- ईरान और इज़राइल के बीच 40 दिनों की जंग में दोनों पक्षों के प्रारंभिक लक्ष्य पूरे नहीं हुए
- ईरान ने खाड़ी देशों और US ठिकानों पर हमले किए लेकिन खाड़ी के किसी भी देश ने खुलकर जवाबी कार्रवाई नहीं की
- ईरान ने अपनी मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं से इज़राइल के डिफेंस सिस्टम को कई बार चकमा दिया और अपनी सैन्य ताकत दिखाई
पश्चिम एशिया में आज सबसे बड़ा सवाल यही है- असली रहनुमा कौन? 40 दिन की जंग किसके कहने पर, किसकी सलाह पर, किसकी मध्यस्था में थमी? जीता कौन, हारा कौन? किसके लक्ष्य पूरे हुए? इजराइल का जंग से पहले कहना था कि उसका मक़सद ईरान के बैलिस्टिक मिसाइलों का ज़ख़ीरा ख़त्म करना है ताकि वह इजराइल के लिये कभी खतरा ना बन सके.अमेरिका को ईरान में सत्ता परिवर्तन से कम कुछ भी मंज़ूर नहीं था. उसका कहना था कि ईरान अपने ऐटमी कार्यक्रम बंद करे, अपने यहां चल रहे प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई न करे और उसकी शर्तें माने.लेकिन 40 दिन बाद लगता है कि न इज़रायल के लक्ष्य पूरे हुए और न अमेरिका के मंसूबे. उल्टे अमेरिका को नुक़सान झेलना पड़ा जो दरअसल इज़रायल का भी नुक़सान है.
इस युद्ध से पहले पश्चिम एशिया का सबसे बड़ा खिलाड़ी अमेरिका था. अब तक वह ही पश्चिम एशिया का भाग्य विधाता रहा है. यहां पर अमेरिका के कई सैन्य ठिकाने हैं. बहरीन में अमेरिकी नौसेना का पांचवां बेड़ा है.दोहा में मध्य पूर्व की अमेरिकी सेन्ट्रल कमांड है. उसने सबकी सुरक्षा की गारंटी ले रखी है. लेकिन यह गारंटी इन 40 दिनों की जंग में तार-तार हो गई. ईरान का दावा है कि उसके हमले के बाद अब खाड़ी देशों में मौजूद ज्यादातर सैन्य ठिकाने अमेरिकी सैनिकों के रहने लायक नही रह गए हैं. हर बेस में तबाही का मंजर साफ नजर आता है. ज़्यादा बुरा ये हुआ है कि खाड़ी देशों की सुरक्षा की जो गारंटी अमेरिका ने ले रखी थी, वह अभी तार-तार हो गया है . आखिर क्या वजह रही है कि ईरान ने खाड़ी देशों पर तो जबरदस्त हमले किए लेकिन किसी भी देश ने खुलकर ईरान पर जवाबी कार्रवाई नही की .
इजरायल के डिफेंस सिस्टम की भी खुली 'पोल'
ईरान के साथ जंग में इजराइल की धमक भी काफी हद तक कम हुई . उसके एयर डिफेंस सिस्टम को ईरान की मिसाइलों और ड्रोन ने कई बार चकमा देकर इजरायल में काफी तबाही मचाई .सऊदी अरब का भी अपने विशाल तेल भंडार की वजह से पश्चिम एशिया में एक अलग रुतबा है . माना जाता है कि दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा तेल सऊदी अरब के पास ही है . वही संयुक्त अरब अमीरत अपने गैस रिजर्व और आर्थिक ताकत की वजह से बेहद ताकतवर है. अमेरिकी मीडिया के हवाले से ये खबर भी आई कि इन दोनों देशों ने अमेरिका पर दवाब डाला कि ईरान पर हमला करके उसे पूरी तरह बरबाद कर डाले.

खाड़ी के देश भी दिखे थे बेबस
लेकिन यह सच है कि इन 40 दिनों में जो मुल्क पश्चिम एशिया का बादशाह बन कर उभरा है, वह ईरान है. उसने अमेरिकी-इज़रायली हमले में काफी चोट खाने के बावजूद जम कर मुक़ाबला किया. उसने बताया कि उसकी सैन्य ताकत और उसके मिसाइल व ड्रोन भंडार आसानी से ख़त्म नहीं किए जा सकते. जिस तरह ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और उनकी तेल रिफाइनरियों पर हमला किए उससे उसकी बढ़ी हुई ताकत का एहसास समूची दुनिया को हुआ. ईरान ने यह भी दिखा दिया कि इजरायल के कई लेयर के एयर डिफेंस सिस्टम को कैसे नाकाम किया जाता है . ईरानी हमले के आगे खाड़ी के देश बेबस नजर आए . सिवाय आलोचना के खाड़ी के तमाम देशों में से किसी देश की हिम्मत नही हुई कि वह ईरानी हमले का सीधा जवाब दे. अमेरिका का साथ देने की वजह से यूएई जैसे देशों पर तो ईरान ने इतने हमले किये उससे उबरने में उसे सालों लगेंगे .
डेडलाइन पर डेडलाइन देते रहे ट्रंप
ईरान का दावा है कि अमेरिका ने उसके सारे 10 सूत्री प्रस्ताव पर सहमति दे दी है . इनमें ईरान पर हमले रोकना , प्रतिबंध हटाना और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण शामिल है . दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्रपति के आगे ईरान ने घुटने टेकने से इंकार कर दिया . नतीजा ये रहा है कि ट्रंप डेडलाइन पर डेडलाइन देते रहे है और ईरान उतने तेजी से अमेरिका के सहयोगियों पर पलटवार करता रहा .अब वह निर्विवाद तौर जंग का विजेता बन कर उभरा है . यह सही है कि इस जंग से ईरान को बहुत नुकसान हुआ है लेकिन उसकी मिसाइल और ड्रोन की ताकत का लोहा पूरे दुनिया मान चुकी है.ऐसे में अब मिडिल ईस्ट में सऊदी अरब और यूएई का पहले जैसा रुतबा नही रहने की उम्मीद है .
खाड़ी देशों को अब यह भी डर बना रहेगा कि वह अमेरिका से दूरी बनाए नही तो कही फिर ईरान का उसे निशाना ना बनना पड़े . ईरान पहले ही इन खाड़ी देशों के धमकी दे चुका है कि वह अपने यहां से अमेरिकी सैन्य ठिकाने को हटाए .लेकिन ईरान ने एक कूटनीतिक चाल भी खेली है. उलने कहा है कि किसी भी खाड़ी देश के साथ उसकी कोई दुश्मनी है. जाहिर है, यह ख़ुद को अलग-थलग पड़ने से बचाने की क़वायद है. ईरान का इशारा ये भी है कि खाड़ी के देश सुरक्षा के लिए उस पर भरोसा कर सकते हैं. साफ़ है कि पश्चिम एशिया में जो सर्वस्वीकृत नेतृत्व का संकट है, ईरान अब उसे भरने की कोशिश कर सकता है.
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