ट्रंप प्रशासन ने 3 जनवरी 2026 को एक ऐसा कदम उठाया जिसने अमेरिकी विदेश नीति की स्थापित सीमाओं को तोड़ दिया. अमेरिकी सैन्य बलों ने वेनेज़ुएला पर हवाई हमले किए,राजधानी कराकास में प्रमुख ठिकानों को निशाना बनाया और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में लेकर अमेरिका ले जाया गया, जहां उन पर मादक पदार्थ तस्करी से जुड़े आरोपों में मुकदमा चलाने की तैयारी की गई. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस कार्रवाई को अमेरिकी शक्ति की पुनर्स्थापना के रूप में पेश किया. उन्होंने घोषणा की कि अमेरिका 'अपनी ताकत फिर से स्थापित कर रहा है'. उन्होंने यह भी कहा कि वेनेज़ुएला को तब तक अमेरिका 'चलाएगा', जब तक वहां 'सुरक्षित, उचित और विवेकपूर्ण सत्ता परिवर्तन' नहीं हो जाता. अंतरराष्ट्रीय समुदाय के एक बड़े हिस्से के लिए यह संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून का स्पष्ट उल्लंघन था, लेकिन ट्रंप व्हाइट हाउस के लिए यह दिसंबर 2025 में जारी नई अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में वर्णित तथाकथित 'डॉनरो सिद्धांत' का पहला ठोस क्रियान्वयन था. यह सिद्धांत पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी प्रभाव क्षेत्र को खुले तौर पर पुनर्स्थापित करता है और मांग करता है कि लैटिन अमेरिका राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य रूप से अमेरिका के नियंत्रण में रहे. व्यवहार में, वेनेज़ुएला पर हमले ने इसी सोच को उजागर किया. प्रशासन ने इसे 'नार्को-आतंकवाद' और ड्रग तस्करी के खिलाफ कार्रवाई बताया, लेकिन इसके पीछे कहीं अधिक व्यापक रणनीतिक उद्देश्य स्पष्ट थे. दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक वेनेज़ुएला में स्थित है, और ट्रंप ने तुरंत अमेरिकी तेल कंपनियों को वहां भेजने की बात कही है. इसके साथ ही, वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा लैटिन अमेरिका में है, जो मौजूदा भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में रणनीतिक संपत्ति बन चुके हैं. इस प्रकार, यह हमला केवल कानून-प्रवर्तन की कार्रवाई नहीं था, बल्कि अमेरिकी कठोर शक्ति का प्रदर्शन था, जिसका उद्देश्य क्षेत्र में किसी भी प्रतिद्वंद्वी प्रभाव, विशेष रूप से चीन और रूस को रोकना था.
अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति
इन हमलों को समझने के लिए उन्हें ट्रंप प्रशासन की संशोधित गोलार्द्धीय रणनीति के संदर्भ में देखना आवश्यक है. दिसंबर 2025 की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में स्पष्ट रूप से एक नए 'ट्रंप कोरोलरी' की बात की गई है, जो मुनरो सिद्धांत का आधुनिक संस्करण है. इस दस्तावेज में बिना किसी संकोच के कहा गया है कि पश्चिमी गोलार्ध अमेरिका के लिए एक विशिष्ट प्रभाव क्षेत्र है, जहां विदेशी शक्तियों की भूमिका स्वीकार्य नहीं होगी. यह दृष्टिकोण कूटनीति की तुलना में दबाव और सैन्य शक्ति पर अधिक भरोसा करता है. इसके परिणामस्वरूप लैटिन अमेरिका में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति अभूतपूर्व रूप से बढ़ी है. रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी सेना का एक बड़ा हिस्सा अब इस क्षेत्र में तैनात है, जिसे 1962 के क्यूबा मिसाइल संकट के बाद सबसे बड़ा सैन्य जमावड़ा माना जा रहा है. आधिकारिक तौर पर यह तैनाती ड्रग तस्करी और अवैध प्रवासन को रोकने के लिए बताई जाती है, लेकिन व्यापक उद्देश्य स्पष्ट है: चीन और अन्य शक्तियों को इस क्षेत्र के रणनीतिक संसाधनों और ढांचागत परियोजनाओं से दूर रखना. वेनेज़ुएला के खिलाफ तेल अवरोध और समुद्री निगरानी इस नीति का हिस्सा हैं. इस प्रकार, डॉनरो सिद्धांत मूलतः लैटिन अमेरिका पर अमेरिकी वर्चस्व को पुनः स्थापित करने का प्रयास है.

वेनेजुएला पर अमेरिका के हमले के विरोध में ओहिय़ो में प्रदर्शन करते अमेरिकी नागरिक.
ऐतिहासिक दृष्टि से यह सिद्धांत उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की अमेरिकी नीतियों की याद दिलाता है. 1823 का मुनरो सिद्धांत यूरोपीय उपनिवेशवाद के खिलाफ था, लेकिन धीरे-धीरे यह अमेरिका के क्षेत्रीय प्रभुत्व का औजार बन गया. बीसवीं सदी की शुरुआत में रूजवेल्ट कोरोलरी ने यह दावा किया कि अमेरिका को लैटिन अमेरिका में 'अंतरराष्ट्रीय पुलिस' की भूमिका निभाने का अधिकार है.ट्रंप का 'डॉनरो सिद्धांत' इसी परंपरा का विस्तार है, हालांकि इसकी भाषा और औचित्य बदल चुके हैं. अब यह लोकतंत्र या वैचारिक संघर्ष से कम और संसाधनों, सुरक्षा और महान शक्ति प्रतिस्पर्धा से अधिक जुड़ा है. यह रोनाल्ड रीगन युग की उन नीतियों से भी मेल खाता है, जिनमें अमेरिका ने क्षेत्र में अवांछित सरकारों के खिलाफ हस्तक्षेप किया था. साथ ही, इसकी एकतरफा कार्रवाई और पूर्व-प्रहार की प्रवृत्ति 9/11 के बाद के बुश सिद्धांत की याद दिलाती है. इस प्रकार, डॉनरो सिद्धांत पुराने सिद्धांतों का एक समकालीन मिश्रण है, जो अमेरिका को अपने हितों की रक्षा के लिए बल प्रयोग का खुला अधिकार देता है.
वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के दृष्टिकोण से यह कार्रवाई गंभीर प्रश्न खड़े करती है. उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था संप्रभुता, गैर-हस्तक्षेप और नियम-आधारित व्यवस्था पर आधारित है. वेनेज़ुएला पर अमेरिकी हमला इन सभी सिद्धांतों के विपरीत जाता है. न तो यह आत्मरक्षा का मामला था और न ही इसे संयुक्त राष्ट्र की स्वीकृति प्राप्त थी. अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं तीखी थीं.फ्रांस ने इसे बल प्रयोग के सिद्धांत का उल्लंघन बताया, चीन ने इसे अमेरिकी आधिपत्य की मिसाल कहा और कई लैटिन अमेरिकी देशों ने इसे सीधा आक्रमण करार दिया. ब्राजील के राष्ट्रपति ने चेतावनी दी कि इस तरह की कार्रवाइयां दुनिया को अराजकता और अस्थिरता की ओर ले जाती हैं, जहां ताकत ही कानून बन जाता है. इस संदर्भ में, डॉनरो सिद्धांत उस नियम-आधारित व्यवस्था को कमजोर करता है, जिसे अमेरिका लंबे समय तक बढ़ावा देता रहा है.

अमेरिकी हमले के खिलाफ राजधानी कराकास के एक चौराहे पर प्रदर्शन करती वेनेजुएला की एक महिला.
इस नीति के दूरगामी प्रभाव वैश्विक राजनीति पर भी पड़ते हैं. जब अमेरिका अंतरराष्ट्रीय कानून की अनदेखी करता है, तो अन्य शक्तियों के लिए भी ऐसा करने का नैतिक औचित्य बन जाता है. यह चीन और रूस जैसे देशों को यह संकेत देता है कि वैश्विक राजनीति अब खुले तौर पर शक्ति-संतुलन और प्रभाव क्षेत्रों की ओर लौट रही है.वेनेज़ुएला की घटना केवल एक क्षेत्रीय संदेश नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर अमेरिकी दृढ़ता और प्रभुत्व का प्रदर्शन है. इससे महान शक्ति प्रतिस्पर्धा और तीव्र हो सकती है, जहां नियमों की जगह रणनीतिक मजबूरियां निर्णायक बन जाएंगी.
क्या निकोलस मादुरो के जाने से वेनेजुएला में 'लोकतंत्र' आएगा
क्षेत्रीय स्तर पर इसके परिणाम और भी जटिल हैं. ट्रंप प्रशासन का दावा है कि मादुरो को हटाने से वेनेज़ुएला में लोकतांत्रिक सत्ता परिवर्तन का रास्ता खुलेगा, लेकिन इसकी कोई स्पष्ट योजना सामने नहीं आई है.देश पहले से ही गहरे आर्थिक और सामाजिक संकट में है, ऐसे में वहां अचानक से सरकार के चले जाने से अराजकता और हिंसा का खतरा बढ़ सकता है. पड़ोसी देशों को शरणार्थियों की नई लहर और सीमा पर अस्थिरता की आशंका है. इतिहास बताता है कि बाहरी हस्तक्षेप से सत्ता परिवर्तन अक्सर लंबे संघर्षों को जन्म देता है, जैसा कि इराक और लीबिया में देखा गया.
लैटिन अमेरिका की प्रतिक्रियाएं इस नीति की दुविधा को उजागर करती हैं. कुछ सरकारें निजी तौर पर मादुरो शासन के पतन का स्वागत कर सकती हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से उन्होंने संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून के पक्ष में आवाज उठाई है. मैक्सिको, कोलंबिया और चिली जैसे देशों ने स्पष्ट किया कि किसी भी परिस्थिति में सैन्य आक्रमण स्वीकार्य नहीं है. अगर अमेरिका की नीति को क्षेत्र में नई साम्राज्यवादी प्रवृत्ति के रूप में देखा गया, तो यह दीर्घकाल में सहयोग और विश्वास को कमजोर कर सकती है. यह कई देशों को वैकल्पिक साझेदारों, विशेषकर चीन की ओर झुकने के लिए प्रेरित कर सकती है.
अंततः, वेनेज़ुएला पर अमेरिकी हमले और डॉनरो सिद्धांत शक्ति और सिद्धांत के बीच तनाव को उजागर करते हैं. रणनीतिक रूप से यह अमेरिकी दृढ़ता और क्षमता का प्रदर्शन है और एक दमनकारी नेता को सत्ता से हटाने का दावा करता है.इसके साथ ही यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की नींव को हिला देता है. एक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्येता के दृष्टिकोण से, यह क्षण उन्नीसवीं सदी की बंदूक-नौका कूटनीति की वापसी जैसा प्रतीत होता है, लेकिन 21वीं सदी की जटिल वैश्विक संरचना में. इस कार्रवाई ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका अपने हितों की रक्षा के लिए नियमों से परे जाने को तैयार है. प्रश्न यह है कि क्या यह रणनीति दीर्घकाल में स्थिरता लाएगी या एक ऐसी दुनिया को जन्म देगी, जहां शक्ति ही अंतिम निर्णायक होगी.
डिस्क्लेमर: लेखक द इंडियन फ्यूचर्स थिंक टैंक के संस्थापक और दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.