- मुंबई और महाराष्ट्र के नगर निगम चुनावों में राजनीतिक दल जासूसों की सेवाएं लेकर विरोधियों पर नजर रख रहे हैं
- पहली महिला जासूस रजनी पंडित के अनुसार चुनावों के दौरान प्राइवेट जासूसों की मांग तेजी से बढ़ जाती है
- निजी जासूसों की फीस जांच की जटिलता के अनुसार पचास हजार से एक लाख रुपये तक होती है
मुंबई और महाराष्ट्र में नगर निगम चुनावों का माहौल जैसे-जैसे गर्म होता जा रहा है, वैसे-वैसे राजनीतिक दलों की रणनीति भी और ज्यादा हाइटेक होती जा रही हैं. अब चुनावी मैदान सिर्फ रैलियों, पोस्टरों और सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसके पीछे एक 'सीक्रेट गेम' भी चल रहा है. इसमें प्राइवेट जासूसों की अहम भूमिका भी दिखाई दे रही है.
चुनावी हलकों में चर्चा है कि कई राजनीतिक दल और उम्मीदवार अपने विरोधियों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए निजी जासूसों की सेवाएं ले रहे हैं. मकसद साफ है. यह जाना जा रहा है कि कौन नेता बगावत की तैयारी में है, कौन पाला बदल सकता है और किस उम्मीदवार की कमजोर नस को दबाया जा सकता है.
पहली महिला जासूस ने क्या बताया
भारत की पहली महिला जासूस मानी जाने वाली रजनी पंडित के मुताबिक चुनावों के साथ प्राइवेट जासूसों की मांग अचानक बढ़ जाती है. उन्होंने एनडीटीवी को बताया कि टिकट न मिलने से नाराज नेता ही नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के भीतर चल रही खींचतान से परेशान लोग भी संपर्क करते हैं. चुनावों की घोषणा के बाद से ऐसे मामलों में तेजी आ जाती है.
कितनी होती है फीस
वहीं राजनीतिक मिशन पर लगने वाले इन जासूसों की फीस भी कम नहीं है. जांच की जटिलता के हिसाब से निजी जासूसी एजेंसियां 50 हजार से लेकर 1 लाख रुपये तक चार्ज कर रही हैं. इन जांचों में उम्मीदवार का पूरा बैकग्राउंड खंगालना, सोशल मीडिया गतिविधियों पर नजर रखना, करीबी रिश्तेदारों और सहयोगियों की जानकारी जुटाना शामिल है.
जासूसों के पास क्या टास्क
इसके अलावा मोबाइल लोकेशन ट्रैक करना, चुनाव प्रचार के दौरान उम्मीदवार के पीछे अंडरकवर एजेंट लगाना और निजी या पेशेवर जीवन से जुड़ी संवेदनशील जानकारियां तलाशना भी इन असाइनमेंट्स का हिस्सा होता है.
नगर निगम चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे यह साफ होता जा रहा है कि पर्दे के पीछे चल रही यह ‘खुफिया जंग' भी चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बन चुकी है. आम जनता को भले ही इसकी भनक न लगे, लेकिन सियासत की दिशा तय करने में प्राइवेट जासूसों की भूमिका चुपचाप बढ़ती जा रही है.
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