सूडान में पिछले तीन साल से जारी गृह युद्ध अब एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है, जहां से पूरे अफ्रीकी महाद्वीप में तबाही का नया रास्ता खुल सकता है. इस भीषण जंग का नया अखाड़ा बना है सूडान का 'ब्लू नाइल' राज्य, जिसे अपनी बेहिसाब प्राकृतिक दौलत के कारण 'पानी और सोने की भूमि' कहा जाता है.
सूडानी सेना और अर्धसैनिक बल 'रैपिड सपोर्ट फोर्सेज' (RSF) के बीच चल रही वर्चस्व की इस लड़ाई में अब पड़ोसी देश इथियोपिया का नाम भी घसीट लिया गया है. सूडान सरकार ने आरोप लगाया है कि इथियोपिया उनकी सीमा में घुसकर हमलों को अंजाम दे रहा है. इस गंभीर आरोप के बाद दुनिया भर के भू-राजनीतिक विशेषज्ञों के कान खड़े हो गए हैं कि क्या यह स्थानीय जंग अब एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध का न्योता दे रही है?
क्यों कहलाती है यह 'सोना और पानी की भूमि'?
ब्लू नाइल क्षेत्र को 'सोना उगलने वाला इलाका' यूं ही नहीं कहा जाता. नील नदी के तटीय इलाकों से घिरे इस राज्य में प्रकृति ने अपना खजाना दिल खोलकर लुटाया है. यह इलाका विशाल स्वर्ण भंडारों के लिए दुनिया भर में मशहूर है. इसके अलावा यहां क्रोमियम, संगमरमर (मार्बल) और मैंगनीज जैसे बेहद अहम और रणनीतिक खनिजों का बड़ा भंडार है. इसके अलावा, यहां के घने उष्णकटिबंधीय जंगलों से बड़े पैमाने पर 'गोंद अरबी' और कीमती लकड़ियों का उत्पादन होता है.
आर्थिक रूप से मजबूत होने के साथ-साथ यह सूडान की रीढ़ की हड्डी भी है. इस क्षेत्र में करीब 45 लाख एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि है, जो पूरे देश का पेट भर सकती है. इसके साथ ही, यहां बहने वाली 'ब्लू नाइल' नदी पूरे नील नदी तंत्र को लगभग 80 प्रतिशत पानी देती है. यही वजह है कि सूडान में सत्ता की भूख रखने वाले हर गुट की नजर इस सोने की चिड़िया पर टिकी हुई है.
क्यों है क्षेत्रीय युद्ध का खतरा?
इस समृद्ध इलाके की भौगोलिक स्थिति जितनी खूबसूरत है, उतनी ही संवेदनशील भी है. ब्लू नाइल की सीमाएं पूर्व में इथियोपिया और दक्षिण-पश्चिम में दक्षिण सूडान से लगती हैं. सूडान सरकार ने हाल ही में अपनी सेना के खिलाफ जारी जंग में इथियोपिया पर सीधे तौर पर शामिल होने का आरोप लगाया है.
सूडान का कहना है कि इथियोपिया अपनी जमीन का इस्तेमाल सूडानी इलाकों पर हमला करने के लिए कर रहा है. इस विवाद के बाद सूडान ने विचार-विमर्श के लिए अपने राजदूत को वापस बुला लिया है, जिससे दोनों देशों के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं.
रोजायरेस बांध पर मंडराया ड्रोन हमलों का साया
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, इस युद्ध में सबसे बड़ा खतरा पानी के सबसे बड़े स्रोत 'रोजायरेस बांध' (Roseires Dam) को लेकर पैदा हो गया है. सेना और आरएसएफ के बीच चल रही लड़ाई में आधुनिक ड्रोन तकनीक का जमकर इस्तेमाल हो रहा है. जानकारों को डर है कि अगर यह बांध इन ड्रोन हमलों की चपेट में आ गया, तो सूडान में बिजली और पानी का ऐसा हाहाकार मचेगा जिसकी भरपाई नामुमकिन होगी.
इसके अलावा, ब्लू नाइल और मध्य राज्यों की लाखों एकड़ कृषि भूमि पूरी तरह बर्बाद हो जाएगी, जो पूरी तरह इसी बांध के पानी पर निर्भर है. कृषि और मछली पालन ठप होने से लाखों लोगों के सामने भुखमरी का संकट खड़ा हो जाएगा. गौरतलब है कि यह बांध इथियोपिया के विवादित रेनेसां डैम से महज 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जिससे इसका अंतरराष्ट्रीय महत्व और बढ़ जाता है.
सामाजिक ताने-बाने और आपसी भाईचारे पर चोट
ब्लू नाइल क्षेत्र की एक बड़ी खासियत इसका समृद्ध सामाजिक ढांचा रहा है. यहां करीब 10 लाख से अधिक लोग रहते हैं, जिनमें अफ्रीकी और अरब मूल की दर्जनों जनजातियां शामिल हैं. इन जनजातियों के आपसी और पारिवारिक रिश्ते इथियोपिया और दक्षिण सूडान की सीमाओं के पार तक फैले हुए हैं. चरवाहे और पशुपालक समूह सदियों से बिना किसी रोक-टोक के इन सीमाओं को पार करते आए हैं और सालों से यहां विभिन्न संस्कृतियों के लोग शांति से सह-अस्तित्व के साथ रह रहे थे.
भले ही ब्लू नाइल क्षेत्र में युद्ध की लपटें देर से पहुंची हों, लेकिन इसका असर बेहद विनाशकारी और गहरा साबित हो रहा है. संयुक्त राष्ट्र (UN) के आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र का बुनियादी ढांचा पूरी तरह तबाह हो चुका है. सड़कें, पुल और स्वास्थ्य केंद्र मलबे में तब्दील हो रहे हैं. लगभग 80 प्रतिशत स्वास्थ्य सुविधाएं या तो पूरी तरह बंद हो चुकी हैं या अपनी क्षमता से बहुत कम पर काम कर रही हैं. लोग अपनी जान बचाने के लिए सामूहिक रूप से पलायन कर रहे हैं और इस क्षेत्र की राजधानी 'दामाज़िन' की तरफ भाग रहे हैं.
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