Neeraj Chopra V/S Arshad Nadeem: ग्लासगो में खेले जा रहे कॉमनवेल्थ खेलों में आज देर रात करोड़ों भारतीय खेलप्रेमियों के लिए उम्मीदों का सबसे बड़ा दिन है. देशवासी उम्मीद कर रहे हैं कि भारतीय धुरंधर और ओलंपिक चैंपियन जैवलिन थ्रोअर नीरज चोपड़ा दो साल पहले पाकिस्तानी अरशद नदीम के हाथों छीने 'सोने' से मिले जख्मों पर जरूर मरहम लगाएंगे. और दोनों चिर-प्रतिद्वंद्वियों के बीच टक्कर का आधार दो साल पहले जैसा ही होने जा रहा. एक तरफ नैसर्गिक मसल्समैन पाकिस्तानी अरशद नदीम हैं, तो उनका मुकाबला पिछले कई सालों से विदेशी जमीं पर अपनी तकनीक पर लगातार काम कर रहे नीरज चोपड़ा के साथ है.
नीरज चोपड़ा की तकनीक का टेस्ट
नीरज को उनकी बेहतरीन तकनीक, बॉडी पॉश्चर और सटीक रन-अप के लिए जाना जाता है. उनका एक्शन इतना सहज और नियंत्रित होता है कि हवा में भाला न्यूनतम एयर रेजिस्टेंस के साथ आगे बढ़ता है. मानसिक मजबूती और दबाव में भी शांत रहकर सर्वश्रेष्ठ देने की उनकी कला उन्हें दुनिया के सबसे खतरनाक एथलीटों में शुमार करती है, लेकिन आज यह अरशद नदीम की मसल्स पावर पर कितनी भारी पड़ेगी, यह देखने की बात होगी. नीरज ने अरशद की तुलना में पिछले कई सालों से विदेशी जमीन पर अपने तकनीकी कौशल पर काम किया है. विदेशी कोचों ने उन पर खास तौर पर मेहतन की है. ऐसे में कॉमनवेल्थ खेलों का फाइनल मुकाबला उनकी तकनीक का बड़ा टेस्ट होने जा रहा है.
नैसर्गिक ताकत बन गया अरशद नदीम का हथियार
वहीं, दूसरी ओर अरशद नदीम की ताकत उनकी गजब की शारीरिक बनावट और आक्रामक थ्रोइंग स्टाइल है. ओलंपिक में स्वर्ण पदक से पहले गरीब परिवार से आने वाले अरशद के पास विदेशी कोच की सेवाएं लेने का पैसा नहीं था. और न ही उनके देश की फेडरेशन की तरफ से कोई खास मदद मिली. लेकिन लक्ष्य पर नजरें गड़ाए नदीम लगातार अपनी शारीरिक ताकत बढ़ाने पर लगातार काम करते रहे. और यही उनके लक्ष्य भेदने का बुनियादी आधार भी बन गया. यह सही है कि इस सीजन में वह ज्यादातर समय चोटिल रहे. उन्होंने ज्यादा हीट्स में हिस्सा नहीं लिया. और अगर लिया भी तो, वह अपने सर्वश्रेष्ठ से मीलों दूर रहे, लेकिन इसके बावूजद अगर वह नीरज को चुनौती देंगे, तो अपनी ताकत के बूते ही देंगे.
नीरज की तकनीक का गणित: बायोमैकेनिक्स और फिजिक्स
नीरज का रन-अप बहुत संतुलित होता है. वह अपने कदम इस तरह बढ़ाते हैं कि रिलीज पॉइंट पर उनके शरीर की पूरी काइनेटिक एनर्जी (गतिज ऊर्जा) बिना किसी ऊर्जा के नुकसान के भाले में ट्रांसफर हो जाती है. एयरोडायनामिक्स के तहत नीरज का भाला हवा में एक आदर्श प्रक्षेपवक्र और न्यूनतम ड्रैग (हवा के प्रतिरोध) के साथ बढ़ता है, जिससे कम शारीरिक बल लगने पर भी थ्रो बहुत दूर जाता है. सही तकनीक होने के कारण उनके जोड़ों (घुटने और कंधे) पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ता, जिससे वह लंबे समय तक अपने करियर में कसिस्टेंसी (निरंतरता) बनाए रखने में कामयाब रहे हैं. आज नीरज की बायोमैकेनिक्स और फिजिक्स का गणित कैसे काम करता है, यह देखने वाली बात होगी.
अरशद नदीम की 'मसल्स पावर' का समीकरण
इन दिनों अरशद की मसल्स पिछले काफी समय से चोटिल चल रही हैं. यही वजह है कि वह ज्यादातर हीट्स से अलग रहे हैं या अपने सर्वश्रेष्ठ से दूर रहे हैं, लेकिन जब बात भारत से मुकाबले की आती है, तो सारी बातें घंटे विशेष के दौरान गायब हो जाती हैं. अरशद की मसल्स पावर को डिकोड करें, तो उनकी शारीरिक बनावट एक पावर-लिफ्टर या टैंक जैसी है. उनकी ऊपरी बॉडी और कोर की मांसपेशियां अत्यधिक मजबूत हैं,
जब अरशद थ्रो करने के लिए अपने बाएं पैर को जमीन पर रोकते हैं, तो वे अपनी शरीर की सारी ताकत को एक झटके में ऊपरी हिस्से और हाथों पर केंद्रित कर देते हैं. और जब उनकी यह रॉ पावर सही बैठती है, तो भाला 92 मीटर के पार (जैसे पेरिस ओलिंपिक में उनका 92.97 मीटर का ऐतिहासिक थ्रो) चला जाता है. हालांकि, इस तरह की शैली में शरीर (विशेषकर घुटने और पीठ) पर बहुत अधिक खिंचाव आता है और चोटिल होने का खतरा कहीं ज्यादा होता है. और इसकी कीमत भी उन्होंने बहुत ज्यादा चुकाई है.
नीरज का मानसिक अनुशासन बनाम अरशद की आक्रामक शैली
दबाव की परिस्थितियों में भी नीरज का मानसिक संतुलन उनकी सबसे बड़ी ताकत है. वह हर थ्रो के बाद अपनी गलतियों का तकनीकी विश्लेषण खुद मैदान पर ही करते हैं. यही वजह है कि वह शायद ही कभी फाउल थ्रो करते हैं. दूसरी ओर अरशद नदीम का खेल उनके जूनून और आक्रामकता पर चलता है. वह परिणाम की परवाह किए बिना अपनी पूरी ऊर्जा झोंक देने में विश्वास रखते हैं. उन्हें इससे कोई मतलब नहीं होता कि इसमें कितना जोखिम है. बाद में कितनी चोट आएगी, वगैरह..वगैरह. इस कोशिश में कई बार उनके थ्रो या तो इतिहास रच देते हैं या फाउल हो जाते हैं. लेकिन अरशद के पास पूरी ताकत झोंकने के अलावा कोई दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है क्योंकि उनका सबकुछ इसी में निहित है.
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