"हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर सपने बड़े हैं और मेहनत सच्ची है, तो मंजिल जरूर मिलती है", कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में गोल्ड जीतने वाली मीराबाई चानू की कहानी यही बताती है. मणिपुर के एक छोटे से गांव से ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीतने तक का उनका सफर देश भर के लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बना है. सालों की कड़ी मेहनत, अनुशासन और लगन के दम पर मीराबाई ने भारत की सबसे बेहतरीन वेटलिफ्टर्स में से एक और उभरते हुए खिलाड़ियों के लिए एक रोल मॉडल के तौर पर अपनी पहचान बनाई है. यही नहीं कॉमनवेल्थ गेम्स में लगातार 3 बार गोल्ड मेडल जीतना कोई तुक्का नहीं है. इसके पीछे उनकी सालों की मेहनत है.
मीराबाई चानू, जिनका पूरा नाम साइखोम मीराबाई चानू है, उनका जन्म 8 अगस्त 1994 को मणिपुर राज्य के नोंगपोक काकचिंग गांव में हुआ था. वह एक साधारण परिवार से आती हैं जहां आर्थिक साधन सीमित थे. उनके पिता पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट में काम करते थे, जबकि उनकी मां घर संभालती थीं और साथ ही चाय की एक छोटी सी दुकान भी चलाती थीं.
MIRABAI CHANU WINS GOLD MEDAL AT THE COMMONWEALTH GAMES. 🇮🇳 pic.twitter.com/H4im7dYknt
— Mufaddal Vohra (@mufaddal_vohra) July 26, 2026
कुंजारानी देवी से ली प्रेरणा
मीराबाई में बहुत कम उम्र से ही जबरदस्त शारीरिक ताकत दिखाई देती थी. उनके बचपन के किस्सों से पता चलता है कि वह पास के जंगलों से लकड़ी के भारी गट्ठर आसानी से उठा लेती थीं, जिन्हें उठाने में उनके बड़े भाई को भी मुश्किल होती थी. उनकी इस स्वाभाविक ताकत को देखते हुए, उनके परिवार ने उन्हें वेटलिफ्टिंग करने के लिए प्रोत्साहित किया. उन्हें प्रेरणा मशहूर भारतीय वेटलिफ्टर कुंजारानी देवी से मिली, जो मणिपुर की ही रहने वाली थीं. उनके नक्शेकदम पर चलने का पक्का इरादा करके, मीराबाई ने इम्फाल के खुमान लम्पक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में गंभीरता से ट्रेनिंग शुरू की थी.
वेटलिफ्टिंग करियर की शुरुआत
मीराबाई ने किशोरावस्था में ही कॉम्पिटिटिव वेटलिफ्टिंग में कदम रखा. हालांकि ट्रेनिंग की सुविधाएं सीमित थीं और उनके गांव से स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स तक का रास्ता लंबा था, फिर भी वह अपने सपने के प्रति पूरी तरह समर्पित रहीं. उनके कोचों को जल्द ही एहसास हो गया कि उनमें असाधारण प्रतिभा के साथ-साथ अद्भुत लगन भी है. मीराबाई ने अपनी तकनीक पर सबसे ज्यादा काम किया जिसका उन्हें इंटरनेशनल लेवल पर फायदा मिला.
इंटरनेशनल स्टेज पर पहचान
मीराबाई चानू ने ग्लासगो में हुए 2014 कॉमनवेल्थ गेम्स में सिल्वर मेडल जीतकर इंटरनेशनल वेटलिफ्टिंग में अपनी पहचान बनाई. इस कामयाबी ने उन्हें इस खेल में भारत के सबसे होनहार खिलाड़ियों में से एक के तौर पर स्थापित कर दिया था. अगले कुछ सालों में, उन्होंने अपने प्रदर्शन को और बेहतर किया. साल 2017 में एक अहम मोड़ आया, जब उन्होंने अमेरिका के अनाहेम में वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता. यह एक ऐतिहासिक जीत थी, वह वर्ल्ड टाइटल जीतने वाली कुछ चुनिंदा भारतीय वेटलिफ्टरों में से एक बन गईं. उनके शानदार प्रदर्शन से उन्हें इंटरनेशनल पहचान मिली और भारत में वेटलिफ्टिंग की लोकप्रियता काफी बढ़ गई.
चुनौतियां और मुश्किलों का जमकर किया सामना
हर सफल एथलीट की तरह, मीराबाई चानू का सफर भी मुश्किलों से भरा था. उनके करियर का सबसे निराशाजनक पल 2016 के रियो ओलंपिक के दौरान आया. वह 'क्लीन एंड जर्क' इवेंट में एक भी सफल लिफ्ट नहीं कर पाईं और टूर्नामेंट से बाहर हो गईं.
