- अल कायदा खत्म नहीं हुआ. बिन लादेन और जवाहिरी की मौत के बावजूद संगठन का नेटवर्क और विचारधारा कायम है.
- सोमालिया और सहेल में अल-शबाब और जेएनआईएम जैसे गुट प्रभाव बढ़ा रहे हैं.
- एक केंद्रीकृत संगठन के बजाय आज अल कायदा ज्यादा बिखरे हुए क्षेत्रीय नेटवर्क के रूप में काम करता है.
11 सितंबर 2001 को अमेरिका में हुए आतंकी हमलों ने पूरी दुनिया की सुरक्षा नीति बदल दी थी. अल कायदा के 19 आतंकियों ने चार यात्री विमानों का अपहरण किया. इनमें से दो विमान न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की इमारतों से टकराए, एक पेंटागन से और चौथा विमान पेंसिल्वेनिया में गिर गया. इन हमलों में करीब 3000 लोगों की मौत हुई. इसके बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में सैन्य अभियान शुरू किया. अल कायदा का ठिकाना बिखर गया और उसके नेता अलग-अलग जगहों पर छिप गए. लेकिन उस दर्दनाक घटना के 25 साल बाद आज भी सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अल कायदा खत्म हो गया?
और इसका सीधा जवाब 'नहीं' है.
संगठन का पुराना ढांचा कमजोर जरूर हुआ, लेकिन उसकी विचारधारा और उससे जुड़े क्षेत्रीय संगठन आज भी कई हिस्सों में सक्रिय हैं. खासकर अफ्रीका में इसकी पकड़ चिंता का कारण बनी हुई है.
अल कायदा है क्या?
अल कायदा की शुरुआत 1980 के दशक के आखिर में ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में हुई थी. अफगानिस्तान में सोवियत सेना के खिलाफ लड़ने वाले अरब लड़ाकों के लिए बिन लादेन ने लोगों और संसाधनों को जुटाया था. बाद में यही नेटवर्क अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के खिलाफ हिंसक अभियान का केंद्र बन गया.
इसने 1998 में केन्या और तंजानिया में अमेरिकी दूतावासों पर बम धमाके की जिम्मेदारी ली जिसमें 224 लोगों की मौत हुई थी. इसके तीन साल बाद 9/11 हमले ने अल कायदा को पूरी दुनिया में आतंकवाद का सबसे चर्चित नाम बना दिया.

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9/11 के बाद अल कायदा के नेताओं का क्या हुआ?
अमेरिका के अफगानिस्तान अभियान के बाद अल कायदा को अपना पुराना सुरक्षित ठिकाना छोड़ना पड़ा.
दिसंबर 2001 में तोरा बोरा इलाके में अमेरिकी और तालिबान विरोधी बलों ने अल कायदा के ठिकानों पर कार्रवाई की. लेकिन बिन लादेन बच निकला.
करीब एक दशक बाद 2011 में अमेरिकी विशेष बलों ने पाकिस्तान के एबटाबाद में उसे मार गिराया.
9/11 की साजिश के प्रमुख आरोपी खालिद शेख मोहम्मद को 2003 में पाकिस्तान में गिरफ्तार किया गया. वह आज भी ग्वांतानामो बे में बंद है.
बिन लादेन के बाद अयमान अल-जवाहिरी ने संगठन की कमान संभाली. 2022 में काबुल में अमेरिकी ड्रोन हमले में उसकी मौत हो गई.
आज संगठन के वास्तविक नेतृत्व की कमान मिस्र के सैफ अल-अदेल के हाथ में मानी जाती है.
इस खबर में क्या अहम है?
सबसे अहम बात यह है कि 11 सितंबर 2001 में अमेरिका में किए गए हमले के 25 साल बाद अल कायदा अब वैसा संगठन नहीं है जैसा 9/11 के समय था.
उस समय बिन लादेन के नेतृत्व में एक अपेक्षाकृत केंद्रीकृत नेटवर्क था. आज संगठन ज्यादा बिखरा हुआ है. इसके अलग-अलग क्षेत्रीय संगठन अपने-अपने इलाकों में काम करते हैं.
यानी अल कायदा की ताकत अब केवल उसके केंद्रीय नेतृत्व से नहीं आती. उसका असर उससे जुड़े संगठनों और उसकी विचारधारा से भी बना हुआ है.
आतंकवाद और आंतक विरोधी चुनौतियों को समझने के लिए जानकारी, सलाह और रिसर्च करने वाली संस्था कॉम्बैटिंग टेरोरिज्म सेंटर ऐट वेस्ट पॉइंट के मुताबिक आज संगठन कम लोगों पर निर्भर रहने और कम दिखाई देने वाले ढांचे के जरिए काम करता है. इसका मानना है कि किसी एक नेता को मार देना पूरे नेटवर्क को खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है.

