- क्यूबा में तीसरी बार पूरे देश में बिजली गुल हो गई है.
- आम लोग अंधेरे में जीवन गुजारने को मजबूर हैं.
- ये नौबत अमेरिकी पाबंदियों की वजह से आई है.
जरा सोचिए, आप सुबह उठते हैं और मोबाइल में नेटवर्क गायब है. पंखे-एसी बंद हैं, नल खोलने पर पानी की एक बूंद नहीं टपकती और जेब में कैश न होने पर जब आप एटीएम जाते हैं, तो वहां भी सन्नाटा पसरा मिलता है. लेकिन फर्ज कीजिए ऐसा सिर्फ आपके साथ नहीं पूरे देश के साथ ही होने लगे. इस वक्त क्यूबा में ऐसा ही कुछ हो रहा है. 96 लाख की आबादी वाले इस खूबसूरत द्वीप देश में इस साल तीसरी बार पूरा का पूरा नेशनल ग्रिड फेल हो गया है. पूरे देश में एक साथ बत्ती गुल हो चुकी है.
क्यूबा में आई इस तबाही ने दुनिया के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है अगर किसी देश की बिजली एक साथ पूरी तरह ठप हो जाए, तो वहां की जिंदगी कैसे थम जाती है?
ठप हो जाता है संचार
बिजली जाते ही सबसे पहला झटका हमारे स्मार्टफोन और कनेक्टिविटी को लगता है. मोबाइल टावर और इंटरनेट राउटर बैकअप बैटरी या लोकल जनरेटर पर चलते हैं. लेकिन इनकी भी एक सीमा होती है. ब्लैकआउट होने के महज 2 से 4 घंटे के भीतर ये बैटरियां दम तोड़ देती हैं. नतीजा यह होता है कि पूरे देश में मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट पूरी तरह ठप हो जाता है. लोग न तो किसी को फोन कर पाते हैं और न ही दुनिया की कोई खबर उन तक पहुंचती है.

6 जुलाई, 2026 को हवाना में देश भर में ब्लैकआउट के दौरान लोग मालेकॉन के किनारे इकट्ठा हुए.
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यातायात पर भी असर पड़ता है
सड़कों पर लगी ट्रैफिक लाइटें पल भर में गुल हो जाती हैं. इससे बड़े शहरों के चौराहों पर भारी जाम लग जाता है. मेट्रो, इलेक्ट्रिक ट्रेनें और ट्राम जहां की तहां खड़ी हो जाती हैं. जो लोग सफर में हैं, वे रास्ते में ही फंस जाते हैं. क्यूबा में तो हालात इतने बुरे हैं कि ईंधन की कमी के कारण ट्रांसपोर्ट व्यवस्था लगभग पूरी तरह वेंटिलेटर पर आ चुकी है.
पैसों का लेन-देन पूरी तरह ठप हो जाता है
नेशनल ब्लैकआउट होते ही एटीएम मशीनें बंद हो जाती हैं. दुकानों पर स्वाइप मशीनें, डिजिटल बैंकिंग और ऑनलाइन पेमेंट पूरी तरह ब्लॉक हो जाते हैं. अगर आपके पास कैश नहीं है, तो आप एक पैकेट दूध या ब्रेड भी नहीं खरीद सकते. पूरा रिटेल मार्केट ठप हो जाता है. इससे आम जनजीवन पर गहरा असर होता है.

देशव्यापी ब्लैकआउट के दौरान एक आदमी एक विंटेज कार के अंदर बैठा है.
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बूंद-बूंद पानी तक को तरस जाते हैं लोग
बिजली जाने का सीधा असर पानी की सप्लाई पर पड़ता है. शहरों को पानी सप्लाई करने वाले बड़े-बड़े म्यूनिसिपल पंप बंद हो जाते हैं. ऊंची इमारतों और सोसायटियों में वॉटर प्रेशर खत्म हो जाता है और कुछ ही घंटों में घरों के नल सूख जाते हैं. पीने के साफ पानी और रोजमर्रा के काम के लिए हाहाकार मच जाता है.
किसी भी देश में ब्लैकआउट का सबसे खौफनाक असर अस्पतालों पर पड़ता है. हालांकि, अस्पतालों में कुछ समय के लिए जनरेटर का बैकअप होता है, लेकिन लंबे समय का ब्लैकआउट दवाओं और टीकों को सुरक्षित रखने वाले कोल्ड स्टोरेज को तबाह कर देता है. क्यूबा से आ रही रिपोर्टों के मुताबिक, वहां हालात इतने गंभीर हैं कि कई जरूरी सर्जरीज को टालना पड़ा है.
आखिर क्यूबा इस हालत में कैसे पहुंचा?
दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस साल जनवरी से क्यूबा की तेल सप्लाई पर पूरी तरह रोक लगा दी है. क्यूबा के बिजली घरों को चलाने के लिए ईंधन ही नहीं बचा है. जनवरी से लेकर अब तक वाशिंगटन ने सिर्फ एक रूसी तेल टैंकर को क्यूबा आने की इजाजत दी है. अमेरिका इस नाकेबंदी के जरिए क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार पर दबाव बनाना चाहता है.

लोग टॉर्च या इमरजेंसी लाइट के सहारे बैठे हैं.
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'जीना मुहाल हो गया है'
इस राजनीतिक खींचतान में आम जनता पिस रही है. हवाना की रहने वाली 51 वर्षीय मेबोल फॉन्ट कहती हैं, "इस तरह जीना एक असहनीय दर्द सा बन गया है."
उनके इलाके में दिन में सिर्फ 3 या 4 घंटे बिजली आ रही थी, लेकिन अब टोटल ब्लैकआउट ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी. फॉन्ट कहती हैं कि सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि किसी को नहीं पता कि बिजली कब आएगी.
वहीं पर्यटन से जुड़े एक स्टार्टअप में काम करने वाले युवा सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा, "हमारे पास न वाई-फाई है, न बिजली है. हम कोई काम नहीं कर पा रहे हैं." ग्रामीण इलाकों में तो 70-70 घंटे तक लगातार बिजली गुल रह रही है.
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