- पाकिस्तान में 2021 से 2025 के बीच अल्पसंख्यक लड़कियों के अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन के 515 मामले दर्ज किए गए.
- पीड़ितों में अधिकांश हिंदू और ईसाई समुदाय की लड़कियां हैं, जिनमें कुछ सिख लड़कियों के मामले भी शामिल हैं.
- आधे से अधिक पीड़ित लड़कियों की उम्र चौदह से अठारह वर्ष के बीच है, जबकि बीस प्रतिशत नाबालिग हैं.
अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए काम करने वाले एक प्रमुख संगठन ने 2021 से 2025 के बीच पूरे पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों के अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन के एक चिंताजनक चलन की ओर ध्यान दिलाया है, जिसके तहत इस दौरान 515 मामले दर्ज किए गए. अलग-अलग आंकड़ों का हवाला देते हुए, वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी (वीओपीएम) ने बताया कि भले ही ये आंकड़े सिर्फ अंक लगें, लेकिन हर एक नंबर एक मानवीय त्रासदी को दिखाता है—"एक डरी हुई लड़की, एक तबाह परिवार, और एक ऐसा समुदाय जो लगातार डर के साए में जी रहा है."
रिपोर्ट के मुताबिक, पीड़ितों में 69 प्रतिशत हिंदू लड़कियां हैं, उसके बाद 31 प्रतिशत ईसाई समुदाय से हैं, जबकि कुछ मामले सिख लड़कियों के भी हैं. वीओपीएम ने कहा, "ये आंकड़े उन अल्पसंख्यक समुदायों की कमजोरी को दिखाते हैं जो पहले से ही समाज के हाशिए पर जी रहे हैं. जब किसी समुदाय के पास सामाजिक रसूख और संस्थागत सुरक्षा नहीं होती, तो उसके सबसे कमजोर सदस्यों -- खासकर युवतियों -- को अक्सर सबसे ज्यादा खतरों का सामना करना पड़ता है."
पीड़ितों की उम्र को लेकर चिंता जताते हुए, इस मानवाधिकार संस्था ने बताया कि 52 प्रतिशत पीड़ित 14 से 18 साल के बीच के हैं, जबकि 20 प्रतिशत 14 साल से कम उम्र के हैं. संस्था ने कहा कि ऐसे मामलों के बाद अक्सर इंसाफ के लिए एक दर्दनाक संघर्ष शुरू होता है, जिसमें बेबस माता-पिता से कहा जाता है कि उनकी बेटी ने "धर्म बदल लिया है" या "अपनी मर्जी से शादी कर ली है"—जिससे यह गंभीर सवाल उठता है कि जब पीड़ित नाबालिग हों, तो उनकी मर्जी का मतलब क्या है?
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने ऐसे मामलों पर बार-बार चिंता जताई है. वीओपीएम ने उन रिपोर्टों का हवाला दिया जिनमें कहा गया है कि कई पीड़ितों को जबरदस्ती या बहला-फुसलाकर धर्म बदलने और शादी करने के लिए मजबूर किया जाता है; अक्सर ऐसी स्थितियों में जब अल्पसंख्यक परिवारों के पास कानूनी मदद लेने के लिए न तो संसाधन होते हैं और न ही कोई रसूख.
संस्था ने कहा कि कुछ मामलों में, पाकिस्तानी अदालतों ने भी ऐसी शादियों और धर्म बदलने को सही ठहराया है, जिससे परिवार तबाह और बेबस हो जाते हैं. संस्था के मुताबिक, पाकिस्तान में काम करने वाली एक मानवाधिकार संस्था, सेंटर फॉर सोशल जस्टिस (सीएसजे), इस मुद्दे की गंभीरता को बताती है; इसने अल्पसंख्यक लड़कियों के अपहरण और जबरदस्ती धर्म बदलने के सैकड़ों मामलों को दर्ज किया है, जिनमें से कई लड़कियां नाबालिग थीं.
वीओपीएम ने कहा, "ये आंकड़े बताते हैं कि इसे लेकर कानून को और सख्त करने की जरूरत है, साथ ही विभिन्न जिम्मेदार संस्थाओं की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए. इस मुद्दे पर चुप्पी सबसे ज्यादा परेशान करती है. कोई मामला मीडिया या सोशल नेटवर्क पर कुछ समय के लिए तो हंगामा खड़ा कर सकता है, लेकिन जल्द ही ठंडा भी पड़ जाता है. उसकी जगह कोई दूसरी कहानी ले लेती है, और पिछले पीड़ित चुपचाप लोगों की बातचीत से गायब हो जाते हैं. इस बीच, यह सिलसिला चलता रहता है."
इसमें आगे कहा गया, "यह चुप्पी अल्पसंख्यकों को अलग-थलग कर देती है. इसमें एक दर्दनाक संदेश छिपा है (चाहे जान-बूझकर हो या अनजाने में) वो ये कि उनकी पीड़ा को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा या उनके साथ कोई सहानुभूति नहीं दिखा रहा."
यह जोर देते हुए कि पूरे पाकिस्तान में अल्पसंख्यक लड़कियों के अपहरण और जबरन धर्म-परिवर्तन के मामलों में सिर्फ सहानुभूति या कभी-कभार खड़े किए जा रहे सवाल से कहीं ज्यादा की जरूरत है, वीओपीएम ने कहा, "इसके लिए नाबालिगों को मजबूत कानूनी सुरक्षा, पारदर्शी जांच, दोषियों की जवाबदेही और कमजोर समुदायों के लिए सार्थक सुरक्षा उपायों की जरूरत है. सबसे बढ़कर, इसके लिए समाज को पीड़ितों और उनके परिवारों की आवाज सुनने की जरूरत है—ऐसी आवाजें जो अक्सर अनसुनी रह जाती हैं."
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