ब्रिटेन की 56 वर्षीय महिला वेंडी डफी शारीरिक रूप से स्वस्थ और मानसिक रूप से पूरी तरह स्थिर होने के बावजूद मौत को गले लगाने जा रही हैं. उन्होंने स्विट्जरलैंड के मशहूर और विवादित 'सुसाइड क्लिनिक' पेगासस में इच्छामृत्यु के लिए आवेदन किया है. यह खबर इसलिए हैरान करने वाली है क्योंकि आमतौर पर इच्छामृत्यु की मांग वो लोग करते हैं जो किसी लाइलाज बीमारी या असहनीय दर्द से गुजर रहे हों, लेकिन वेंडी के मामले में कहानी कुछ और है. वेंडी डफी की इस दुखद कहानी के पीछे की वजह उनका कोई शारीरिक रोग नहीं, बल्कि उनके इकलौते बेटे की मौत है. एक दुखद हादसे में अपने इकलौते बच्चे को खोने के बाद वेंडी इस कदर टूट गईं कि उन्हें अब जीवन में कोई अर्थ नजर नहीं आता.
डेली मेल को दिए इंटरव्यू में में वेंडी ने बहुत साफ शब्दों में कहा, "मैं मरना चाहती हूं और मैं यही करने जा रही हूं. माय लाइफ, मेरी च्वाइस." उनके इस फैसले ने ब्रिटेन में 'असिस्टेड डाइंग' (सहायता प्राप्त मृत्यु) को लेकर चल रही बहस को एक नई दिशा दे दी है.
मरने वाले को खुद के मौत के पैसा भी देना होता है
वेंडी का यह फैसला रातों-रात लिया गया कोई भावुक कदम नहीं है. स्विट्जरलैंड के पेगासस क्लिनिक में आवेदन करने के बाद, महीनों तक विशेषज्ञों और मनोचिकित्सकों के पैनल ने उनकी जांच की. विशेषज्ञों ने उनके मेडिकल रिकॉर्ड्स खंगाले और लंबी असेसमेंट प्रक्रिया के बाद यह माना कि उनका मानसिक दुख इतना गहरा है कि वह इच्छामृत्यु की हकदार हैं.
आपको बता दें कि स्विट्जरलैंड के कानून के अनुसार, इच्छामृत्यु से मुनाफा कमाना प्रतिबंधित है, इसलिए पेगासस एक गैर-लाभकारी संस्था के रूप में काम करती है जहां आवेदक को केवल दवा, डॉक्टर और अंतिम संस्कार का खर्च उठाना पड़ता है.
कानूनी पेचीदगियां क्या हैं?
अपनी मौत की योजना बनाते समय वेंडी ने अपने परिवार की सुरक्षा का भी पूरा ख्याल रखा है. उनके चार बहनें और दो भाई हैं, जिन्हें उन्होंने अपने फैसले के बारे में बता तो दिया है, लेकिन मौत की सटीक तारीख और समय को गुप्त रखा है.
वेंडी डफी का मामला ऐसे समय में सामने आया है जब ब्रिटेन की संसद (हाउस ऑफ लॉर्ड्स) में 'असिस्टेड डाइंग बिल' को लेकर तीखी बहस चल रही है. विरोध करने वालों का तर्क है कि यदि लाइलाज बीमारों को मरने का अधिकार दिया गया, तो धीरे-धीरे उन लोगों के लिए भी रास्ता खुल जाएगा जो शारीरिक रूप से स्वस्थ हैं लेकिन जीवन से निराश हैं.
आलोचकों का कहना है कि वेंडी जैसे मामलों में समाधान मौत नहीं, बल्कि बेहतर ट्रॉमा मैनेजमेंट और मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं होनी चाहिए. वहीं, इस कानून के समर्थकों का कहना है कि हर व्यक्ति को अपने जीवन और मृत्यु पर अधिकार होना चाहिए.
यह भी पढ़ें: एक और बरमूडा ट्रायंगल! दिल्ली से 20 गुना छोटा समंदर का यह हिस्सा 124 जहाज क्यों निगल गया?