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5 साल, 24 रुपये की खाली डिब्बी और 40 हजार का मुआवजा, कानपुर के सुधींद्र की जीत ने द‍िखाया ग्राहक ही 'राजा'

कानपुर के सुधींद्र म‍िश्रा ने 24 रुपये की खाली ड‍िब्‍बी की वजह से पांच साल की लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी और आखि‍रकर इस मामले में जीत हास‍िल की. ​यह फैसला देश के करोड़ों उपभोक्ताओं के लिए एक मिसाल है.

5 साल, 24 रुपये की खाली डिब्बी और 40 हजार का मुआवजा, कानपुर के सुधींद्र की जीत ने द‍िखाया ग्राहक ही 'राजा'
कानपुर में ग्राहक की ऐत‍िहास‍िक जीत.
  • कानपुर के एक आम उपभोक्ता ने लड़ी स्वाभिमान और हक की लड़ाई
  • मेडिकल स्टोर और निर्माता कंपनी दोनों को दोषी पाया गया
  • उपभोक्ता को 40 हजार रुपये का म‍िला मुआवजा

'ग्राहक ही असली राजा है', कानपुर के सुधींद्र मिश्रा की जीत ने इस बात को साब‍ित कर द‍िया है. दरअसल, सुधींद्र ने साल 2020 में पैर दर्द से राहत पाने के ल‍िए रावतपुर के एक मेडिकल स्टोर से 12-12 रुपये की दो 'फास्ट रिलीफ पेन किलर बाम' खरीदा. घर आकर जब पैकेट खोला तो उनके होश उड़ गए. दोनों डिब्बियां पूरी तरह खाली थीं, न बाम था और न ही ढक्कन. ​जब सुधींद्र शिकायत लेकर मेडिकल स्टोर पहुंचे, तो दुकानदार ने पल्ला झाड़ते हुए कह दिया, 'यह हमारा काम नहीं, कंपनी की गलती है'  चक्कर काटने के बाद भी जब न तो 24 रुपए वापस मिले और न ही बाम बदला गया. इसके बाद सुधींद्र ने हार मानने के बजाय जिला उपभोक्ता आयोग (Consumer Forum) का दरवाजा खटखटाया. अपने हक के ल‍ि‍ए उन्‍होंने पांच साल की लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी और आखि‍रकर इस मामले में जीत हास‍िल की. 

​अदालत का ऐतिहासिक फैसला: उपभोक्ता की बड़ी जीत

​मामला अगस्त 2020 का है. करीब 5 साल तक चली इस कानूनी लड़ाई में जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने मेडिकल स्टोर और निर्माता कंपनी दोनों को 'सेवा में कमी' का दोषी पाया. कोर्ट ने कंपनियों को कड़ा सबक सिखाते हुए आदेश दिया क‍ि ​मूल रकम 24 रुपये की वापसी ब्याज सहित लौटाई जाए. यही नहीं, ​मानसिक प्रताड़ना और अदालती खर्च के एवज में उपभोक्ता को 40,000 रुपये का मुआवजा दिया जाए. 

'लड़ाई 24 रुपये की नहीं, हक की थी'

सुधींद्र मिश्रा ने बताया, "जब मैं मेडिकल स्टोर पर खाली डिब्बी लेकर गया तो दुकानदार का रवैया बेहद गैर-जिम्मेदाराना था. उसने मुझे ऐसे भगा दिया जैसे मेरी कोई कीमत ही न हो. बहुत से लोग सोचते हैं कि 24 रुपये के लिए कौन कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटेगा, लेकिन मेरी लड़ाई पैसों के लिए थी ही नहीं. यह लड़ाई हर उस ग्राहक के हक के लिए थी जिसे कंपनियां और दुकानदार कमजोर समझने की भूल करते हैं. 5 साल लगे, लेकिन आज मुझे गर्व है कि मैंने हार नहीं मानी. यह फैसला देश के हर उपभोक्ता की जीत है."

​आम ग्राहकों के लिए इस खबर के मायने

​यह फैसला देश के करोड़ों उपभोक्ताओं के लिए एक मिसाल है. अक्सर लोग छोटी रकम का नुकसान होने पर 'छोड़ो, कौन झंझट में पड़े' कहकर चुप बैठ जाते हैं, जिससे कंपनियों के हौसले बुलंद होते हैं. सुधींद्र मिश्रा की यह जीत बताती है कि अगर आपके साथ धोखाधड़ी हुई है, तो कानून आपके साथ खड़ा है. अपने अधिकारों के लिए आवाज जरूर उठाएं, क्योंकि उपभोक्ता ही बाजार का असली राजा है. 

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