उत्तराखंड में भूस्खलन कोई नई समस्या नहीं, बल्कि वर्षों पुरानी प्राकृतिक आपदा है. हर साल मानसून के दौरान भारी बारिश की वजह से राज्य को जान‑माल का भारी नुकसान झेलना पड़ता है. सड़कों से लेकर बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर तक को इससे गंभीर क्षति होती है, जबकि कई जगहों पर मानव जीवन भी खतरे में पड़ जाता है. मानसून के बाद भी कई इलाके ऐसे हैं, जहां पर भूस्खलन लगातार होता रहता है.
नए प्रोजेक्ट्स ने बढ़ाई भूस्खलन की रफ्तार
पिछले कुछ वर्षों में राज्य में तेज गति से सड़क निर्माण और बड़े‑बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स हुए हैं. इसका परिणाम यह निकला कि चारधाम यात्रा रूट के आसपास लगभग 100 नए भूस्खलन क्षेत्र पैदा हो गए. पहले से मौजूद संवेदनशील जोन भी और अधिक खतरनाक हो गए हैं. सरकार इन संवेदनशील स्थानों पर तेजी से ट्रीटमेंट करवा रही है, ताकि यात्रियों और स्थानीय लोगों को राहत मिल सके.
राज्य में 400 भूस्खलन क्षेत्र, कई पर काम जारी
लोक निर्माण विभाग के अनुसार, उत्तराखंड के नेशनल हाईवे नेटवर्क पर करीब 400 भूस्खलन स्थल चिन्हित किए गए हैं. इनमें से 83 जगहों पर ट्रीटमेंट पूरा कर लिया गया है, जबकि 47 लोकेशन पर काम जारी है. यह परियोजनाएं भारत सरकार के सहयोग से चलाई जा रही हैं.
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विभिन्न राष्ट्रीय राजमार्गों पर भूस्खलन की स्थिति इस प्रकार है:
- NH‑58 (ऋषिकेश–बद्रीनाथ): 83 स्थान
- NH‑107 (रुद्रप्रयाग–गौरीकुंड): 46 स्थान
- NH‑34 (ऋषिकेश–गंगोत्री): 85 स्थान
- NH‑134 (धरासू–जानकी चट्टी): 45 स्थान
- NH‑125 (टनकपुर–पिथौरागढ़): 84 स्थान
- कई अन्य मार्गों पर भी 50 से अधिक भूस्खलन जोन सक्रिय हैं.
कौन से जिले सबसे अधिक प्रभावित?
उत्तराखंड के 13 जिलों में से 11 जिले पहाड़ी हैं. इनमें चमोली, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, टिहरी, पिथौरागढ़ सबसे अधिक भूस्खलन से प्रभावित होते हैं. इन क्षेत्रों की ढाल तीव्र है और भूगर्भीय संरचना पहले से ही अस्थिर मानी जाती है.
विकास का दबाव और पर्यावरणीय असर
चारधाम यात्रा और पर्यटन उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन तेजी से निर्माण कार्यों ने पहाड़ों की प्राकृतिक संरचना को कमजोर किया है. सड़क और हाइड्रो प्रोजेक्ट्स के लिए बड़े पैमाने पर ब्लास्टिंग की गई, भारी मशीनरी का उपयोग हुआ, जंगलों का व्यापक कटान किया गया. इन सभी वजहों से पुराने भूस्खलन क्षेत्र सक्रिय हुए और नए भूस्खलन क्षेत्र भी बन गए.
विशेषज्ञों की चेतावनी
केंद्रीय गढ़वाल विश्वविद्यालय के भूवैज्ञानिक प्रो. एमपीएस बिष्ट के अनुसार पहाड़ों की तीव्र ढाल, भारी बारिश, जलवायु परिवर्तन, निर्माण के दौरान होने वाली ब्लास्टिंग, भारी वाहन और ड्रिल मशीनों का उपयोग. ये सभी कारक भूस्खलन को बढ़ावा देते हैं. चट्टानें ढीली होने से ऊपर का मलबा तेजी से नीचे खिसकता है, जिससे बड़े हादसे होते हैं.
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सरकार की तैयारी और प्रयास
उत्तराखंड लोक निर्माण विभाग के सचिव पंकज पांडे ने बताया, 'केंद्र सरकार ने लैंडस्लाइड ट्रीटमेंट के लिए विशेष बजट दिया है. चारधाम मार्ग के नए भूस्खलन क्षेत्रों की DPR तैयार हो रही है. जैसे ही DPR आती है, तुरंत बजट जारी कर ट्रीटमेंट शुरू कर दिया जाता है. स्टेट हाईवे के कई संवेदनशील स्थानों पर 'हिमावंत मिशन' के अंतर्गत काम चल रहा है.
उत्तराखंड का हिमालयी भूगोल, जलवायु परिवर्तन और तेज विकास की दौड़ मिलकर राज्य के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं. भूस्खलन न सिर्फ यात्राओं को प्रभावित कर रहा है, बल्कि पर्यावरण और मानव जीवन के लिए भी बड़ा खतरा बन चुका है. विशेषज्ञों का मानना है कि विकास कार्यों में अब अधिक संवेदनशील और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है.
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