फाइल फोटो
- योगी आदित्यनाथ के लिए कठिन परीक्षा साबित हो सकता है गोरखपुर चुनाव
- गोरखपुर सीट पर 11 मार्च को होना है चुनाव
- 14 मार्च को आएंगे नतीजे
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लखनऊ:
बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में दो लोकसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है. फूलपुर संसदीय सीट के लिए बीजेपी ने केएस पटेल और गोरखपुर संसदीय सीट के लिए उपेंद्र शुक्ला को टिकट दिया है. पीएम नरेंद्र मोदी नि:संदेह देश के सबसे बड़े चुनाव प्रचारक हैं, लेकिन पिछले एक साल से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, जो राज्य के प्रसिद्ध और प्रभावशाली गोरखनाथ मंदिर के प्रमुख पुजारी हैं और हिंदुत्व के सबसे बड़े चेहरे भी हैं. उन्होंने केरल, त्रिपुरा, गुजरात और अब कर्नाटक में सार्वजनिक सभाएं की हैं. योगी आदित्यनाथ के इन सभाओं से पार्टी को उम्मीद है कि वह मतदाताओं को आकर्षित करने में कामयाब रहेंगे. भाजपा ने भले ही विकास के मुद्दे पर उपचुनाव में उतरने का एजेंडा घोषित कर रखा हो, लेकिन योगी आदित्यनाथ की संसदीय सीट से भाजपा ने उपेंद्र शुक्ला को उम्मीदवार बनाकर ब्राह्मण वोट को साधने का रास्ता तैयार कर लिया है.
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यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के साथ पीएम मोदी
गोरखपुर सीट से योगी आदित्यनाथ पिछले पांच बार से चुनाव जीतते आए हैं. लेकिन सीएम पद की शपथ लेने बाद से यह सीट खाली है. गोरखपुर सीट पर 11 मार्च को उपचुनाव होना है. पार्टी ने इस सीट से उपेंद्र शुक्ला को अपने उम्मीदवार के रूप में चुना है. शुक्ला पिछले 30 सालों में भाजपा की ओर से गोरखपुर में चुने गए पहले ब्राह्मण प्रत्याशी होंगे. योगी आदित्यनाथ एक ठाकुर हैं, उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ थे. ठाकुर उच्च जाति होती है, जो पदानुक्रम ब्राह्मणों से एक पायदान नीचे जगह रखता है. गोरखपुर सीट से भाजपा के उम्मीदवार उपेंद्र शुक्ला का शक्तिशाली गोरखपुर मंदिर से भी कोई संबंध नहीं है. महंत अवैद्यनाथ 1989 में लोकसभा में गोरखपुर का प्रतिनिधित्व करने वाले पहले सदस्य थे. 1998 में योगी आदित्यनाथ ने इसका प्रतिनिधित्व किया. इन दोनों पुजारियों ने मिलकर आठ बार लगातार चुनाव जीते हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीति को मंदिर से नियंत्रित किया जाता रहा है.
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30 सालों में पहली बार गोरखपुर से उपेंद्र शुक्ला होंगे ब्राह्मण उम्मीदवार
बीते दिनों उपेंद्र शुक्ला ने चुनावी रैली में कहा था, ”योगी जी ने जो विकास का बगीचा लगाया है यहां, उसमें मैं माली बन के सींचने का काम करूंगा.” शुक्ला को योगी के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन उन्होंने योगी के बगीचे का माली बनने की बात कहकर उत्तराधिकारी होने की अटकलों को खारिज कर दिया. शुक्ला ने कहा, ”मैं योगी जी का उत्तराधिकारी नहीं हूं, मैं सिर्फ उनका प्रतिनिधि हूं.” उपेंद्र शुक्ला तीन दशकों में पहले ऐसे उम्मीदवार हैं जिनका ताल्लुक गोरखनाथ मंदिर से नहीं है. शुक्ला ने बीते 26 फरवरी को कहा कि जब मुख्यमंत्री ने बीजेपी के लिए उनके योगदान को याद किया और कहा कि आदित्यनाथ की तुलना में उनकी जीत एक बड़े अंतर से होनी चाहिए, तब मंच पर उनके आंसू निकल आए थे.
