
पत्नी मोहना के साथ विजयन
नई दिल्ली:
'अगर पूरी शिद्दत से किसी चीज़ को चाहो तो सारी कायनात आपको उससे मिलाने में जुट जाती है'. आपके लिए भले ही ये लाइन एक फिल्मी डायलॉग से ज्यादा कुछ नहीं, लेकिन एक शख्स ने इसे सच साबित किया है. हम में से कई लोग ऐसे हैं जिन्हें ट्रैवल करना यानी कि घूमना बेहद पसंद है, लेकिन पैसे की कमी की वजह से हम अपने इस शौक को पूरा नहीं कर पाते. आज हम आपको एक ऐसे शख्स के बारे में बता रहे हैं जिसका एक ही मकसद है और वो है घूमना लेकिन पैसों की कमी कभी उसका रास्ता नहीं रोक पाई. जी हां, यह कहानी है एक चायवाले की जो अपनी पत्नी के साथ अब तक 17 देशों की यात्रा कर चुका है.

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केरल के एर्नाकुलम में 65 साल के विजयन पिछले 40 सालों से चाय बेच रहे हैं. वो इतने पैसे जमा कर लेते हैं कि बैंक उन्हें लोन दे सके. इसके बाद इन पैसों से वो हर बार एक नया देश घूमकर आते हैं. फिर वापस आकर अगले दो-तीन सालों में वो बैंक का पैसा वापस कर देते हैं. आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि इस तरह विजयन पत्नी मोहना के साथ अब तक 17 देश घूम चुके हैं. दोनों एक साथ अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, वेनिस और मिस्र समेत कई देशों की यात्रा कर चुके हैं.

इन 10 तरह के ट्रैवलर में से कौन से हैं आप?
विजयन के मुताबिक, 'मुझे यात्रा करने की प्रेरणा अपने पिता से मिली. मैं 6 साल का था और तब से ही पिताजी मुझे अलग-अलग जगहों पर ले जाया करते थे. हमने मदुरै, पलानी और बहुत सारी जगहें देखीं. पिता के साथ यात्रा के उन पलों ने ही मुझे मेरे सपने से मेरी पहचान कराई.'

घूमने-फिरने के शौकीनों के मुंह से ज़रूर सुने होंगे ये शब्द
पिता की मौत के बाद विजयन पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी का भार आ गया और इन सबके बीच घूमने का तो सवाल ही नहीं उठता था. लेकिन विजयन की पत्नी ने उनके इस सपने को पूरा करने में खूब मदद की. अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर कैसे विजयन कम आमदनी होने के बावजूद घूमने-फिरने के लिए पैसे जुटा पाते हैं? तो विजयन बैंक से लोन लेकर ट्रैवल करते हैं. फिर वापस आकर अगले तीन सालों में पैसे चुकाकर फिर नया लोन लेते हैं और यह सिलसिला इसी तरह चलता रहता है. विजयन एयर टिकट के लिए रोजाना 300 रुपये की बचत करते हैं.

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विजयन पर हरी एम मोहन ने 'इंविज़िबल विंग्स' नाम से एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई है. इस डॉक्यूमेंट्री में बताया गया है कि आखिर ऐसी कौन सी चीज है जो विजयन को सबकुछ पीछे छोड़कर दुनिया घूमने के लिए मजबूर करती है. डॉक्यूमेंट्री के निर्देशक हरि एम मोहन के मुताबिक, 'मैं चाहता था कि लोग इस फिल्म को देखें और अपने सोए हुए सपनों को फिर से जगाकर उन्हें पूरा करने की प्रेरणा ले सकें. मैं इस फिल्म को भारत की दूसरी प्रांतीय भाषाओं में डब कर इसे गांव के लोगों को भी दिखान चाहता हूं ताकि जिनके पास इंटरनेट नहीं है वो भी इसे देख सकें.'
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