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होर्मुज पर ट्रंप की नाकेबंदी... क्या पूरी दुनिया को ईरान जंग में घसीट रहा अमेरिका?

इस्लामाबाद वार्ता फेल होने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नाकेबंदी का ऐलान किया है. इससे ईरान पर दबाव तो बढ़ेगा, लेकिन भारत समेत दुनिया के बड़े तेल आयातक देशों पर भी संकट गहरा सकता है. तेल कीमतों में फिर उछाल शुरू हो गया है.

होर्मुज पर ट्रंप की नाकेबंदी... क्या पूरी दुनिया को ईरान जंग में घसीट रहा अमेरिका?
नई दिल्ली:

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नौसैनिक नाकेबंदी का ऐलान कर दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा पर नया संकट खड़ा कर दिया है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या ट्रंप ईरान पर दबाव बनाने के नाम पर बाकी देशों को भी इस जंग में धकेलना चाहते हैं?

इस्लामाबाद की पीस टॉक फेल

इस्लामाबाद में 21 घंटे चली अमेरिका-ईरान वार्ता बिना किसी समझौते के खत्म हुई. इसके बाद ट्रंप ने ऐलान किया कि अमेरिकी नौसेना ईरानी बंदरगाहों की ओर जाने या वहां से निकलने वाले जहाजों को रोकेगी. इतना ही नहीं, जिन ‘न्यूट्रल' देशों के जहाज ईरान को सुरक्षित रास्ते के बदले भुगतान कर रहे थे, उन्हें भी इंटरसेप्ट करने की बात कही गई. ट्रंप का मकसद ईरान की तेल कमाई रोकना है, लेकिन इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है.

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पूरी दुनिया के लिए अहम है होर्मुज

होर्मुज दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है. वैश्विक तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े आयातक देश इस जलडमरूमध्य पर निर्भर हैं. भारत के एलपीजी आयात का भी बड़ा हिस्सा इसी रास्ते आता है. 28 फरवरी से शुरू हुए ईरान–US संघर्ष के दौरान ईरान ने ड्रोन, मिसाइल हमलों और समुद्री बारूदी सुरंगों से यहां दबाव बनाया था. इससे कई कारोबारी जहाज प्रभावित  हुए और तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई थीं.

सीजफायर से सुधरे हालात

7 अप्रैल को अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम जैसे समझौते के बाद हालात कुछ सुधरे थे. ईरान ने दो हफ्तों के लिए जहाजों को सीमित ट्रांजिट की इजाजत दी थी, जिससे तेल कीमतों में नरमी आई. लेकिन 12 अप्रैल को वार्ता फेल होने के बाद ट्रंप ने फिर सख्त रुख अपनाया और नाकेबंदी की घोषणा कर दी. इसके बाद ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई फिर 100 डॉलर के पार पहुंच गए.

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क्या दुनिया पर दबाव बना रहे ट्रंप?

ट्रंप की यह रणनीति सिर्फ ईरान ही नहीं, उन देशों पर भी दबाव मानी जा रही है जिन्होंने पहले अमेरिकी नेतृत्व वाले साझा नौसैनिक मिशन में शामिल होने से दूरी बनाई थी. चीन ने सीधे ईरान से समझौता कर अपने जहाजों की आवाजाही सुनिश्चित की थी. भारत ने भी कूटनीतिक स्तर पर अपने ऊर्जा हित सुरक्षित करने की कोशिश की. जापान और दक्षिण कोरिया ने सैन्य भूमिका से बचते हुए वैकल्पिक आपूर्ति और रिजर्व पर जोर दिया.

यूरोपीय सहयोगी भी ट्रंप की लाइन पर नहीं दिख रहे. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर ने साफ कहा है कि ब्रिटेन ईरान युद्ध में नहीं घसीटा जाएगा और नाकेबंदी का हिस्सा नहीं बनेगा. वहीं फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने ब्रिटेन के साथ मिलकर युद्ध से अलग एक बहुराष्ट्रीय, रक्षात्मक मिशन की बात कही है, जिसका मकसद सिर्फ कारोबारी जहाजों की सुरक्षित आवाजाही बहाल करना होगा.

यानी, ट्रंप का कदम ईरान पर दबाव बनाने से ज्यादा दुनिया के ऊर्जा आयातकों के लिए नई मुसीबत बन सकता है. अगर हालात और बिगड़े, तो इसका सबसे बड़ा असर तेल कीमतों, महंगाई और एशियाई अर्थव्यवस्थाओं खासकर भारत पर पड़ सकता है.

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