बसपा प्रमुख मायावती इस बार सपा कैंडिडेट का समर्थन कर रही हैं (फाइल फोटो)
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उपेंद्र शुक्ला की संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच अच्छी पैठ है. गोरक्ष प्रांत का क्षेत्रीय अध्यक्ष होने के कारण समाज के हर तबके से जुड़ाव है. 1 जुलाई 1960 में जन्में उपेंद्र ने स्नातक तक की पढ़ाई की है. उपेंद्र शुक्ला को 2013 में गोरक्ष प्रांत का अध्यक्ष बनाया गया था. इसके बाद लोकसभा चुनाव हुए और इस प्रांत के 10 जिलों की 13 में से 12 संसदीय सीटें भाजपा ने जीत लीं. सिर्फ आजमगढ़ संसदीय सीट भाजपा के कब्जे से दूर रही. यहां से सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने चुनाव जीता था. उपेंद्र ने संगठन को मजबूती दी और 2017 के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी को बड़ी सफलता मिली. गोरक्ष प्रांत में विधानसभा की 62 सीटें हैं, इनमें से 46 सीटें भाजपा के खाते में आईं. नगर निगम, नगर पालिका परिषद के चेयरमैन सात सीटों पर जीत और नगर पंचायत अध्यक्ष 16 सीटों पर जीत के चुनाव में भी भाजपा का प्रदर्शन अच्छा रहा है. अब 2019 का लोकसभा चुनाव नजदीक है. ऐसे में भाजपा ने उपेंद्र को गोरखपुर संसदीय सीट का टिकट उपहार स्वरूप दिया है.
उत्तर प्रदेश में कुल ब्राह्मणों की संख्या 10-12 प्रतिशत है
हालांकि, इसके इतर भाजपा ने यह संदेश दिया है कि पार्टी में संगठन के पदाधिकारी, कार्यकर्ताओं की अहमियत है. गोरखपुर सीट से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार पांच बार चुनाव जीते और सांसद बनें. उनकी जीत का अंतर हर बार बढ़ता गया. यही वजह है कि गोरखपुर सदर लोकसभा क्षेत्र को भाजपा की परंपरागत सीट माना जाता है.
गोरखपुर के पोलिटिकल कमेंटेटर मनोज सिंह का कहना है कि बीजेपी नेतृत्व इस इलाके में समांतर सत्ता केंद्र स्थापित करने की कोशिश कर रही है. मुख्यमंत्री के रूप में सीएम योगी ने गोरखपुर में कुछ विकास कार्य जरूर शुरू किये हैं, मगर यह राज्य चलाने के लिए नाकाफी है. मगर योगी यह बात जानते हैं कि अगर उन्हें उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका निभानी है, तो उसके लिए उन्हें अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए कीमत चुकानी पड़ेगी और पार्टी लाइन से कदम मिलाकर चलना होगा.
अखिलेश सिंह 2019 से पहले भाजपा को पटखनी देने के लिए गठबंधन की जुगत में
हालांकि, कुछ लोग यह उम्मीद जता रहे हैं कि सीएम योगी गोरखपुर सीट हार सकते हैं. यहां पर बीजेपी उम्मीदवार को कड़ी टक्कर देने के लिए समाजवादी पार्टी ने 29 वर्षीय प्रवीण निषाद को मैदान में उतारा है. प्रवीण पेश से इंजीनियर हैं और वह निषाद यानी मछुआरे समुदाय से आते हैं, जिनकी संख्या गोरखपुर में करीब 3.5 लाख है. बताया जा रहा है कि प्रवीण को पीस पार्टी ऑफ पसमंदा यानी शेड्यूल कास्ट मुस्लिम्स का भी समर्थन प्राप्त है.
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गोरखपुर सीट से योगी आदित्यनाथ पिछले पांच बार से चुनाव जीतते आए हैं. लेकिन सीएम पद की शपथ लेने बाद से यह सीट खाली है. गोरखपुर सीट पर 11 मार्च को उपचुनाव होना है. पार्टी ने इस सीट से उपेंद्र शुक्ला को अपने उम्मीदवार के रूप में चुना है. शुक्ला पिछले 30 सालों में भाजपा की ओर से गोरखपुर में चुने गए पहले ब्राह्मण प्रत्याशी होंगे. योगी आदित्यनाथ एक ठाकुर हैं, उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ थे. ठाकुर उच्च जाति होती है, जो पदानुक्रम ब्राह्मणों से एक पायदान नीचे जगह रखता है. गोरखपुर सीट से भाजपा के उम्मीदवार उपेंद्र शुक्ला का शक्तिशाली गोरखपुर मंदिर से भी कोई संबंध नहीं है. महंत अवैद्यनाथ 1989 में लोकसभा में गोरखपुर का प्रतिनिधित्व करने वाले पहले सदस्य थे. 1998 में योगी आदित्यनाथ ने इसका प्रतिनिधित्व किया. इन दोनों पुजारियों ने मिलकर आठ बार लगातार चुनाव जीते हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीति को मंदिर से नियंत्रित किया जाता रहा है.
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बीते दिनों उपेंद्र शुक्ला ने चुनावी रैली में कहा था, ”योगी जी ने जो विकास का बगीचा लगाया है यहां, उसमें मैं माली बन के सींचने का काम करूंगा.” शुक्ला को योगी के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन उन्होंने योगी के बगीचे का माली बनने की बात कहकर उत्तराधिकारी होने की अटकलों को खारिज कर दिया. शुक्ला ने कहा, ”मैं योगी जी का उत्तराधिकारी नहीं हूं, मैं सिर्फ उनका प्रतिनिधि हूं.” उपेंद्र शुक्ला तीन दशकों में पहले ऐसे उम्मीदवार हैं जिनका ताल्लुक गोरखनाथ मंदिर से नहीं है. शुक्ला ने बीते 26 फरवरी को कहा कि जब मुख्यमंत्री ने बीजेपी के लिए उनके योगदान को याद किया और कहा कि आदित्यनाथ की तुलना में उनकी जीत एक बड़े अंतर से होनी चाहिए, तब मंच पर उनके आंसू निकल आए थे.

