- मुंबई के डिब्बेवाले पिछले 130 वर्षों से बिना रुके घर का खाना मुंबईकरों तक पहुंचा रहे हैं
- स्विगी और जेप्टो जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स ने पारंपरिक डिब्बेवालों के काम को गंभीर रूप से प्रभावित किया है
- कोरोना महामारी, आर्थिक मंदी, एलपीजी किल्लत और बढ़ती महंगाई ने डिब्बेवालों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं
मुंबई की धड़कन कहे जाने वाले डिब्बेवाले, जो पिछले 130 सालों से बिना रुके, बिना थके लाखों मुंबईकरों तक घर का खाना पहुंचा रहे हैं, आज खुद अपनी पहचान और अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. कभी मुंबई की सड़कों पर साइकिल और सिर पर टिफिन के कैरेट लिए दौड़ते इन डिब्बेवालों की संख्या हजारों में थी, लेकिन आज स्विगी और जेप्टो जैसे ऑनलाइन डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स की 'इंस्टेंट' रफ्तार ने इनके पारंपरिक काम पर ब्रेक लगा दिया है.
मिडिल ईस्ट संकट ने बढ़ाया दर्द
चुनौतियां यहीं खत्म नहीं हुईं, कोरोना महामारी के बाद आई मंदी और अब बढ़ती एलपीजी किल्लत व महंगाई ने इस संकट को और गहरा कर दिया है. क्या तकनीक की इस होड़ में मुंबई की यह ऐतिहासिक परंपरा लुप्त हो जाएगी? देखिए सुजाता द्विवेदी की खास रिपोर्ट.
डिब्बेवालों का छलका दर्द
मुंबई के डिब्बेवालों ने एनडीटीवी से अपना दर्द बयां किया. एक डिब्बेवाले ने बताया कि आज हमारी रोजी-रोटी पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं.पिछले 130 सालों से हम डिब्बेवाले हर मौसम की परवाह किए बिना मुंबईकरों का पेट भरते आए हैं, लेकिन आज स्विगी और जेप्टो जैसे ऐप्स की वजह से हमारा काम काफी सिमट गया है.
एक ने कहा कि एक दौर था जब हमारी संख्या बहुत ज्यादा थी, लेकिन बदलते समय और नई तकनीक के आने से यह काम लगातार कम होता चला गया. हालत यह है कि आज अपना गुजारा करने के लिए हमारे कई साथियों को डिब्बे पहुंचाने के बाद खाली समय में स्विगी और जोमैटो के लिए भी डिलीवरी करनी पड़ती है, ताकि घर का खर्च चल सके.
एक और डिब्बेवाले ने कहा कि हम खुद को तकनीक के साथ अपडेट करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं. हम जानते हैं कि ये ऐप्स तेज रफ्तार दे सकते हैं, लेकिन 'घर का स्वाद' और 'घर का प्यार' आज भी सिर्फ मुंबई के डिब्बेवालों के जरिए ही पहुंचता है. हम बस यही गुहार लगा सकते हैं कि मुंबई की इस विरासत को और हम मेहनतकशों को लुप्त होने से बचाया जाए.
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