होली के रंग में रंगे वाराणसी के लोग
- होली के रंग में डूबे काशीवासी
- रंगभरी एकादशी को लोग बाबा विश्वनाथ और गौरा के साथ होली खेलते हैं
- दूसरे दिन शमशान घाट पर बाबा के साथ चिता भष्म की होली होती है
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वाराणसी:
बनारस में रंगभरी एकादशी के दिन से ही होली का खुमार सिर चढ़ के बोलने लगता है. रंगभरी एकादशी को बनारस के लोग बाबा विश्वनाथ और गौरा के साथ होली खेलते हैं. उसके दूसरे दिन शमशान घाट पर बाबा के साथ चिता भष्म की होली होती है और फिर बनारस के घाटों पर भांग अबीर गुलाल के साथ तबले और ढोलक की थाप पर सुरों की होली शुरू हो जाती है, जो होली के दिन अपने पूरे चरम पर होती है.
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बनारस के अस्सी घाट पर बीएचयू के छात्र होली के रंग में डूबे नजर आते हैं. होली के ये खुमार तभी चढ़ता है जब भांग हो लिहाजा घाट पर रहने वाले शख्स फ़ौरन इस टोली में शामिल हो कर भांग की तरंग बिखेरने लगते हैं. लेकिन होली में गीतों के साथ जोगीरा के बोल का भी महत्व है. लिहाजा, दशाश्वमेघ घाट पर इसका भी रंग आपको दिख जायेगा.
यह भी पढ़ें: Holi 2018: होली पर इस गोरी ने गाया 'जोगीरा सा रा रा', Video से सोशल मीडिया पर मचा तहलका
व्यंग्य के इस फुहार के साथ होली पर बनारस की उस विधा की जीवंतता दिखती है, जिसके लिये पूरी दुनिया में बनारस की होली जानी जाती है. समाज की घटना पर चोट करते जोगीरा के बोल के अलावा बनारस में कीर्तन के साथ भी होली की विधा है. होली के दिन लोग अलग अलग मोह्हले से अपनी टोली बना कर बाबा विश्वनाथ के मंदिर जा कर उनसे होली खेलते हैं.
यह भी पढ़ें: Holi के मौके पर रिलीज हुआ ये गाना, इंडियन आइडल के सिंगर का पूरा हुआ सपना
कीर्तन की होली के साथ बनारस में होली की जो शुरुआत होती है, वो दिन चढ़ते-चढ़ते घाट पर उसका समा बांध जाता है. कहीं कवियों की टोली तो कहीं राजनितिक होली खेलते देश और विदेश के लोग नजर आने लगते हैं, लेकिन इसमें ख़ास यही होता है कि हर टोली के साथ ढोलक मजीरा होता है.
VIDEO: व्यंग्य के रंग में कुमार विश्वास
इस रंग में देश ही नहीं विदेश से आये सैलानी भी पूरे मजे के साथ होली खेलते हैं और एक दूसरे को रंग लगते हैं.
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बनारस के अस्सी घाट पर बीएचयू के छात्र होली के रंग में डूबे नजर आते हैं. होली के ये खुमार तभी चढ़ता है जब भांग हो लिहाजा घाट पर रहने वाले शख्स फ़ौरन इस टोली में शामिल हो कर भांग की तरंग बिखेरने लगते हैं. लेकिन होली में गीतों के साथ जोगीरा के बोल का भी महत्व है. लिहाजा, दशाश्वमेघ घाट पर इसका भी रंग आपको दिख जायेगा.
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व्यंग्य के इस फुहार के साथ होली पर बनारस की उस विधा की जीवंतता दिखती है, जिसके लिये पूरी दुनिया में बनारस की होली जानी जाती है. समाज की घटना पर चोट करते जोगीरा के बोल के अलावा बनारस में कीर्तन के साथ भी होली की विधा है. होली के दिन लोग अलग अलग मोह्हले से अपनी टोली बना कर बाबा विश्वनाथ के मंदिर जा कर उनसे होली खेलते हैं.
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कीर्तन की होली के साथ बनारस में होली की जो शुरुआत होती है, वो दिन चढ़ते-चढ़ते घाट पर उसका समा बांध जाता है. कहीं कवियों की टोली तो कहीं राजनितिक होली खेलते देश और विदेश के लोग नजर आने लगते हैं, लेकिन इसमें ख़ास यही होता है कि हर टोली के साथ ढोलक मजीरा होता है.
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इस रंग में देश ही नहीं विदेश से आये सैलानी भी पूरे मजे के साथ होली खेलते हैं और एक दूसरे को रंग लगते हैं.
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