- उत्तराखंड में जंगली जानवरों के हमलों के कारण ग्रामीणों में भय है और लोग पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं
- कांग्रेस नेता हरीश रावत ने वन्य जीवों के बढ़ते आतंक पर चिंता व्यक्त करते हुए ग्रामीणों की सुरक्षा पर सवाल उठाए
- बागेश्वर के कनलगढ़ और पौड़ी के चौरां गांव में तेंदुए, भालू, जंगली सूअर, बंदरों के डर से लोग गांव छोड़ रहे हैं
उत्तराखंड में वन्य जीव हमले का खौफ बढ़ता जा रहा है. जिसकी वजह से ग्रामीणों में दहशत का माहौल है. हालात ऐसे हो गए हैं कि लोग पलायन के लिए मजबूर हैं. जानवर कहीं हमला न कर दें, इस डर से लोग गांव छोड़ रहे हैं. इस मामले पर कांग्रेस के सीनियर नेता हरीश रावत ने चिंता जताई है. उन्होंने हालात पर चिंता जताते हुए कहा कि जिन लोगों को बंदूक चलानी नहीं आती, वे ऐसी स्थिति का सामना कैसे कर रहे होंगे.
वन्य जीवों से दहशत के साये में ग्रामीण
कांग्रेस नेता ने सोशल मीडिया पर कनलगढ़ में रहने वाले मोहन सिंह की दहशत से भरी कहानी शेयर की है. जिसमें मोहन सिंह ने कहा, 'हमारे गांव में जंगली जानवरों का आतंक ऐसा है कि रात में जब घर का एक सदस्य शौचालय जाता है, तो दूसरा बाहर बंदूक लेकर पहरा देता है.' बता दें कि मोहन सिंह सेना से सूबेदार पद से सेवानिवृत्त होने के बाद बागेश्वर जिले के अपने पैतृक गांव कनलगढ़ में जाकर बस गए थे. लेकिन जानवरों का खौफ उनमें बहुत ज्यादा है.
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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता की सलाह पर मोहन सिंह ने एक दशक पहले अपने गांव में खेती शुरू की, नींबू और माल्टा के पेड़ लगाए और दुग्ध व्यवसाय के लिए गायें भी खरीदीं. कुछ समय तक उनका जीवन खुशहाल रहा, लेकिन पिछले सात से आठ वर्षों में तेंदुओं, जंगली सूअरों और भालुओं का आतंक उनके गांव तक आ पहुंचा. उनका कहना है कि कुछ समय पहले तेंदुए के हमले में घायल हुई उनकी एक गाय की मौत हो गई.
तेंदुओं, भालुओं, जंगली सूअरों का आतंक
देहरादून में वर्ष 2023 में नौकरी से सेवानिवृत्त हुए बलबीर सिंह बिष्ट की कहानी भी इससे अलग नहीं है. पौड़ी जिले के चौरां गांव में बिष्ट ने अपने पुश्तैनी मकान की मरम्मत इस उम्मीद से कराई थी कि वह वहीं बसेंगे, लेकिन तेंदुओं, भालुओं, जंगली सूअरों, बंदरों और लंगूरों के उत्पात ने उन्हें अपना इरादा बदलने को मजबूर कर दिया.
बिष्ट ने कहा, ‘‘हम गांव में रहकर क्या करेंगे. तेंदुओं और भालुओं का आतंक और फिर जंगली सूअरों, बंदरों व लंगूरों का तांडव-जीना दूभर कर दिया है.'' इन हालातों को बयां करता एक गीत भी सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हो रहा है, जिसकी पंक्तियों में भालू, तेंदुए और बंदरों के आतंक का जिक्र करते हुए कहा गया है, ‘‘गांव-गली में डर है छाया, फसल चौपट-सब तेरी माया.''
2025 में हमलों में करीब 30 लोगों की मौत
कहा जा रहा है कि यह गीत पौड़ी जिले के चौबट्टाखाल क्षेत्र के विधायक और प्रदेश सरकार में मंत्री सतपाल महाराज को संबोधित कर लिखा गया है. प्रदेश में मानव-वन्यजीव संघर्ष लंबे समय से एक गंभीर समस्या रहा है. जंगलों के आसपास बसे लोग अक्सर बाघों और तेंदुओं के हमलों का शिकार होते रहे हैं, जबकि जंगली सूअर, बंदर और लंगूर उनकी फसलों को नुकसान पहुंचाते रहे हैं. हालांकि, पिछले कुछ सालों में इस समस्या में और इजाफा हुआ है. उत्तराखंड में वर्ष 2025 में तेंदुओं, बाघों और भालुओं के हमलों में करीब 30 लोगों की मौत हुई.
पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की परेशानियों का उल्लेख करते हुए हरीश रावत ने कहा कि साल 2010 के बाद से वन्यजीवों का आतंक तीन से चार गुना बढ़ गया है और इससे बढ़ी कठिनाइयों के कारण पिछले 12 से 14 सालों में सात से 10 प्रतिशत तक पलायन हुआ है. ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग ने भी माना है कि हाल के वर्षों में जंगली जानवरों के आबादी क्षेत्रों में बढ़ते उत्पात के कारण पलायन के मामलों में कुछ वृद्धि हुई है.
जंगली जानवरों के आतंक से हो रहा पलायन
आयोग के अध्यक्ष एस.एस. नेगी ने कहा कि प्रदेश से पलायन का मुख्य कारण रोजगार की तलाश है. हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ‘‘जंगली जानवरों का आतंक भी पलायन का एक कारण है और करीब सात से आठ प्रतिशत लोगों ने इसे अपने पलायन की वजह बताया है.'' प्रदेश के वन मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि सरकार ने इस समस्या का स्थायी समाधान खोजने के लिए राज्य में मानव–वन्यजीव संघर्ष पर विशेषज्ञों से एक अध्ययन कराए जाने का आदेश दिया है.
इनपुट- भाषा
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