई नहीं बता पाता था। हम आपको ये बताने की कोशिश करते हैं कि ये कैसे मुमकिन है।
पहले हम विज्ञान की हिसाब से बात करते हैं। जैसा कि आप जानते हैं हमारे आसपास मौजूद हवा में नाइट्रोजन की मात्रा 78 फीसदी है, वहीं ऑक्सीजन की मात्रा मात्र 21 फीसदी। बाकी बचे हुए हिस्से में वाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड और नोबल गैस मौजूद हैं। जिस तरह हर गैस गर्म होने पर फैलती है और ठंड होने पर सिकुड़ जाती है। ठीक यही बात टायर में मौजूद हवा के साथ भी होती है और इसका असर हमारी कार के टायर प्रेशर पर पड़ता है। यही कारण है कि हमें समय-समय पर कार के टायर प्रेशर को चेक कराते रहना चाहिए।
अगर नाइट्रोजन गैस की बात करें तो इसकी कहानी थोड़ी अलग है। टायर में नाइट्रोजन गैस के रबर के माध्यम से बढ़ने की संभावना कम होती है और ऐसे में टायर प्रेशर लंबे समय तक स्थिर रहता है। अगर आपने देखा हो तो फॉर्मूला वन रेस में चलने वाली हर गाड़ी की टायर में नाइट्रोजन गैस का ही इस्तेमाल किया जाता है।
नॉर्मल हवा भराने की दूसरी समस्या आर्द्रता (Humidity) है, जिससे आपकी कार के टायर्स को नुकसान पहुंचता है। नॉर्मल एयर में वेपर मौजूद होता है जो टायर के प्रेशर पर तो असर डालता ही है साथ ही आपके कार में लगी स्टील और एल्युमीनियम की टायर रिम को भी नुकसान पहुंचाता है।
फिर सवाल उठता है कि ऐसे में नाइट्रोजन गैस कैसे बेहतर है? नाइट्रोजन गैस के भरते ही टायर में मौजूद ऑक्सीजन डाल्यूट हो जाता है और ऑक्सीजन में मौजूद पानी की मात्रा को नष्ट कर देता है। इससे टायर के रिम को भी नुकसान नहीं पहुंचता।
लेकिन अगर आपको लगता है कि नाइट्रोजन गैस के इस्तेमाल से आपकी कार की हैंडलिंग और माइलेज और बेहतर हो जाएगी तो, ऐसा बिल्कुल नहीं है। हालांकि इससे आपके टायर मेंटेनेंस पर अच्छा असर पड़ता है। नाइट्रोजन गैस भरवाने के बाद भी आपको समय-समय पर टायर प्रेशर चेक कराते रहना चाहिए।
एक ओर जहां टायर में नॉर्मल एयर भरवाना फ्री का सौदा है, वहीं नाइट्रोजन गैस भरवाने में आपको 40-50 रुपये प्रति टायर खर्च करने होंगे। कुल मिलाकर टायर में नाइट्रोजन गैस का इस्तेमाल घाटे का सौदा नहीं है, क्योंकि सुरक्षा की लिहाज से ये आपको हमेशा फायदेमंद साबित होगा।
पहले हम विज्ञान की हिसाब से बात करते हैं। जैसा कि आप जानते हैं हमारे आसपास मौजूद हवा में नाइट्रोजन की मात्रा 78 फीसदी है, वहीं ऑक्सीजन की मात्रा मात्र 21 फीसदी। बाकी बचे हुए हिस्से में वाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड और नोबल गैस मौजूद हैं। जिस तरह हर गैस गर्म होने पर फैलती है और ठंड होने पर सिकुड़ जाती है। ठीक यही बात टायर में मौजूद हवा के साथ भी होती है और इसका असर हमारी कार के टायर प्रेशर पर पड़ता है। यही कारण है कि हमें समय-समय पर कार के टायर प्रेशर को चेक कराते रहना चाहिए।
अगर नाइट्रोजन गैस की बात करें तो इसकी कहानी थोड़ी अलग है। टायर में नाइट्रोजन गैस के रबर के माध्यम से बढ़ने की संभावना कम होती है और ऐसे में टायर प्रेशर लंबे समय तक स्थिर रहता है। अगर आपने देखा हो तो फॉर्मूला वन रेस में चलने वाली हर गाड़ी की टायर में नाइट्रोजन गैस का ही इस्तेमाल किया जाता है।
नॉर्मल हवा भराने की दूसरी समस्या आर्द्रता (Humidity) है, जिससे आपकी कार के टायर्स को नुकसान पहुंचता है। नॉर्मल एयर में वेपर मौजूद होता है जो टायर के प्रेशर पर तो असर डालता ही है साथ ही आपके कार में लगी स्टील और एल्युमीनियम की टायर रिम को भी नुकसान पहुंचाता है।
फिर सवाल उठता है कि ऐसे में नाइट्रोजन गैस कैसे बेहतर है? नाइट्रोजन गैस के भरते ही टायर में मौजूद ऑक्सीजन डाल्यूट हो जाता है और ऑक्सीजन में मौजूद पानी की मात्रा को नष्ट कर देता है। इससे टायर के रिम को भी नुकसान नहीं पहुंचता।
लेकिन अगर आपको लगता है कि नाइट्रोजन गैस के इस्तेमाल से आपकी कार की हैंडलिंग और माइलेज और बेहतर हो जाएगी तो, ऐसा बिल्कुल नहीं है। हालांकि इससे आपके टायर मेंटेनेंस पर अच्छा असर पड़ता है। नाइट्रोजन गैस भरवाने के बाद भी आपको समय-समय पर टायर प्रेशर चेक कराते रहना चाहिए।
एक ओर जहां टायर में नॉर्मल एयर भरवाना फ्री का सौदा है, वहीं नाइट्रोजन गैस भरवाने में आपको 40-50 रुपये प्रति टायर खर्च करने होंगे। कुल मिलाकर टायर में नाइट्रोजन गैस का इस्तेमाल घाटे का सौदा नहीं है, क्योंकि सुरक्षा की लिहाज से ये आपको हमेशा फायदेमंद साबित होगा।
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