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नीरज ने जीता रजत, पर घर के ही इस 'वीर' के 'यश' ने बढ़ा दीं धड़कनें, जानें पिता ने कैसे बदल दी कांस्यवीर की जिंदगी

शुक्रवार रात नीरज चोपड़ा ने रजत पदक जरूर जीता, लेकिन सच यह है कि वह कांस्य पर फिसलने से बस बाल-बाल बच गए. और यह उनके लिए एक बड़ी वॉर्निंग है

नीरज ने जीता रजत, पर घर के ही इस 'वीर' के 'यश' ने बढ़ा दीं धड़कनें, जानें पिता ने कैसे बदल दी कांस्यवीर की जिंदगी
यश वीर ने नीरज को 'सख्त वॉर्निंग' जारी कर दी है
Source: scocial media

Yash Vir Singh becomes threat for Neeraj Chorpa: ग्लासगो में खेले जा रहे कॉमनवेल्थ खेलों में शुक्रवार को नौवें दिन जैवलिन थ्रो मुकाबला ओलंपिक चैंपियन पाकिस्तान के अरशद नदीम और भारत  के नीरज चोपड़ा के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया था. मुकाबले से पहले हाइप इन दोनों को लेकर ही बनी हुई थी, लेकिन श्रीलंका के रुमेश थरंगा (89.75 मीटर) ने दोनों के ही समर्थकों को निराश करते हुए स्वर्णिम बाजी जीत ली. नीरज चोपड़ा (85.83 मी.) को रजत पदक  से  संतोष करना पड़ा, लेकिन अगर यह कहें कि वास्तव में नीरज कांस्य पर फिसलने से बाल-बाल बच गए, तो यह गलत नहीं होगा. दो राय नहीं कि तीसरे नंबर पर रहे भारत के ही यश वीर सिंह (84.41 मी.) ने चोपड़ा के दिल की धड़कने पूरे मुकाबले के दौरान बढ़ाए रखीं. धड़कनें नीरज की कितनी ज्यादा बढ़ी होंगी कि यह आप इससे समझ सकते हैं कि यश वीर सिर्प 0.42 मीटर के अंतर से चोपड़ा को मात देने से चूक गए, लेकिन इस थ्रो से उन्होंने ओलंपिक रजत विजेता को भविष्य के लिए कड़ी वॉर्निंग जरूर जारी कर दी है कि वह संभल जाएं, तैयारी कर लें उनसे मुकाबले की. वास्तव में कॉमवेल्थ के कांस के इस 'वीर' को यह 'यश' हासिल करने के लिए कई उतार-चढ़ाव देखने पड़े हैं. और इसमें सबसे बड़ा योगदान उनके पिता का है, जिनके बड़े फैसले ने यश वीर सिंह को चैंपियन बनाने में अहम रोल निभाया है. 


बास्केटबॉल से हुई शुरुआत

हरियाणा के भिवानी जिले के देवसर गांव में जन्मे यश वीर ने शुरुआत में फिटनेस के लिए बास्केटबॉल खेलना शुरू किया था, लेकिन धीरे-धीरे समय आगे बढ़ा, तो उनका दिल जैवलिन में बसने लगा. इसकी वजह यह भी थी उनके पिता राय सिंह खुद राष्ट्रीय स्तर के जैवलिन थ्रोअर रहे चुके हैं. पिता का खेल से जुड़ा होना यश वीर के लिए शुरुआती प्रेरणा बना. बचपन के दिनों में जब पिता उन्हें अक्सर भाले से दूर रखते थे, तो वह बांस को हथियार बना लेते थे. फिर इसी जुनून को देखकर पिता ने उनकी हौसलाअफजाई करनी शुरू की.

पिता राय सिंह का बड़ा फैसला

पिता राय सिंह अपने करियर के दौरान बेहतरीन प्रतिभा होने के बावजूद सही तकनीकी मार्गदर्शन और संसाधनों के अभाव के कारण वह मुकाम हासिल नहीं कर पाए, जो वे चाहते थे. और पिता का अधूरा सपना भी था, जिससे  राय सिंह ने खुद को बेटे के 'यश' के लिए पूरी तरह झोंक दिया. पिता ने साल 2015 से मात्र 14 साल की उम्र में यश वीर को खुद कोचिंग देना शुरू किया. राय सिंह ने बेटे यश वीर को किसी और कोच के हवाले करने बजाय बेटे को मंजिल तक पहुंचाने के लिए पूरी तरह अपने कंधों पर जिम्मेदारी ली.  उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि जो गलतियां उन्होंने अपने करियर में की हैं, उनका बेटा न दोहराए.

नीरज का रिकॉर्ड तोड़ना बना टर्निंग प्वाइंट

यश वीर के करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट तब आया जब उन्होंने इंडियन अंडर-20 फेडरेशन कप में देश के स्टार जैवलिन थ्रोअर नीरज चोपड़ा का पुराना मीट रिकॉर्ड तोड़ दिया. इस ऐतिहासिक प्रदर्शन ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर रातों-रात लाइमलाइट में ला दिया, जो उनके करियर का टर्निंग प्वाइंट बना. साल 2022 में उन्होंने पहली बार 80 मीटर (82.13 मीटर) की दूरी पार कर गोल्ड मेडल जीता. इस उपलब्धि ने उन्हें भारत के चुनिंदा शीर्ष भाला फेंक खिलाड़ियों की पंक्ति में खड़ा कर दिया और उनके अंतरराष्ट्रीय सफर के रास्ते खोल दिए

पांचवे राउंड तक पदक की रेस से पिछड़ रहे थे

पांचवें राउंड तक कांस्य पदक का मार्क करीब 82 मीटर पर था. और स्थिति  ऐसी बन गई कि यश वीर का पदक जीतना पूरी तरह से छठे और आखिरी प्रयास पर आकर ठहर गया. और सबसे ज्यादा दबाव के पलों में यश वीर ने पदक ही नहीं जीता, बल्कि दुनिया को अपने टेम्प्रामेंट से भी परिचित कराया कि उनकी मनोदशा कैसी है. यश वीर ने पूरी ताकत झोंक दी और उनका भाला 85.41 मीटर की दूरी पर जाकर गिरा. यह न सिर्फ उनका पर्सनल बेस्ट था, बल्कि इसी एक अप्रत्याशित थ्रो ने उन्हें सीधे कांस्य पदक के पोडियम पर तो ला खड़ा ही किया, तो ओलंपिक पदकवीर नीरज चोपड़ा के लिए सख्त वॉर्निंग जारी कर दी कि वह और मेहनत करना जारी रखें, मैं आपके पीछे-पीछ आ रहा हूं. 

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