- UP SIR में 2.89 करोड़ नाम कटे, राजनीति तेज.
- प्रवासी, गरीब और सीमावर्ती जिलों में असर ज्यादा.
- बिहार चुनाव में SIR बड़ा मुद्दा नहीं बन सका था. क्या यूपी में राजनीतिक पार्टियां इसे मुद्दा बना सकेंगी?
उत्तर प्रदेश में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर के बाद जारी हुई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से कटे 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम ने सत्ता और विपक्ष, दोनों के लिए नए सवाल खड़े कर दिए हैं. सवाल ये है कि वोट किसका कटा, किस इलाके में इसका ज्यादा असर पड़ा और सबसे अहम सवाल यह कि किसे इसका सबसे अधिक फायदा और सबसे अधिक नुकसान हो सकता है. UP देश का सबसे बड़ा चुनावी राज्य है. यहां 403 विधानसभा सीटें, 80 लोकसभा सीटें और Special Intensive Revision (SIR) के आंकड़ों के मुताबिक करीब 15.44 करोड़ वोटर हैं. ऐसे में 18.7% वोटरों का ड्राफ्ट लिस्ट से बाहर होना किसी भूकंप से कम नहीं. विपक्ष इसे वोट कटौती की राजनीति बता रहा है, जबकि चुनाव आयोग और सरकार का तर्क है कि फर्जी, डुप्लीकेट और मृत मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं.
कहां कितने नाम काटे गए?
SIR में सबसे अधिक लखनऊ में नाम काटे गए हैं. यहां के वोटर लिस्ट से 30 फीसद से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं. वहीं गाजियाबाद में करीब 29 फीसद, कानपुर और आगरा में करीब 25 फीसद, बरेली में 21% और वाराणसी में 18% से अधिक लोगों के नाम मतदाता सूची से काटे गए हैं.
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विपक्ष का आरोप
समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने SIR की ड्राफ्ट सूची पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि जितने भी मतदाताओं के नाम काटे गए हैं उन्हें वापस से मतदाता सूची में जोड़ा जाए. उन्होंने कहा, "एसआईआर में निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा है. बीजेपी लोकतंत्र को कमजोर कर रही है. हर मतदाता का नाम मतदाता सूची में जुड़वायें."
समाजवादी पार्टी के भीतर भी यह चर्चा तेज है कि जिन इलाकों में सत्ता विरोधी वोट ज्यादा था, वहां कटौती ज्यादा दिख रही है.
UP कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय का कहना है कि इतने बड़े राज्य को SIR के लिए सिर्फ एक महीना देना जल्दबाजी है. इससे गरीब, प्रवासी, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे. BLO पर दबाव पड़ा और प्रक्रिया मानवीय नहीं रही.
कांग्रेस नेता गुरदीप सिंह सप्पल ने उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की मसौदा सूची जारी होने के बाद मंगलवार को दावा किया कि उनका और उनके परिवार के सदस्यों के नाम एसआईआर से गायब हैं, जबकि उनके पास सारे कागजात हैं तथा 2003 की मतदाता सूची में भी उनके नाम थे.
सप्पल ने ‘एक्स' पर पोस्ट किया, ‘‘उत्तर प्रदेश की एसआईआर मसौदा सूची प्रकाशित हो गई है. इसमें मेरा और मेरे परिवार का नाम ग़ायब है, जबकि हमारे नाम 2003 की मतदाता सूची में शामिल थे, हमारे नाम पिछले चुनाव की मतदाता सूची में भी शामिल थे और हमारे माता-पिता के नाम भी 2003 की मतदाता सूची में शामिल थे."
