कर्नाटक में एक बार फिर से हिंदी भाषा को लेकर विवाद बढ़ सकता है. राज्य सरकार ने फैसला लिया है कि कर्नाटक में बोर्ड परीक्षाओं में हिंदी के नंबर नहीं गिने जाएंगे, जिसकी भाजपा (BJP) ने आलोचना की है. वहीं, कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया भी पहले ही कह चुके हैं कि वह हिंदी सीखने के विरोध में नहीं हैं, लेकिन इसे बोर्ड परीक्षा में नंबर लाने के लिए अनिवार्य नहीं होना चाहिए. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि सरकार ने अभी तक राज्य में दो-भाषा नीति पर कोई फैसला नहीं लिया है. इसके अलावा उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के भाई डीके सुरेश ने राज्य सरकार के इस फैसले को सही बताया.
कर्नाटक सरकार ने घोषणा की है कि कर्नाटक में हिंदी और अन्य तीसरी भाषाओं की बोर्ड परीक्षाओं में पास या फेल का नियम लागू नहीं होगा. कर्नाटक के शिक्षा विभाग के अनुसार, हिंदी में प्राप्त अंकों को अंतिम SSLC परिणाम में नहीं गिना जाएगा और छात्रों को अंकों के बजाय ग्रेड दिए जाएंगे. यह नियम पाठ्यक्रम में शामिल हिंदी, संस्कृत, अरबी, तुलु और मराठी जैसी अन्य तीसरी भाषाओं पर भी लागू होता है.
बीजेपी ने किया विरोध
सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य ग्रेडिंग के माध्यम से मूल्यांकन जारी रखते हुए छात्रों का शैक्षणिक तनाव कम करना है. वहीं, BJP ने इस फैसले पर कड़ा विरोध जताया है और सरकार के इस कदम पर सवाल उठाते हुए कहा है कि सरकार छात्रों के बीच अनावश्यक भ्रम पैदा कर रही है. पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार का कहना है कि अंग्रेजी भारतीय भाषाओं में से एक नहीं है, लेकिन हिंदी है. ऐसे में सरकार का यह कदम गलत है.
'तीन भाषाएं थोपने से कम होती है सीखने की क्षमता'
डीके सुरेश ने कहा कि बच्चों पर तीन भाषाएं थोपने से उनकी सीखने की क्षमता और समझ कम हो जाती है. इस नज़रिए से, शिक्षकों द्वारा लिया गया फ़ैसला अच्छा है. बच्चों के लिए दो भाषाएं अनिवार्य रूप से सीखना बेहतर है, जबकि तीसरी भाषा सीखना वैकल्पिक होना चाहिए. कई छात्र तीसरी भाषा में फेल हो जाते हैं. इसे ध्यान में रखते हुए, सरकार ने यह फ़ैसला लिया है.
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