चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपनी सेना (PLA) के भीतर चल रही 'सफाई अभियान' के तहत अब तक का सबसे बड़ा और सख्त कदम उठाया है. चीन की सैन्य अदालत ने भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के मामले में देश के दो पूर्व रक्षा मंत्रियों शांगफू और वेई फेंगहे को मौत की सजा सुनाई है. यह सजा 'दो साल की मोहलत' के साथ दी गई है, जिसका मतलब है कि अगर दो साल तक उनका व्यवहार अच्छा रहता है, तो इसे उम्रकैद में बदला जा सकता है.
जिनपिंग सरकार के इस फैसले ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है. अदालत ने साफ किया है कि इन दोनों पूर्व मंत्रियों को अब कभी पैरोल नहीं मिलेगी और उनके सभी राजनीतिक अधिकार और निजी संपत्ति जब्त कर ली गई है. ली शांगफू साल 2023 में महज सात महीने के लिए रक्षा मंत्री रहे थे, जबकि वेई फेंगहे उनसे पहले पांच साल तक इस पद पर तैनात थे. इस सजा के जरिए जिनपिंग ने अपने जनरल और अधिकारियों को साफ संदेश दिया है कि ऊंचे पद और रसूख भी उन्हें सजा से नहीं बचा सकते.
संवेदनशील हथियारों में हेरफेर का आरोप
ली पर आरोप है कि उन्होंने सैन्य नियुक्तियों में हेरफेर किया और पद के बदले पैसे लिए. जिनपिंग प्रशासन इसे "पार्टी अनुशासन और कानून का गंभीर उल्लंघन" मान रहा है.
शी जिनपिंग आखिर चाहते क्या हैं?
शी जिनपिंग ने 2012 में सत्ता संभालने के बाद से ही भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया है. जानकारों का मानना है कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की आड़ में जिनपिंग उन प्रतिद्वंद्वियों को ठिकाने लगा रहे हैं, जिनसे उन्हें अपनी सत्ता के लिए खतरा महसूस होता है. 'सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज' (CSIS) के एक अध्ययन के मुताबिक, 2022 से अब तक 100 से अधिक वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को उनके पदों से हटाया जा चुका है या उनके खिलाफ जांच चल रही है.
क्या जिनपिंग की पकड़ कमजोर हो रही है ?
रक्षा मंत्रियों को मौत की सजा सुनाना यह दिखाता है कि जिनपिंग को अपनी ही सेना के शीर्ष नेतृत्व पर भरोसा नहीं रह गया है. पीएलए की 'रॉकेट फोर्स' और 'प्रोक्योरमेंट विभाग' में जिस तरह का भ्रष्टाचार सामने आया है, उसने चीनी सेना की युद्धक क्षमता को लेकर बीजिंग की चिंताओं को बढ़ा दिया है. जिनपिंग चाहते हैं कि सेना पूरी तरह से उनके और कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति वफादार रहे. हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि इस तरह की सख्त सजाएं सेना के भीतर असंतोष को भी जन्म दे सकती हैं.
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