
हम में से अधिकतर लोग ईश्वर के प्रति आस्था रखते हैं और धार्मिक स्थलों पर जाते हैं. लेकिन कितने लोग इस बात पर ध्यान देते हैं कि धार्मिक कर्म-कांडों पर कितना पैसा खर्च होता है? धार्मिक रीति-रिवाजों को पूरा करने के लिए न सिर्फ धन बल्कि संसाधन भी खर्च किए जाते हैं. क्या हम कभी ये सोचते हैं कि आखिर इन पैसों या संसाधनों को किसी और जगह इस्तेमाल किया जाता तो क्या होता? दरअसल, ऐसी ही एक सकारात्मक पहल करते हुए औरंगाबाद (महाराष्ट्र) के एक गांव के लोगों ने फैसला किया है कि वे धार्मिक क्रियाओं पर होने वाले खर्च को अपने बच्चों के स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए इस्तेमाल करेंगे.
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द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक गांव के लोगों ने पहले से मौजूद एक स्कूल को बेहतर बनाने के बारे में सोचा है. गांव वाले अपने स्कूल को अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं से संपन्न बनाना चाहते हैं. गांव वालों ने 2 एकड़ जमीन पर स्कूल के परिसर का विस्तार करने की योजना बनाई है. ऐसा नहीं है कि गांव वाले धार्मिक रीति-रिवाज पूरे नहीं करेंगे बल्कि इन मौकों पर होने वाले खर्च को कम करेंगे. मसलन किसी धार्मिक भोज में सब अपनी रोटी लेकर जाएंगे. बता दें कि गांव वालों ने स्कूल के परिसर को बढ़िया बनाने के लिए काम शुरू भी कर दिया है.
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इससे पहले ग्रामीणों ने एक आंगनबाड़ी और स्कूल की कम्प्यूटर लैब को बेहतर बनाते हुए उसका पूरा डिजिटलीकरण कर दिया था. बता दें कि गांव में 450 घर हैं और प्रत्येक घर 1000 रुपये का योगदान देता है. पांच एकड़ से अधिक जमीन वाले ग्रामीण 5000 रुपये का योगदान देते हैं. पंचायत ने अब तक 50 हजार से ऊपर रुपये जोड़ लिए हैं, इसके अलावा ग्रामीण सरकार और निजी कंपनियों से मदद भी ले रहे हैं. एक ग्रामीण ने बताया, "स्कूल में फिलहाल 240 बच्चे पढ़ रहे हैं. आस-पास के गांव के बच्चे भी इस स्कूल में पढ़ना चाहते हैं."
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