नई दिल्ली:
बिहार चुनाव सर पर है, लेकिन अगर खेल के मैदान पर भी डीएनए की बात हो तो एक बात साफ़ लगती है कि खिलाड़ी और कोच को लेकर विवादों में रहना हॉकी इंडिया के डीएनए में ज़रूर शामिल है।
हॉकी इंडिया ने अपने मिडफ़ील्डर गुरबाज सिंह पर लगा 9 महीने का बैन बरक़रार रखने का फ़ैसला किया और गुस्से और दुख से भरे गुरबाज ने हॉकी इंडिया को कोर्ट में घसीटने का फ़ैसला कर लिया।
हॉकी की टीम जब भी संवरने का भरोसा दिलाती है। हॉकी इंडिया खुद को विवादों से बचा पाने में नाकाम दिखा है, पूर्व अध्यक्ष केपीएस गिल के वक्त में भी और अब नरेंद्र बत्रा के कार्यकाल के दौरान भी। इन सबके बीच नुकसान सिर्फ़ हॉकी का ही हुआ है।
कोच या सीनियर खिलाड़ियों को टीम से बाहर निकालकर अनुशासन की बात करने का नुस्ख़ा नया नहीं है। केपीएस गिल के कार्यकाल के दौरान भी धनराज पिल्लै सहित कई सीनियर खिलाड़ी टीम से बाहर निकाले गए। नरेंद्र बत्रा केपीएस गिल के चाहे जितने विरोधी रहे हों, कोच और खिलाड़ी को ऐन वक्त पर टीम से बाहर निकालने के मामले में वह गिल से अलग नहीं दिखते।
हॉकी इंडिया ने गुरबाज पर नौ महीने का जो बैन लगाया है, उसके मुताबिक वह ना तो किसी अंतरराष्ट्रीय मैच का हिस्सा हो सकेंगे, ना ही किसी भी स्तर पर अगले नौ महीने हॉकी खेल सकेंगे। हॉकी इंडिया लीग से उन्हें ज़ाहिर तौर पर बाहर रखा गया है। इसका मतलब है ओलिम्पिक से ठीक पहले उनसे हटे बैन के बाद वह ओलिम्पिक स्तर की हॉकी खेलने लायक भी नहीं रह जाएंगे।
27 साल के गुरबाज ने वर्ल्ड हॉकी लीग बेल्जियम में अपना 200वां मैच पूरा किया. इंचियन एशियाड में टीम की ख़िताबी जीत में गुरबाज की भूमिका निभाई। गुरबाज टीम के सबसे फ़िट खिलाड़ियों में से एक माने जाते हैं।
गुरबाज का कहना है कि हाल ही में ख़त्म हुई शिलारू हॉकी कैंप के दौरान वह टीम की फ़िटनेस टेस्ट में टॉप खिलाड़ियों में शामिल रहे और तभी अचानक उन पर अनुशासनहीनता का आरोप लगा दिया गया। उनका कहना है कि उन्होंने ना तो किसी से मारपीट की है, ना ही किसी को अपशब्द कहा। फिर भी बिना किसी चेतावनी के उन पर ऐसा बैन थोप दिया है, जिससे लगता है कि हॉकी इंडिया उनका करियर खत्म करना चाहता है।
गुरबाज कहते हैं, '2006 से लेकर अब तक मैंने 3 एशियन गेम्स (1 में गोल्ड, एक में ब्रॉन्ज़), 2 कॉमनवेल्थ गेम्स (2 सिल्वर मेडल), 1 एशिया कप (1 गोल्ड) और 1 ओलिम्पिक (12वें नंबर पर रही टीम), एक एशियाई चैम्पियंस ट्रॉफ़ी (1 गोल्ड मेडल), दो वर्ल्ड कप और एक चैंपियंस ट्रॉफ़ी में हिस्सा लिया। साल 2010 में हुए वर्ल्ड कप के चार मैचों में बेस्ट डिफेंडर का ख़िताब भी जीता। कभी मुझ पर अनुशासनहीनता का आरोप नहीं लगा। अचानक मुझ पर ना जाने क्या आरोप लगाकर मेरा करियर ख़त्म करने की बात हो रही है।'
गुरबाज ये भी कहते हैं कि वो रियो ओलिम्पिक्स में पिछले ओलिम्पिक खेलों की हार की भरपाई करना चाहते थे। वह कहते हैं कि इसके लिए वह लगातार दो साल से कड़ी मेहनत कर रहे थे, लेकिन हॉकी इंडिया के इस फ़ैसले ने उनका सारा सपना तोड़ दिया है।
