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'No Laptop' वाली नोकझोंक, कैफे में काम करने पहुंची महिला को मिला ऐसा जवाब, इंटरनेट पर छिड़ गई जंग

बेंगलुरु के इंदिरानगर में एक महिला को अपने लैपटॉप के साथ कैफे से मायूस लौटना पड़ा. कई मशहूर कैफे ने लैपटॉप इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी है, जिससे सोशल मीडिया पर बहस का बाजार गर्म हो गया है. क्या अब कैफे सिर्फ गप्पें मारने की जगह बनकर रह जाएंगे?

'No Laptop' वाली नोकझोंक, कैफे में काम करने पहुंची महिला को मिला ऐसा जवाब, इंटरनेट पर छिड़ गई जंग
कैफे में कॉफी पीजिए, काम मत कीजिए! क्या अब बदल जाएगी बेंगलुरु की टेक-लाइफ?
X/@chill_kar_manju

Bengaluru Cafe Laptop Ban: बेंगलुरु और वहां का 'वर्क फ्रॉम कैफे' कल्चर तो पूरी दुनिया में मशहूर है, लेकिन अब इस पर 'ग्रहण' लगता नजर आ रहा है. मामला इंदिरानगर का है, जहां मंजू नाम की एक महिला अपने लैपटॉप के साथ 'कोनकु' (Concu) और 'अराकु' (Araku) जैसे बड़े कैफे में काम करने पहुंचीं, पर वहां का नजारा देखकर उनके होश उड़ गए. मंजू ने एक्स (X) पर अपना दुखड़ा सुनाते हुए बताया कि, इन कैफे ने लैपटॉप इस्तेमाल करने से मना कर दिया.

नतीजा ये हुआ कि उन्हें थक-हारकर फिर से अपने पुराने ठिकाने 'थर्ड वेव' (Third Wave) का रुख करना पड़ा. ये खबर जैसे ही इंटरनेट पर आई, बेंगलुरु के टेक-प्रेमियों के बीच खलबली मच गई.

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कैफे की सफाई और बिजनेस का चक्कर (Cafe Policy and Business Strategy)

जब इस बारे में पूछताछ की गई, तो 'कोनकु' कैफे ने साफ कर दिया कि, वीकेंड पर हम लैपटॉप अलाउ नहीं करते. उनका तर्क बड़ा सीधा है...भारी भीड़ के वक्त अगर कोई एक कप कॉफी लेकर घंटों लैपटॉप पर चिपका रहेगा, तो बाकी ग्राहक कहां बैठेंगे? सच्चाई तो ये है कि कैफे मालिक अब 'टर्नओवर' पर ध्यान दे रहे हैं. अराकु कॉफी की तरफ से अभी कोई पक्का बयान नहीं आया है, लेकिन हवा का रुख बता रहा है कि अब कैफे सिर्फ खाने-पीने और मौज-मस्ती का अड्डा बनना चाहते हैं, दफ्तर नहीं.

सोशल मीडिया पर 'मजे' और 'दर्द' का संगम (Social Media Reactions and Public Debate)

इंटरनेट की जनता भी इस मामले में दो गुटों में बंट गई है. कुछ लोग कैफे मालिकों का साथ दे रहे हैं, तो कुछ को ये बात हजम नहीं हो रही. एक यूजर ने तो चुटकी लेते हुए कह दिया कि, 'मैडम, अगली बार लैपटॉप लेकर जिम चले जाना'. वहीं कुछ लोगों का कहना है कि, अगर लैपटॉप बैन होगा, तो फ्रीलांसर और स्टूडेंट्स का क्या होगा? वैसे ये बहस नई नहीं है, लेकिन बेंगलुरु जैसे स्टार्टअप शहर में ऐसी पाबंदी किसी बड़े झटके से कम नहीं है.

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देखा जाए तो ये मामला 'स्पेस और बिजनेस' के बीच की लड़ाई है. कैफे मालिकों को अपनी सीटें भरनी हैं और काम करने वालों को सुकून भरा कोना चाहिए. अब देखना ये है कि क्या बेंगलुरु के दूसरे इलाकों में भी ये 'नो लैपटॉप' वाली आग फैलती है या फिर बीच का कोई रास्ता निकलता है, फिलहाल तो लैपटॉप लेकर घर से निकलने से पहले कैफे का 'मिजाज' जरूर चेक कर लीजिएगा.

(डिस्क्लेमर: यह जानकारी सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट के आधार पर दी गई है. NDTV इसकी पुष्टि नहीं करता.)
 

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