- केंद्र सरकार ने जल जीवन मिशन में अस्वीकृत खर्चों की सूची को बढ़ाकर दस आइटम कर दिया है
- ओवरसाइज डीपीआर की रोकथाम के लिए 67 हजार करोड़ रुपए के प्रस्तावों पर तत्काल प्रतिबंध लगाया गया है
- टेंडर प्रीमियम सहित चार नए खर्चे अस्वीकृत किए गए हैं, जिनका भुगतान मिशन के तहत नहीं किया जाएगा
जल जीवन मिशन में गड़बड़ियों और काम की लागत को बढ़ाने के रवैये को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है.केंद्र सरकार ने जल जीवन मिशन के तहत अस्वीकृत खर्चों की सूची का दायरा बढ़ा दिया है. पहले इस सूची में सात आइटम थे जिन्हें अब बढ़ाकर दस कर दिया गया है.साथ ही ओवरसाइज डीपीआर को भी रोकने का निर्देश दिया गया है.सूत्रों के अनुसार इस तरह की 67 हजार करोड़ रुपए की ओवरसाइज डीपीआर हैं जिन पर रोक लगाई गई है.
इसके पीछे का मकसद क्या है?
केंद्र सरकार के सूत्रों के मुताबिक इसका उद्देश्य लागत को कम करना और अनियमितताओं पर रोक लगाना है. नए कदम के तहत जिन कामों के खर्चों का भुगतान नहीं होगा, उनमें टेंडर प्रीमियम, योजनाओं का ऑपरेशन और मेंटेनेंस, 55 लीटर प्रति व्यक्ति प्रति दिन की सेवाओं के अतिरिक्त प्रोविजन, शहरी और अन्य क्षेत्रों में पानी की मांग पर आपूर्ति जैसे चार आइटम जोड़ दिए गए हैं.
गौरतलब है कि टेंडर प्रीमियम 2019 के मूल नियमों में अस्वीकृत खर्चों की सूची में रखा गया था ,लेकिन 2022 में गाइडलाइंस में ढील दी गई थी.ऐसा इसलिए किया गया था ताकि जल जीवन मिशन के तहत टेंडर की बढ़ी हुई बोली का खर्च केंद्र सरकार वहन कर सके. गाइडलाइंस में हुए इस बदलाव के बाद 14,586 योजनाओं में केंद्र सरकार पर 16,389 करोड़ रुपए का अतिरिक्त भार पड़ा.
टेंडर प्रीमियम और टेंडर प्रक्रिया में गड़बड़ी का मामला इस योजना के सबसे बड़े विवादों में से एक रहा है.नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक सीएजी, प्रवर्तन निदेशालय ईडी और राज्य भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की जांच में यह साफ हो चुका है कि टेंडर प्रीमियम और टेंडर आवंटन में बड़े पैमाने पर गंभीर गड़बड़ियां हुई हैं.
टेंडर प्रीमियम क्या है?
जब सरकार किसी काम के लिए बेस प्राइस तय करती है और ठेकेदार उससे अधिक कीमत पर काम करने की बोली लगाते हैं, तो उसे 'टेंडर प्रीमियम' कहा जाता है. जांच एजेंसियों और सीएजी के ऑडिट में यह सामने आया कि राजस्थान जैसे राज्यों में कुछ पसंदीदा कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए टेंडरों को 30% से 40% तक के अत्यधिक ऊंचे प्रीमियम पर पास किया गया. अधिकारियों और कांट्रैक्टर्स ने मिलकर एक सिंडिकेट बनाया. इसके लिए नियमों में बदलाव करके 'साइट विजिट सर्टिफिकेट' अनिवार्य कर दिया गया, जिससे बोली लगाने वाले ठेकेदारों की गोपनीयता खत्म हो गई. नतीजा यह हुआ कि चुनिंदा ठेकेदारों ने आपस में मैच फिक्सिंग की तरह ऊंची बोलियां लगाईं, जिससे सरकार को भारी वित्तीय नुकसान हुआ.

टेंडर से जुड़े फर्जीवाड़े की लंबी है लिस्ट
अगर केवल टेंडर से जुड़े फर्जीवाड़े और वित्तीय अनियमितताओं की बात करें, तो देश भर में ऐसे हजारों मामले सामने आए हैं. राजस्थान का ₹960 करोड़ का घोटाला टेंडर गड़बड़ी का सबसे बड़ा उदाहरण है. केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, टेंडर और वित्तीय अनियमितताओं के चलते देश भर में 621 विभागीय अधिकारियों, 969 ठेकेदारों और 153 थर्ड-पार्टी निरीक्षण एजेंसियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई (निलंबन, ब्लैकलिस्टिंग और FIR) की गई है. लोकसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक, कुल 4,000 से अधिक लोगों पर कार्रवाई हो चुकी है. राजस्थान के पूर्व पीएचईडी मंत्री महेश जोशी को पहले ईडी और फिर मई 2026 में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने इस घोटाले के पुख्ता सबूतों के आधार पर गिरफ्तार किया. ईडी की जांच के अनुसार, ठेकेदारों को ऊंचे दामों पर टेंडर देने के बदले कुल टेंडर राशि का 4% हिस्सा रिश्वत के रूप में लिया गया था.
अस्वीकृत खर्चों की सूची में गेस्ट हाउस या अन्य सरकारी इमारतों के निर्माण पर हुए खर्च के भुगतान पर भी रोक है. कुछ राज्यों में इस तरह की शिकायत सामने आई कि राज्य सरकारों ने जल जीवन मिशन के फंड का इस्तेमाल सरकार भवन बनाने में कर लिया. इसके बाद केंद्र सरकार ने वहां जल जीवन मिशन के तहत भुगतान रोक दिया. एक राज्य सरकार ने जल जीवन मिशन के तहत राज्य की राजधानी में पेयजल आपूर्ति का काम शुरू कर दिया था जबकि अस्वीकृत खर्चों की गाइडलाइन के तहत शहरी क्षेत्रों में जल आपूर्ति नहीं की जा सकती है, इसलिए यहां भी भुगतान रोक दिया गया.
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