I am pleased with my performance and truly humbled to win my third consecutive Commonwealth Games gold medal at Glasgow. This being my fourth CWG appearance makes this achievement even more special.
— Saikhom Mirabai Chanu (@mirabai_chanu) July 26, 2026
I would like to thank everyone for your unwavering support.
Jai Hind 🇮🇳 pic.twitter.com/YfpWAzYDsm
मीराबाई ने कभी हार नहीं मानी
यह झटका भावनात्मक रूप से बहुत दुखद था. ऐसे अनुभव के बाद कई एथलीटों का आत्मविश्वास डगमगा सकता था, लेकिन मीराबाई ने अपनी हार से सीखने का फैसला किया, उन्होंने अपनी तकनीक, शारीरिक फिटनेस और मानसिक मजबूती को बेहतर बनाने के लिए कड़ी मेहनत की.
ओलंपिक में रचा इतिहास
मीराबाई चानू ने टोक्यो ओलंपिक में अपना सपना पूरा किया, जो COVID-19 महामारी के कारण 2021 में आयोजित हुआ था. महिलाओं के 49 किलोग्राम भार वर्ग में हिस्सा लेते हुए, उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया और सिल्वर मेडल जीता.
उनका ओलंपिक मेडल कई वजहों से ऐतिहासिक था
- वह ओलंपिक सिल्वर मेडल जीतने वाली पहली भारतीय वेटलिफ्टर बनीं
- कर्णम मल्लेश्वरी के बाद ओलंपिक मेडल जीतने वाली वह दूसरी भारतीय वेटलिफ्टर बनीं
- उनके मेडल से टोक्यो ओलंपिक में भारत का खाता खुला
- पूरे देश ने उनकी इस उपलब्धि का जश्न मनाया और वह तुरंत भारत की सबसे पसंदीदा स्पोर्ट्स आइकन में से एक बन गईं
मीराबाई का कॉमनवेल्थ गेम्स में दबदबा
मीराबाई चानू ने कॉमनवेल्थ गेम्स में लगातार शानदार प्रदर्शन किया है. 2014 में सिल्वर मेडल जीतने के बाद, उन्होंने 2018 (गोल्ड कोस्ट), 2022 (बर्मिंघम) और ग्लासगो गेम्स में गोल्ड मेडल जीते. उनके प्रदर्शन में जबरदस्त निरंतरता और रिकॉर्ड तोड़ने वाले लिफ्ट देखने को मिले. उन्होंने अक्सर अपनी कैटेगरी में दबदबा बनाए रखा और नए कॉम्पिटिशन रिकॉर्ड बनाते हुए आसानी से जीत हासिल की. कॉमनवेल्थ गेम्स में मिली सफलता ने उन्हें इस इवेंट के इतिहास में भारत के सबसे सफल एथलीटों में से एक बना दिया है.
ताकत, तकनीक और तपस्या! ऐसे बनती हैं मीराबाई चानू जैसी चैंपियन
मीराबाई चानू को जो सफलता आज मिली है उसके पीछे उनकी ट्रेनिंग और अनुशासन है. वेटलिफ्टिंग के लिए जबरदस्त ताकत, लचीलेपन, तकनीक और मानसिक मजबूती की जरूरत होती है.उनकी रोज की दिनचर्या में स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, तकनीकी लिफ्टिंग सेशन, सही खान-पान का ध्यान रखनारिकवरी एक्सरसाइज, मानसिक तैयारी रहती है. वह लगातार इसपर मेहनत करती हैं, जिसका परिणाम उन्हें मिलता है. वह अपनी वेट कैटेगरी को बनाए रखने के साथ-साथ अपनी ताकत और परफॉर्मेंस को बेहतर बनाने के लिए सोच-समझकर बनाई गई डाइट का भी पालन करती हैं. ट्रेनिंग के प्रति उनका समर्पण यह दिखाता है कि बड़े लेवल के खेलों में सफलता के लिए लगातार मेहनत की जरूरत होती है.
मेडल वाले मैच से पहले क्या-क्या तैयारी रखती हैं मीराबाई
मीराबाई चानू ने गोल्ड जीतने के बाद कहा कि "वो गोल्ड मेडल से पहले दो दिन से खाना नहीं खाया था, वो पानी पीने पर भी कंट्रोल रख रही थीं."दरअसल, इवेंट से पहले खाने-पीने के कारण वजन बढ़ने का डर रहता है, इसलिए एथलीट ऐसा करते हैं
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