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आज दुनिया का नक्शा बदल जाएगा? संयुक्त राष्ट्र में हो रही वोटिंग

यहां आसान भाषा में समझिए कि अभी सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक मर्केटर नक्शे में क्या कमी है और क्यों इसे नक्शों के जरिए उपनिवेशवादी सोच बनाने का जरिया माना जाता है.

आज दुनिया का नक्शा बदल जाएगा? संयुक्त राष्ट्र में हो रही वोटिंग
आज दुनिया का नक्शा बदल जाएगा? संयुक्त राष्ट्र में हो रही वोटिंग
  • संयुक्त राष्ट्र महासभा में अफ्रीका का वास्तविक आकार दिखाने वाले नए नक्शे पर शुक्रवार को वोटिंग होगी
  • टोगो ने यह प्रस्ताव पेश किया है जिसे अफ्रीकी संघ के 54 सदस्य देशों ने समर्थन दिया है
  • मर्केटर नक्शा भूमध्य रेखा के पास के इलाकों को छोटा और ध्रुवीय क्षेत्रों को बड़ा दिखाता है

क्या आज दुनिया का नक्शा हमेशा-हमेशा के लिए बदल जाएगा. शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक खास प्रस्ताव पर वोटिंग होगी. इस प्रस्ताव का मकसद दुनिया में लंबे समय से इस्तेमाल हो रहे पारंपरिक मर्केटर नक्शे की जगह ऐसा नक्शा अपनाना है, जिसमें अफ्रीका का असली आकार ज्यादा सही तरीके से दिखाई दे. इस प्रस्ताव को अफ्रीकी देश टोगो ने पेश किया है. अफ्रीकी संघ के बाकी 54 सदस्य देशों समेत कई देशों ने इसका समर्थन किया है. 

संयुक्त राष्ट्र के ऐसे प्रस्तावों को लागू करना कानूनी तौर पर जरूरी नहीं होता. लेकिन अगर यह प्रस्ताव पास हो जाता है, तो इसका असर स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले नक्शों से लेकर रोजमर्रा की तकनीक तक पर पड़ सकता है. इसकी वजह यह है कि शिक्षा, तकनीक और सरकारी कामकाज में मर्केटर नक्शे का बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है.

अभी इस्तेमाल होने वाले नक्शे में क्या कमी है?

मर्केटर नक्शा 1569 में फ्लेमिश नक्शानवीस जेरार्डस मर्केटर ने बनाया था. इसका मकसद नाविकों को समुद्र में रास्ता खोजने में मदद करना था. करीब 500 साल बाद भी यह नक्शा दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले नक्शों में से एक है. लेकिन इस नक्शे को बनाने के तरीके की एक बड़ी समस्या है. इसमें भूमध्य रेखा के पास के इलाके अपने असली आकार से काफी छोटे दिखाई देते हैं, जबकि उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के पास के इलाके जरूरत से ज्यादा बड़े नजर आते हैं.

उदाहरण से आपको समझाते हैं. मर्केटर नक्शे में पूरा अफ्रीका और ग्रीनलैंड लगभग एक जैसे आकार के दिखाई देते हैं. लेकिन असल में अफ्रीका का क्षेत्रफल ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है. ग्रीनलैंड तो डेनमार्क के अधीन एक क्षेत्र मात्र है. जबकि अफ्रीका पूरा एक महाद्वीप.

नक्शा सही करने की मुहिम

द गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार #CorrectTheMap नाम का एक कैंपेन Change.org पर चल रहा है. इसमें कहा गया है कि अमेरिका, चीन, भारत, जापान, मेक्सिको और यूरोप का एक बड़ा हिस्सा भी मिला दें तब भी अफ्रीका में कुछ जमीन बच जाएगी. इसके बावजूद अभी के नक्शे (मर्केटर नक्शा) में अफ्रीका को बहुत छोटा दिखाया जाता है. इस कैंपेन पर अब तक 11,000 से ज्यादा लोग हस्ताक्षर कर चुके हैं. अफ्रीकी संघ ने अगस्त 2025 में इस कैंपेन को सपोर्ट किया था और इसके बाद टोगो से इसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संभालने को कहा था.

पश्चिमी देश की ताकत का असर नक्शे पर?

इतिहासकार और भूगोल के जानकार कई सालों से कहते रहे हैं कि मर्केटर नक्शे में पश्चिमी देशों की सोच और पुराने नजरिए का असर है. कुछ लोगों ने इसके लिए 'कार्टोग्राफिक कॉलोनियलिज्म' यानी नक्शों के जरिए उपनिवेशवादी सोच जैसा शब्द भी इस्तेमाल किया है. कुछ लोगों का तर्क है कि इस नक्शे ने धीरे-धीरे दुनिया में देशों की ताकत को देखने के तरीके पर भी असर डाला है. उनका कहना है कि इसमें ग्लोबल साउथ यानी अफ्रीका, एशिया और दूसरे विकासशील क्षेत्रों का असली भौगोलिक आकार छोटा दिखाई देता है, जबकि उत्तरी गोलार्ध के देशों का आकार बड़ा नजर आता है और भूमध्य रेखा के आसपास के इलाके छोटे दिखते हैं.

इन लोगों के मुताबिक, इसका असर सिर्फ नक्शे तक सीमित नहीं रहा. इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विकास के लिए तय की जाने वाली प्राथमिकताओं और स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली चीजों में मौजूद पुरानी असमान सोच को भी बढ़ावा मिला है.

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