- ईरान और अमेरिका के बीच फिलहाल शांति है लेकिन दोनों देश अपनी मांगों पर जमे हुए हैं और सीजफायर अनिश्चित है
- S&P ग्लोबल एनर्जी की रिपोर्ट के अनुसार होर्मुज स्ट्रेट खुलने के बाद भी ऊर्जा संकट 7 महीने तक बना रह सकता है
- ऊर्जा उत्पादन के सामान्य होने की अवधि इस बात पर निर्भर करेगी कि इंफ्रास्ट्रक्चर को कितना नुकसान हुआ है
ईरान-अमेरिका के बीच इस समय शांति है. दोनों ओर से पाकिस्तान के इस्लामाबाद में शांति वार्ता भी हुई पर अभी भी दोनों अपनी-अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं. सीजफायर जारी तो है पर कब टूट जाए और हमले शुरू हो जाए कह नहीं सकते. इस बीच दुनिया के बाकी देशों के लिए चिंता का विषय तेल है. एक रिपोर्ट तो यह भी बता रही है कि होर्मुज स्ट्रेट खुल भी जाए तो ऊर्जा संकट खत्म नहीं होगा बल्कि इसके 2027 तक खिंचने की आशंका जताई जा रही है. इसे पूरी तरह से सामान्य होने में 7 महीने लग सकते हैं.
रिपोर्ट में क्या बताया गया?
एक रिपोर्ट में एसएंडपी ग्लोबल एनर्जी ने चेतावनी दी है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के खुलने के बाद भी ऊर्जा उत्पादन को पूरी तरह सामान्य होने में कम से कम सात महीने और लग सकते हैं हालांकि यह अनुमान भी काफी आशावादी (optimistic) माना जा रहा है. S&P के मुताबिक, यह सात महीने का अनुमान कुछ शर्तों पर आधारित है. जैसे अगर ऊर्जा ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) को स्थायी नुकसान न हुआ हो और सप्लाई चेन सुचारु रूप से चलती रहे. अगर बंदरगाह, पाइपलाइन, लोडिंग सुविधाओं या अन्य ढांचों को नुकसान हुआ है, तो स्थिति सामान्य होने में और ज्यादा समय लग सकता है.
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रिपोर्ट में कहा गया है कि जितने लंबे समय तक यह जलडमरूमध्य बंद रहेगा, उतनी ही अधिक संभावना है कि आपूर्ति संकट 2026 के अंत और 2027 तक बना रहेगा. इसका मतलब है कि अमेरिका ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के उपभोक्ताओं को पेट्रोल‑डीजल और अन्य ऊर्जा उत्पादों की ऊंची कीमतों का सामना लंबे समय तक करना पड़ सकता है.
अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों में लगी आग
GasBuddy के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में मंगलवार को पेट्रोल की औसत खुदरा कीमत 4.50 डॉलर प्रति गैलन से ऊपर पहुंच गई, जो जुलाई 2022 के बाद पहली बार है. मेमोरियल डे वीकेंड (जो सार्वजनिक छुट्टियों का समय है और गर्मियों में यात्रा का पीक सीजन शुरू होता है) के करीब आते ही ईंधन की बढ़ती कीमतें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के लिए एक बड़ा राजनीतिक खतरा बन सकती हैं, खासकर ऐसे समय में जब वे नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनावों के लिए प्रचार कर रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर मध्य पूर्व में तनाव कम नहीं हुआ, तो अमेरिका में ईंधन की कीमतें पुराने रिकॉर्ड को भी पार कर सकती हैं. इसका असर न सिर्फ अमेरिका, बल्कि वैश्विक स्तर पर ऊर्जा बाजार और उपभोक्ताओं की जेब पर भी पड़ सकता है.
भारत में नहीं बढ़े डीजल-पेट्रोल के दाम
कच्चा तेल के दाम लगातार बढ़ने के बाद भारत पर भी पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने का दबाव है. ऐसी आशंका थी कि 5 मई के बाद तेल ते दाम 4-5 रुपये प्रति लीटर बढ़ सकते हैं पर अभी सरकार ने इसपर कोई फैसला नहीं लिया है जो आमजनों के लिए राहत की बात है. कच्चे तेल के दाम 114 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका है. रसोई गैस के दाम में भी 50 रुपये की बढ़ोतरी की संभावना जताई गई है हालांकि अभी केवल कमर्शियल सिलेंडर के दाम 993 रुपये बढ़कर 3 हजार के पार हो गया है.
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