यह भी पढ़ें: सीएम योगी के सामने ही उनके मंत्री ने मुलायम को रावण और मायावती को कहा शूर्पणखा
योगी आदित्यनाथ ने हमेशा ठाकुरों का समर्थन किया है. उत्तर प्रदेश में कुल ब्राह्मणों की संख्या 10-12 प्रतिशत है और यह प्रदेश का सबसे बड़ा अपर कास्ट ग्रुप है. इसके बाद ठाकुरों का नंबर आता है, जो 8-10 प्रतिशत की संख्या में हैं. वहीं, अखबार के एक विक्रेता अजय दुबे का कहना है कि उन्होंने हमेशा मायावती के बहुजन समाज पार्टी को वोट दिया है. उनका कहना है कि मायावती ने हमेशा से ब्राह्मणों का बहुत सम्मान किया है और 2009 में उन्होंने हमारी (निर्वाचन क्षेत्र से) एक ब्राह्मण प्रत्याशी को मैदान में भी उतारा था. लेकिन इस बार, बसपा चुनाव नहीं लड़ रही है और भाजपा ने ब्राह्मण को उतारा है, इसलिए मैं कमल के लिए मतदान करूंगा."
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उपेंद्र शुक्ला की संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच अच्छी पैठ है. गोरक्ष प्रांत का क्षेत्रीय अध्यक्ष होने के कारण समाज के हर तबके से जुड़ाव है. 1 जुलाई 1960 में जन्में उपेंद्र ने स्नातक तक की पढ़ाई की है. उपेंद्र शुक्ला को 2013 में गोरक्ष प्रांत का अध्यक्ष बनाया गया था. इसके बाद लोकसभा चुनाव हुए और इस प्रांत के 10 जिलों की 13 में से 12 संसदीय सीटें भाजपा ने जीत लीं. सिर्फ आजमगढ़ संसदीय सीट भाजपा के कब्जे से दूर रही. यहां से सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने चुनाव जीता था. उपेंद्र ने संगठन को मजबूती दी और 2017 के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी को बड़ी सफलता मिली. गोरक्ष प्रांत में विधानसभा की 62 सीटें हैं, इनमें से 46 सीटें भाजपा के खाते में आईं. नगर निगम, नगर पालिका परिषद के चेयरमैन सात सीटों पर जीत और नगर पंचायत अध्यक्ष 16 सीटों पर जीत के चुनाव में भी भाजपा का प्रदर्शन अच्छा रहा है. अब 2019 का लोकसभा चुनाव नजदीक है. ऐसे में भाजपा ने उपेंद्र को गोरखपुर संसदीय सीट का टिकट उपहार स्वरूप दिया है.

हालांकि, इसके इतर भाजपा ने यह संदेश दिया है कि पार्टी में संगठन के पदाधिकारी, कार्यकर्ताओं की अहमियत है. गोरखपुर सीट से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार पांच बार चुनाव जीते और सांसद बनें. उनकी जीत का अंतर हर बार बढ़ता गया. यही वजह है कि गोरखपुर सदर लोकसभा क्षेत्र को भाजपा की परंपरागत सीट माना जाता है.
गोरखपुर के पोलिटिकल कमेंटेटर मनोज सिंह का कहना है कि बीजेपी नेतृत्व इस इलाके में समांतर सत्ता केंद्र स्थापित करने की कोशिश कर रही है. मुख्यमंत्री के रूप में सीएम योगी ने गोरखपुर में कुछ विकास कार्य जरूर शुरू किये हैं, मगर यह राज्य चलाने के लिए नाकाफी है. मगर योगी यह बात जानते हैं कि अगर उन्हें उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका निभानी है, तो उसके लिए उन्हें अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए कीमत चुकानी पड़ेगी और पार्टी लाइन से कदम मिलाकर चलना होगा.

हालांकि, कुछ लोग यह उम्मीद जता रहे हैं कि सीएम योगी गोरखपुर सीट हार सकते हैं. यहां पर बीजेपी उम्मीदवार को कड़ी टक्कर देने के लिए समाजवादी पार्टी ने 29 वर्षीय प्रवीण निषाद को मैदान में उतारा है. प्रवीण पेश से इंजीनियर हैं और वह निषाद यानी मछुआरे समुदाय से आते हैं, जिनकी संख्या गोरखपुर में करीब 3.5 लाख है. बताया जा रहा है कि प्रवीण को पीस पार्टी ऑफ पसमंदा यानी शेड्यूल कास्ट मुस्लिम्स का भी समर्थन प्राप्त है.
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