9/11 हमले के बाद अल कायदा
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9/11 के बाद इसका असर कैसे फैला?
अल कायदा से जुड़े या उसकी विचारधारा से प्रभावित संगठनों ने अलग-अलग देशों में हमले किए.
2002 में इंडोनेशिया के बाली में हुए हमले में 202 लोगों की मौत हुई. 2004 में मैड्रिड में ट्रेन धमाकों में 190 से ज्यादा लोग मारे गए. 2005 में लंदन में ट्रेन और बस पर आत्मघाती हमलों में 52 लोगों की मौत हुई.
इसी दौरान अल कायदा की अलग-अलग शाखाएं भी सामने आती गईं.
इराक में इसका एक मजबूत गुट बना. बाद में उत्तर अफ्रीका, यमन और सीरिया में भी इसके संगठन सक्रिय हुए.
अफ्रीका में अल-शबाब और सहेल क्षेत्र में जेएनआईएम यानी जमात नुसरत अल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन इस के सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी संगठनों में गिने जाते हैं. संयुक्त राष्ट्र भी जेएनआईएम को अल कायदा की शाखा के रूप में पहचानता है.
दिलचस्प बात ये है...
अल कायदा की सबसे बड़ी चुनौती केवल अमेरिका नहीं रहा. उसे अपने ही पुराने नेटवर्क से निकले इस्लामिक स्टेट से भी मुकाबला करना पड़ा.
अबू बकर अल-बगदादी ने अल कायदा से अलग होकर 2014 में इराक और सीरिया के बड़े हिस्से में तथाकथित खिलाफत का ऐलान किया.
इसके बाद अल कायदा और इस्लामिक स्टेट के बीच वर्चस्व की लड़ाई शुरू हुई.
इस्लामिक स्टेट ने कुछ समय के लिए अल कायदा को पीछे छोड़ दिया, लेकिन बाद में इराक और सीरिया में उसका क्षेत्रीय नियंत्रण टूट गया. इसके बावजूद दोनों संगठनों से जुड़े गुट आज भी खासकर अफ्रीका में प्रभाव और इलाके के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं.

अल कायदा आज सबसे ज्यादा कहां सक्रिय है?
आज अफ्रीका अल कायदा के लिए सबसे महत्वपूर्ण इलाकों में से एक बन चुका है.
थिंक टैंक काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के मुताबिक सोमालिया और पश्चिमी अफ्रीका का सहेल क्षेत्र इसके प्रमुख केंद्र हैं. यहां अल-शबाब और जेएनआईएम जैसे संगठन कमजोर सरकारों, स्थानीय संघर्षों और सुरक्षा की कमी का फायदा उठाकर अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं.
पाकिस्तान में भी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी टीटीपी सक्रिय है. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों में अल कायदा और टीटीपी के बीच वैचारिक, प्रशिक्षण और दूसरे तरह के संबंधों का उल्लेख किया गया है.

अफगानिस्तान अब भी अल कायदा की कहानी का अहम हिस्सा है
अफगानिस्तान कनेक्शन कितना अहम है?
तालिबान 2021 में सत्ता में वापस आया. पाकिस्तान लगातार आरोप लगाता रहा है कि टीटीपी के नेता और लड़ाके अफगानिस्तान में मौजूद हैं.
संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्टों ने भी अफगानिस्तान में अल कायदा की मौजूदगी और तालिबान के साथ उसके संबंधों को लेकर चिंता जताई है.
तालिबान इन आरोपों को खारिज करता है और कहता है कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल दूसरे देशों के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों के लिए नहीं होने देता.

