YouTube अपने प्लेटफॉर्म को और बेहतर बनाते हुए अब क्रिएटर्स के लिए कई खास बदलाव ला रहा है. ये बदलाव सीधे तौर पर उनके कंटेंट की क्वालिटी और ग्लोबल रीच को बेहतर बनाएंगे. इन नए अपडेट्स को भले ही यूजर सामने से न देखें, लेकिन इनके असर से क्रिएटर्स का अनुभव पहले से ज्यादा आसान और स्मार्ट हो जाएगा. YouTube ने साफ किया है कि इन बदलावों का मकसद कंटेंट को ज्यादा ऑथेंटिक बनाए रखना और क्रिएटर्स को ज्यादा कंट्रोल देना है. इस नए अपडेट का नाम है ऑटोमैटिक स्मार्ट फिल्टरिंग सिस्टम, क्या है.

क्या है ऑटोमैटिक स्मार्ट फिल्टरिंग सिस्टम?
YouTube ने अब एक नया ऑटोमैटिक स्मार्ट फिल्टरिंग सिस्टम पेश किया है, जो खुद यह पहचान लेगा कि कौन-सा वीडियो डब किए जाने के लायक नहीं है. उदाहरण के तौर पर, अगर कोई वीडियो सिर्फ म्यूजिक पर आधारित है या फिर ऐसा व्लॉग है जिसमें कोई बोलता ही नहीं है, तो उसे ऑटो-डब नहीं किया जाएगा. इससे यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कंटेंट की असल पहचान बनी रहे. YouTube का मानना है कि हर वीडियो को जबरदस्ती डब करना जरूरी नहीं होता.
ऑटो-डबिंग से नहीं होगा रैंकिंग पर असर
कई क्रिएटर्स के मन में यह डर रहता है कि अगर उनका वीडियो ऑटो-डब हो गया, तो कहीं उसकी रीच या रैंकिंग पर नकारात्मक असर न पड़े. YouTube ने इस पर साफ तौर पर कहा है कि ऑटो-डब किए गए वीडियो से किसी भी क्रिएटर की डिस्कवरी या रैंकिंग को नुकसान नहीं होगा. बल्कि, YouTube का मानना है कि डबिंग से वीडियो को नए देशों और नई भाषाओं के दर्शकों तक पहुंचने में मदद मिल सकती है. यानी अब भाषा की वजह से आपका कंटेंट सीमित नहीं रहेगा.

नए दर्शकों तक पहुंचने का मौका
ऑटो-डबिंग फीचर की मदद से अब एक ही वीडियो कई भाषाओं में लोगों तक पहुंच सकेगा. इससे उन क्रिएटर्स को खास फायदा मिलेगा, जो अपनी भाषा की वजह से अब तक सिर्फ एक सीमित ऑडियंस तक ही पहुंच पा रहे थे. YouTube का कहना है कि यह फीचर क्रिएटर्स के लिए नए मौके खोलेगा और उनके कंटेंट को इंटरनेशनल लेवल पर पहचान दिला सकता है.
क्रिएटर्स के हाथ में पूरा कंट्रोल
YouTube ने यह भी साफ किया है कि ऑटो-डबिंग पूरी तरह क्रिएटर के कंट्रोल में रहेगी. अगर कोई क्रिएटर चाहे, तो वह अपनी खुद की कस्टम डबिंग अपलोड कर सकता है. इसके अलावा, अगर किसी को ऑटो-डबिंग बिल्कुल पसंद नहीं है, तो वह इसे पूरी तरह बंद भी कर सकता है. इतना ही नहीं, क्रिएटर यह भी तय कर सकते हैं कि उनका कंटेंट अलग-अलग भाषाओं में किस तरह दिखाया जाए. इससे क्रिएटर्स को अपनी ब्रांडिंग और मैसेज पर पूरा अधिकार मिलता है.
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