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सांसद-विधायक ने नहीं सुनी बात तो ग्रामीणों ने खुद बना डाला पुल, 8 लाख चंदा जुटाकर लिखी आत्मनिर्भरता की मिसाल

ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने कई बार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से नया पुल बनवाने की मांग की, सांसद से लेकर विधायक तक गुहार लगाई, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई.

सांसद-विधायक ने नहीं सुनी बात तो ग्रामीणों ने खुद बना डाला पुल, 8 लाख चंदा जुटाकर लिखी आत्मनिर्भरता की मिसाल
ग्रामीणों ने चंदा जमा कर बना डाला लोहे का पुल.

उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में विकास के दावों के बीच एक ऐसा गांव सामने आया है, जहां लोगों ने नेताओं और अधिकारियों से उम्मीद छोड़कर अपने ही दम पर पुल बनाना शुरू कर दिया. करीब आठ लाख रुपये चंदा जुटाया, वेल्डिंग मशीन उठाई और खुद ही लोहे का पुल तैयार करने में जुट गए.  

जौनपुर के मड़ियाहूं तहसील के सीरिया गांव की यह तस्वीर सरकारी दावों की हकीकत बयां कर रही है. बसुही नदी पर वर्ष 2002 में ग्रामीणों ने चंदा जुटाकर लोहे का पुल बनवाया था, जिससे दर्जनों गांवों के लोग और स्कूली बच्चे रोजाना आवाजाही करते थे, लेकिन वर्ष 2018 में यह पुल जर्जर हो गया और हादसों का कारण बनने लगा. 

नहीं हुई सुनवाई तो ग्रामीणों ने खुद संभाली कमान 

ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने कई बार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से नया पुल बनवाने की मांग की. ग्रामीण आकाश यादव ने बताया क‍ि सांसद से लेकर विधायक तक गुहार लगाई, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई. आखिरकार गांव वालों ने खुद ही कमान संभाली. पूरे गांव ने मिलकर करीब 7 लाख 80 हजार रुपये का चंदा इकट्ठा किया और 32 फीट लंबे लोहे के पुल का निर्माण शुरू कर दिया. 

सबसे खास बात यह है कि इस पुल को बनाने के लिए न कोई ठेकेदार है और न ही कोई बाहरी कारीगर. गांव के युवक खुद वेल्डिंग मशीन से पुल तैयार कर रहे हैं और पेंटिंग भी अपने हाथों से कर रहे हैं. इस गांव की छात्रा स्वाति यादव ने कहा कि पुल टूट जाने के कारण हम लोगों को पांच से छह किलोंमीटर दूरी का चक्कर काटना पड़ रहा है. 

'चुनाव के बाद समस्‍याओं पर कोई नहीं देता ध्‍यान' 

महिलाओं का कहना है कि चुनाव के समय नेता वोट मांगने जरूर आते हैं, पुल बनवाने का वादा करते है लेकिन चुनाव बीतने के बाद  समस्याओं की ओर कोई ध्यान नहीं देता. उनका कहना है कि अगर यही हाल रहा तो 2027 के विधानसभा चुनाव में गांव के लोग चुनाव बहिष्कार करेंगे. 

यह तस्वीर सिर्फ एक पुल की नहीं, बल्कि उस मजबूरी की है जिसने ग्रामीणों को सरकार का इंतजार छोड़ खुद निर्माण कार्य शुरू करने पर मजबूर कर दिया. अब सवाल यह है कि जब ग्रामीण अपने दम पर पुल बना सकते हैं, तो आखिर सरकारी मशीनरी वर्षों तक उनकी इस बुनियादी जरूरत को क्यों नहीं पूरा कर सकी?

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