- इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गंगा नदी में मांसाहारी भोजन करने से हिंदू धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचने की बात कही
- कोर्ट ने गंगा नदी को सिर्फ जल स्रोत नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की अटूट आस्था और जीवनदायिनी बताया
- आरोपियों ने अपनी गलती स्वीकार कर समाज को हुई चोट पर वास्तविक पछतावा व्यक्त किया है
Ganga Iftar Controversy: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वाराणसी में गंगा नदी के बीच नाव पर इफ्तार पार्टी आयोजित करने के मामले की सुनवाई के दौरान बेहद अहम टिप्पणी की है. अदालत ने कहा है कि पवित्र गंगा नदी में मांसाहारी भोजन (जैसे चिकन बिरयानी) करना और उसके अवशेषों या कचरे को नदी में फेंकना निश्चित रूप से हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को गंभीर ठेस पहुंचा सकता है. कोर्ट ने राज्य सरकार के उस तर्क का पुरजोर समर्थन किया, जिसमें कहा गया था कि गंगा सिर्फ एक नदी नहीं है, बल्कि देश के करोड़ों लोगों की अटूट आस्था का केंद्र और उत्तर भारत की जीवनदायिनी है.
कोर्ट ने धार्मिक आस्था के सम्मान को बताया सर्वोपरि
यह टिप्पणी जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की एकल पीठ ने वाराणसी के चर्चित 'गंगा इफ्तार विवाद' में आरोपियों की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए अपने 16 पन्नों के विस्तृत आदेश में की.
हालांकि, अदालत ने यह भी पाया कि आरोपियों ने अपने हलफनामे में बिना किसी बहानेबाजी के अपनी गलती मानी है और समाज को पहुंची ठेस के लिए गहरा व वास्तविक पछतावा (Genuine Remorse) व्यक्त किया है.
8 आरोपियों की जमानत मंजूर, जबरन वसूली के आरोपों को माना संदिग्ध
हाई कोर्ट ने इस मामले में जेल में बंद कुल 14 आरोपियों में से 8 मुस्लिम युवकों की जमानत अर्जी मंजूर कर ली है. जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला ने पांच और जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा की पीठ ने तीन आरोपियों को राहत दी. अदालत ने पुलिस द्वारा जांच के दौरान बाद में जोड़ी गई भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 308(5) यानी जबरन वसूली (Extortion) के आरोपों पर गंभीर सवाल उठाए. पुलिस का दावा था कि आरोपियों ने नाविकों को डराकर जबरन नाव छीनी थी. कोर्ट ने कहा कि जांच के काफी बाद जोड़े गए ये आरोप पहली नजर में 'संदिग्ध' और विरोधाभासी लगते हैं. चूंकि आरोपी गरीब बुनकर हैं, उनका कोई पुराना आपराधिक इतिहास नहीं है और वे पिछले दो महीनों (17 मार्च से) से जेल में बंद हैं, इसलिए उन्हें और अधिक समय तक जेल में रखना उचित नहीं है.
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सोशल मीडिया पर अफवाह और फंडिंग की जांच रहेगी जारी
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त अधिवक्ता महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने जमानत का कड़ा विरोध किया था. उन्होंने दलील दी थी कि आरोपियों ने सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की साजिश के तहत जानबूझकर इस कृत्य का वीडियो इंस्टाग्राम पर अपलोड किया था. सरकार ने इसके पीछे किसी बड़ी साजिश और फंडिंग की आशंका भी जताई थी. इस पर हाई कोर्ट ने माना कि सोशल मीडिया के जरिए तनाव फैलने की चिंताएं पूरी तरह निराधार नहीं हैं, लेकिन पुलिस इस कथित साजिश और फंडिंग की जांच आरोपियों को जेल में रखे बिना भी जारी रख सकती है.
क्या था पूरा मामला?
यह पूरा विवाद मार्च महीने में तब शुरू हुआ था, जब सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हुआ. इस वीडियो में कुछ युवक वाराणसी में गंगा नदी के बीचों-बीच एक मोटरबोट पर बैठकर रोजा इफ्तार कर रहे थे और चिकन बिरयानी खाकर उसके अवशेष पवित्र नदी में बहा रहे थे. वीडियो सामने आने के बाद भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के जिला अध्यक्ष रजत जायसवाल की शिकायत पर पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 14 लोगों को गिरफ्तार किया था. स्थानीय अदालत से जमानत खारिज होने के बाद आरोपियों ने हाई कोर्ट का रुख किया था.
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