अल कायदा की आज की स्थिति क्या है?
25 साल में अल कायदा की सबसे बड़ी तब्दीली शायद यही है कि यह अब सिर्फ एक संगठन नहीं, बल्कि एक फैला हुआ नेटवर्क है.
बिन लादेन और जवाहिरी जैसे बड़े नेताओं को खत्म करने से संगठन की केंद्रीय ताकत जरूर कमजोर हुई, लेकिन इससे उसकी विचारधारा खत्म नहीं हुई.
आज क्षेत्रीय गुट स्थानीय समस्याओं को अपनी विचारधारा से जोड़ते हैं. यही वजह है कि अफ्रीका के कुछ हिस्सों में अल कायदा से जुड़े संगठन केवल हमले करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इलाके, संसाधनों और स्थानीय आबादी पर प्रभाव जमाने की कोशिश करते हैं.
घातक संघर्षों को रोकने के लिए प्रतिबद्ध संगठन इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के मुताबिक सहेल में जेएनआईएम का विस्तार इसी बदलती रणनीति का उदाहरण है.

2001 और आज के अल कायदा क्या एक ही पहलू हैं?
यह भी समझना जरूरी है कि अल कायदा को आज 2001 के अल कायदा के बराबर मानना सही नहीं होगा.
उसकी केंद्रीय नेतृत्व क्षमता पहले जैसी नहीं है. अमेरिका और दूसरे देशों की लंबे समय से चल रही आतंकवाद विरोधी कार्रवाई ने उसके पुराने ढांचे को काफी नुकसान पहुंचाया है.
लेकिन दूसरी तरफ, उसके क्षेत्रीय सहयोगी कुछ इलाकों में ज्यादा मजबूत हुए हैं.
कॉम्बैटिंग टेरोरिज्म सेंटर ऐट वेस्ट पॉइंट का कहना है कि इसलिए आज खतरा किसी एक बड़े 9/11 जैसे हमले से ही नहीं, बल्कि छोटे-बड़े क्षेत्रीय संघर्षों, स्थानीय आतंकवाद और लंबे समय तक चलने वाली अस्थिरतासे भी जुड़ा है.

Why did Al Qaeda terrorists choose Bhiwadi
तो अल कायदा की आज की असलियत क्या है?
अल कायदा खत्म नहीं हुआ है, लेकिन वह बदल गया है.
ओसामा बिन लादेन की मौत, जवाहिरी की मौत और इस्लामिक स्टेट के उभार ने उसके पुराने स्वरूप को कमजोर किया. लेकिन संगठन ने अपने क्षेत्रीय गुटों के जरिए खुद को बनाए रखा.
आज उसका सबसे बड़ा प्रभाव अफ्रीका और कुछ हद तक दक्षिण एशिया में दिखाई देता है.
यही वजह है कि विशेषज्ञ इसे खत्म हो चुका संगठन मानने के बजाय एक ऐसा नेटवर्क मानते हैं जो कम दिखाई देते हुए भी लंबे समय तक सक्रिय रह सकता है.
कुल मिलाकर अल कायदा की स्थिति आज क्या है?
25 साल पहले अल कायदा ने एक ऐसे हमले को अंजाम दिया जिसने पूरी दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था बदल दी. आज बिन लादेन नहीं है, उसका पुराना नेटवर्क भी नहीं है और इस्लामिक स्टेट ने भी उसे चुनौती दी है. फिर भी अल कायदा की विचारधारा और उससे जुड़े गुट जिंदा हैं.
यानी 9/11 का अल कायदा कमजोर हुआ है, लेकिन खत्म नहीं. उसने अपना चेहरा बदला है, अपना तरीका बदला है और अपना असर नए इलाकों तक फैलाया है.
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