महाराष्ट्र महानगरपालिका चुनाव को लेकर सियासी संग्राम मचा है. मंगलवार को चुनाव प्रचार के आखिरी दिन डिप्टी सीएम अजित पवार ने एक चौंकाने वाला दावा करते हुए राज्य की सियासी हलचल बढ़ा दी है. निकाय चुनाव से पहले महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया मोड़ देते हुए अजित पवार ने जल सिंचाई की फाइलों को लेकर चौंकाने वाला खुलासा किया है. उन्होंने आरोप लगाया है कि शिवसेना-भाजपा (युति) की गठबंधन सरकार (1995) में पार्टी फंड जुटाने के लिए सिंचाई परियोजनाओं की लागत को जानबूझकर बढ़ाया गया था.
कृष्णा घाटी परियोजना में करप्शन का अजित पवार का दावा
मराठवाड़ा की एक परियोजना का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उस समय की फाइल आज भी उनके पास है. अजित पवार का यह दावा कृष्णा घाटी परियोजना को लेकर किया गया है. अजित पवार का कहना है कि इस परियोजना की लागत 330 करोड़ रुपए दिखाई गई थी. उनके द्वारा जांच करने पर उन्होंने पाया कि वहीं काम 220 करोड़ रुपए में संभव था, यानी लागत को जानबूझकर 110 करोड़ रुपये अधिक दिखाया गया था.
पवार ने सीधा आरोप लगाया कि इस बढ़ाई गई राशि में से 100 करोड़ रुपये 'पार्टी फंड' के लिए और 10 करोड़ रुपये संबंधित अधिकारियों की जेब भरने के लिए तय किए गए थे.

अजित पवार
इस फाइल पर कार्रवाई होती तो राजनीति में हाहाकार मच जाताः अजित पवार
पवार ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि उस फाइल पर कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ाई गई होती, तो प्रदेश की राजनीति में हाहाकार मच जाता. 1999 से पहले महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा की गठबंधन सरकार थी. इस सरकार का कार्यकाल 1995 से 1999 तक रहा. इस कार्यकाल के दौरान दो मुख्यमंत्री रहे. पहले मनोहर जोशी (1995 से जनवरी 1999 तक) और उसके बाद नारायण राणे (फरवरी 1999 से अक्टूबर 1999 तक).
भाजपा के एकनाथ खडसे थे उस समय के सिंचाई मंत्री
इस सरकार के दौरान सिंचाई विभाग मुख्य रूप से भाजपा के पास था. एकनाथ खडसे उस समय राज्य के सिंचाई मंत्री थे. 1995 के चुनावों में शिवसेना-भाजपा गठबंधन ने शरद पवार के नेतृत्व वाली कांग्रेस को हराकर पहली बार महाराष्ट्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई थी. इसके बाद 1999 के चुनाव में कांग्रेस और नवनिर्मित NCP ने मिलकर सरकार बनाई और सिंचाई विभाग अजित पवार के पास गया.
2012 की महाराष्ट्र आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट से आई थी घोटाले की बात
इस घोटाले की आधिकारिक जानकारी 2012 में 'महाराष्ट्र आर्थिक सर्वेक्षण' की रिपोर्ट के बाद सामने आई थी, जिसमें बताया गया था कि 10 साल में ₹70,000 करोड़ खर्च करने के बावजूद राज्य की सिंचाई क्षमता में केवल 0.1% की वृद्धि हुई. हालांकि, 2019 में सत्ता परिवर्तन के दौरान भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने कुछ मामलों में उन्हें 'क्लीन चिट' देने की बात कही थी, लेकिन कानूनी रूप से यह मामला अभी भी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है.
बॉम्बे हाई कोर्ट में इससे संबंधित जनहित याचिकाएँ अभी भी लंबित हैं और मामला विचाराधीन है. अजित पवार ने अब 1995-99 की फाइलों का हवाला देकर भ्रष्टाचार के आरोपों की दिशा उन लोगों की तरफ मोड़ दी है जो पहले उन पर उंगली उठाते थे और उन्हीं के साथ सत्ता में हैं!
जानिए क्या है कृष्णा घाटी विकास महामंडल
- यह महाराष्ट्र की सबसे महत्वपूर्ण जल परियोजनाओं में से एक है. इसके प्रबंधन के लिए 'महाराष्ट्र कृष्णा घाटी विकास महामंडल' (MKVDC) की स्थापना 1996 में (युति सरकार के दौरान) की गई थी.
- पश्चिमी महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त क्षेत्रों (जैसे सांगली, सतारा, सोलापुर, कोल्हापुर और पुणे के कुछ हिस्से) को सिंचाई और पीने का पानी उपलब्ध कराना. कृष्णा नदी और उसकी सहायक नदियों (कोयना, वारणा, नीरा आदि) के पानी का अधिकतम उपयोग करना इसका लक्ष्य है.
- अजित पवार ने जिस भ्रष्टाचार का उल्लेख किया है, वह इसी महामंडल के कामकाज से जुड़ा है. उनका दावा है कि इस परियोजना के बजट को कृत्रिम रूप से बढ़ाया गया था ताकि राजनीतिक फंड निकाला जा सके.
एक तरह से अजित पवार यह कहना चाह रहे हैं कि सिंचाई परियोजनाओं में गड़बड़ी की शुरुआत उनके कार्यकाल से बहुत पहले 1995 में ही हो चुकी थी. वे खुद को एक ऐसे नेता के रूप में पेश कर रहे हैं जिसने फाइलों की जांच कर सरकारी खजाने के करोड़ों रुपये बचाए, न कि घोटाला किया.
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