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बांग्लादेश में संविधान को ठेंगा दिखाकर चलाई यूनुस ने सरकार, सत्ता बदलते ही फूटा राष्ट्रपति का गुबार

बीएनपी सरकार बनते ही राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने पिछली अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं.

बांग्लादेश में संविधान को ठेंगा दिखाकर चलाई यूनुस ने सरकार, सत्ता बदलते ही फूटा राष्ट्रपति का गुबार
  • बांग्लादेश के राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने पिछली यूनुस सरकार पर संवैधान के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया है
  • राष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें अहम चर्चाओं और विदेश दौरों तक की जानकारी नहीं दी गई और उनसे संपर्क नहीं किया गया
  • उन्होंने गैर-संवैधानिक तरीके से पद से हटाने की साजिशों का आरोप लगाते हुए कहा कि उनके अधिकार सीमित कर दिए गए
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बांग्लादेश में सत्ता बदलते ही मुहम्मद यूनुस की अगुआई वाली अंतरिम सरकार की पोल खुलने लगी है. खुद बांग्लादेश के राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने यूनुस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं. राष्ट्रपति शहाबुद्दीन ने दावा किया कि यूनुस ने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को ठीक से नहीं निभाया. राष्ट्रपति को न सिर्फ अहम चर्चाओं से दूर रखा बल्कि उन्हें हटाने तक की साजिश रचकर देश को अस्थिर करने का प्रयास किया.

मेरे खिलाफ साजिशें रची गईंः राष्ट्रपति

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की सरकार बनते ही राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने अपने मन का गुबार निकालने शुरू कर दिया है. उन्होंने यूनुस पर देश के संवैधानिक राष्ट्रपति पद को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया है.  बांग्लादेशी मीडिया कालेर कंठो को दिए इंटरव्यू में यूनुस के शासनकाल को लेकर राष्ट्रपति शहाबुद्दीन ने कहा, "उन डेढ़ सालों में मैं किसी चर्चा में नहीं रहा, फिर भी मेरे खिलाफ तरह-तरह की साजिशें रची जा रही हैं. 

डेढ़ साल का अनुभव अच्छा नहीं रहा

उन्होंने कहा कि देश की शांति और व्यवस्था को हमेशा के लिए खत्म करने और संवैधानिक खालीपन पैदा करने की कई कोशिशें हुई हैं. मैं अपने फैसले पर अडिग था, इसीलिए उनकी कोई साजिश कामयाब नहीं हुई. खासकर गैर-संवैधानिक तरीकों से प्रेसिडेंट को हटाने की कई साजिशें नाकाम हो गईं. इसलिए बंगभवन में डेढ़ साल का अनुभव अच्छा नहीं कहा जा सकता."

बांग्लादेश के राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने मो. यूनुस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है.

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जज को राष्ट्रपति बनाने की कोशिश की

राष्ट्रपति ने आगे कहा, "आज मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि अंतरिम सरकार ने गैर-संवैधानिक तरीके से एक पुराने चीफ जस्टिस को लाने और मेरी जगह किसी और को लाने की साजिश की है. मुझे इसके बारे में पता चला. सरकार के एक सलाहकार ने जज से संपर्क किया. उन्होंने एक घंटे तक मीटिंग की. लेकिन जज नहीं माने. उन्होंने साफ कहा कि वह राष्ट्रपति हैं, वह संवैधानिक रूप से सबसे ऊपर हैं, हर चीज से ऊपर हैं. मैं उस जगह पर गैर-संवैधानिक तरीके से नहीं बैठ सकता.' जज की मजबूती के कारण सरकार की वह कोशिश भी आखिर फेल हो गई."

विदेशी दौरों के बारे में बताया तक नहीं

बीते डेढ़ सालों में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के फैसलों पर भी राष्ट्रपति ने सवाल उठाए. उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्य सलाहकार ने संविधान के किसी भी नियम का पालन नहीं किया. यूनुस ने संविधान के हिसाब से बांग्लादेशी राष्ट्रपति को अपने किसी भी दौरे या उन दौरों पर क्या चर्चा हुई, इसको लेकर किसी भी तरह की जानकारी नहीं दी. उन्होंने कहा, "वह 14-15 बार विदेश यात्रा पर गए होंगे. उन्होंने मुझे कभी नहीं बताया. वह कभी मेरे पास नहीं आए." बांग्लादेशी राष्ट्रपति ने अमेरिका और बांग्लादेश के बीच यूनुस के शासन में हुए समझौते को लेकर बताया कि इसके बारे में भी उन्हें कोई जानकारी नहीं दी गई थी. 

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न भी मिलने आए, न चिट्ठी लिखी

राष्ट्रपति शहाबुद्दीन ने आरोप लगाया कि उनका इस्तेमाल यूनुस को मुख्य सलाहकार बनाए जाने तक किया गया. इसके बाद एक बार भी यूनुस उनके पास नहीं आए, ना उनसे मुलाकात की और ना ही कोई चिट्ठी लिखी. राष्ट्रपति शहाबुद्दीन ने कहा, "यूनुस ने मुझे पूरी तरह से छिपाने की कोशिश की. उन्होंने दो बार मेरे विदेश दौरे रोक दिए. प्रेस विंग को पूरी तरह से खत्म कर दिया गया. हम यहां से कोई प्रेस रिलीज नहीं दे सकते. अगर बांग्लादेश क्रिकेट टीम कहीं जीतती है तो मैं उसे बधाई देने के लिए भी प्रेस रिलीज नहीं दे सकता."

यूनुस के अध्यादेशों पर उठाए सवाल

क्या पूर्व चीफ एडवाइजर ने राज्य के फैसलों पर राष्ट्रपति से कोई मशविरा किया, जिसमें 133 अध्यादेश जारी करना भी शामिल था. शहाबुद्दीन ने कहा कि हालांकि कुछ हालात की वजह से जरूरी हो सकते हैं, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में जारी करने का कोई मतलब नहीं था. जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें चुनावों से पहले अंतरिम सरकार द्वारा अमेरिका के साथ किए गए आखिरी समझौते के बारे में पता था, तो राष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं थी.

राष्ट्रपति ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए कहा, “ऐसे सरकारी समझौते के बारे में मुझे बताया जाना चाहिए था. चाहे वह छोटा हो या बड़ा, बेशक पिछली सरकारों के प्रमुखों ने राष्ट्रपति को बताया था और यह एक संवैधानिक जिम्मेदारी है. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने मुझे न तो बोलकर बताया, न ही लिखकर. वे आए ही नहीं.”

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