हॉकी इंडिया ने अपने मिडफ़ील्डर गुरबाज सिंह पर लगा 9 महीने का बैन बरक़रार रखने का फ़ैसला किया और गुस्से और दुख से भरे गुरबाज ने हॉकी इंडिया को कोर्ट में घसीटने का फ़ैसला कर लिया।
हॉकी की टीम जब भी संवरने का भरोसा दिलाती है। हॉकी इंडिया खुद को विवादों से बचा पाने में नाकाम दिखा है, पूर्व अध्यक्ष केपीएस गिल के वक्त में भी और अब नरेंद्र बत्रा के कार्यकाल के दौरान भी। इन सबके बीच नुकसान सिर्फ़ हॉकी का ही हुआ है।
कोच या सीनियर खिलाड़ियों को टीम से बाहर निकालकर अनुशासन की बात करने का नुस्ख़ा नया नहीं है। केपीएस गिल के कार्यकाल के दौरान भी धनराज पिल्लै सहित कई सीनियर खिलाड़ी टीम से बाहर निकाले गए। नरेंद्र बत्रा केपीएस गिल के चाहे जितने विरोधी रहे हों, कोच और खिलाड़ी को ऐन वक्त पर टीम से बाहर निकालने के मामले में वह गिल से अलग नहीं दिखते।
हॉकी इंडिया ने गुरबाज पर नौ महीने का जो बैन लगाया है, उसके मुताबिक वह ना तो किसी अंतरराष्ट्रीय मैच का हिस्सा हो सकेंगे, ना ही किसी भी स्तर पर अगले नौ महीने हॉकी खेल सकेंगे। हॉकी इंडिया लीग से उन्हें ज़ाहिर तौर पर बाहर रखा गया है। इसका मतलब है ओलिम्पिक से ठीक पहले उनसे हटे बैन के बाद वह ओलिम्पिक स्तर की हॉकी खेलने लायक भी नहीं रह जाएंगे।
27 साल के गुरबाज ने वर्ल्ड हॉकी लीग बेल्जियम में अपना 200वां मैच पूरा किया. इंचियन एशियाड में टीम की ख़िताबी जीत में गुरबाज की भूमिका निभाई। गुरबाज टीम के सबसे फ़िट खिलाड़ियों में से एक माने जाते हैं।
गुरबाज का कहना है कि हाल ही में ख़त्म हुई शिलारू हॉकी कैंप के दौरान वह टीम की फ़िटनेस टेस्ट में टॉप खिलाड़ियों में शामिल रहे और तभी अचानक उन पर अनुशासनहीनता का आरोप लगा दिया गया। उनका कहना है कि उन्होंने ना तो किसी से मारपीट की है, ना ही किसी को अपशब्द कहा। फिर भी बिना किसी चेतावनी के उन पर ऐसा बैन थोप दिया है, जिससे लगता है कि हॉकी इंडिया उनका करियर खत्म करना चाहता है।
गुरबाज कहते हैं, '2006 से लेकर अब तक मैंने 3 एशियन गेम्स (1 में गोल्ड, एक में ब्रॉन्ज़), 2 कॉमनवेल्थ गेम्स (2 सिल्वर मेडल), 1 एशिया कप (1 गोल्ड) और 1 ओलिम्पिक (12वें नंबर पर रही टीम), एक एशियाई चैम्पियंस ट्रॉफ़ी (1 गोल्ड मेडल), दो वर्ल्ड कप और एक चैंपियंस ट्रॉफ़ी में हिस्सा लिया। साल 2010 में हुए वर्ल्ड कप के चार मैचों में बेस्ट डिफेंडर का ख़िताब भी जीता। कभी मुझ पर अनुशासनहीनता का आरोप नहीं लगा। अचानक मुझ पर ना जाने क्या आरोप लगाकर मेरा करियर ख़त्म करने की बात हो रही है।'
गुरबाज ये भी कहते हैं कि वो रियो ओलिम्पिक्स में पिछले ओलिम्पिक खेलों की हार की भरपाई करना चाहते थे। वह कहते हैं कि इसके लिए वह लगातार दो साल से कड़ी मेहनत कर रहे थे, लेकिन हॉकी इंडिया के इस फ़ैसले ने उनका सारा सपना तोड़ दिया है।
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