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#WATCH | Delhi: On 2.89 crore voters, including Congress leader Gurdeep Singh Sappal, removed from UP SIR draft voter list, party leader Sandeep Dikshit says, "...As per our experience now in Bihar and elsewhere, several names that are being deleted belong to communities which do… pic.twitter.com/wOF2S6c7pp
— ANI (@ANI) January 6, 2026
कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने आरोप लगाया, "कई नाम जो कट रहे हैं वो ऐसे समुदाय से आते हैं जो भारतीय जनता पार्टी से इत्तेफाक नहीं रखते हैं या सामान्य रूप से उसके खिलाफ वोट देते हैं, उसके ज्यादा लोगों के नाम उसमें कटे पाए जाते हैं और कभी-कभी ऐसे कारणों से कटे पाए जाते हैं जिनकी जमीन पर हकीकत नहीं दिखती है. वो गुरदीप सप्पल जी का नाम ही देख लें तो उनका नाम कैसे कट गया होगा? तो हमेशा ऐसा ही क्यों होता है कि ऐसे इलाके के, ऐसे समुदाय या ऐसे लोगों के नाम कटते हैं जो संभवतः भारतीय जनता पार्टी को वोट नहीं देते हैं. इसिलिए SIR की प्रक्रिया पर हम लोग सवाल खड़े करते हैं. यूपी के लिस्ट को हम देखेंगे और अगर लगेगा कि फेयर प्रॉसेस है तो ठीक है नहीं तो हम लड़ाई लड़ेंगे."
सरकार और ECI का जवाब
सरकार और चुनाव आयोग साफ कहते हैं कि यह प्रक्रिया राजनीति से ऊपर है. 2002–04 के बाद पहली बार घर-घर रिवीजन हो रहा है. गलत डेटा के साथ चुनाव कराना लोकतंत्र के लिए खतरा है. आयोग का कहना है कि “जिसका नाम सही है, वह वापस जुड़ जाएगा.”

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यूपी में कहां कितना असर?
पूर्वांचल (वाराणसी, गाजीपुर, बलिया, जौनपुर)- उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में राज्य के सबसे अधिक प्रवासी वोटर्स रहते हैं. विपक्ष का दावा है कि मुंबई, दिल्ली, सूरत में काम करने वाले कई प्रवासी वोटर्स के नाम SIR की ड्राफ्ट सूची से काटे गए हैं. हालांकि अभी इसकी पुष्टि नहीं हुई है लेकिन विपक्ष इसे प्रवासी वोट कटौती बता रहा है.
अवध क्षेत्र (लखनऊ, बाराबंकी, अयोध्या, रायबरेली) के शहरी इलाकों मे डुप्लीकेट एंट्री ज्यादा मिले हैं. विपक्ष ने दावा किया है कि इन इलाकों में गरीब बस्तियों के नाम ज्यादा काटे गए हैं. वहीं आयोग इसे करेक्शन के तौर पर देख रहा है.
पश्चिम उत्तर प्रदेश (मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर आदि) में अल्पसंख्यक और मजदूर वर्ग के इसमें प्रभावित होने का दावा किया गया है. अगर गन्ना बेल्ट पर भी इसका असर पड़ा तो विपक्ष उसे भुनाने की कोशिश जरूर करेगा.
वहीं राज्य की कम आबादी वाले बुंदेलखंड (झांसी, बांदा, चित्रकूट आदि) में पलायन और बहुत पुराने रिकॉर्ड की वजह से कटौती प्रतिशत ज्यादा देखने को मिला है. हालांकि इस इलाके में इसका बहुत सीमित चुनावी असर पड़ने की संभावना है.
लेकिन तराई और सीमावर्ती जिले (पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बहराईच) में विपक्ष इसे लेकर हमलावर है, वो सवाल उठा रहा है कि "गरीब को ही बार-बार कागज क्यों दिखाने पड़ते हैं?"
जातीय और सामाजिक असर
राजनीतिक दलों के शुरुआती आकलन बताते हैं कि दलित, मुस्लिम, प्रवासी मजदूर और शहरी गरीब वर्गों के नाम कटने की शिकायतें अधिक हैं. और यह वर्ग अक्सर सत्ता विरोधी वोट बैंक भी माना जाता है. हालांकि चुनाव आयोग ने ड्राफ्ट सूची जारी करते हुए बार-बार कहा है कि यह लिस्ट अभी अंतिम नहीं है. इसमें आपत्ति और इसके सुधार के लिए लोगों के पास करीब डेढ़ महीने का समय है. लेकिन राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो चुकी है.
वैसे बिहार के चुनाव में लोगों के बीच SIR मुद्दा नहीं बन सका था. क्या यूपी में यह मुद्दा दूरगामी परिणाम छोड़ेगा? चुनावी असर पर फिलहाल कुछ भी बोलना जल्दबाजी होगी.
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