- MP के रायसेन के भगदेई गांव में विंध्याचल पर्वत की तलहटी में प्राचीन शिव मंदिर है, जो आस्था का केंद्र है.
- मंदिर का अधूरा कलश स्थानीय मान्यता के अनुसार त्रेतायुग के जामवंत के अचानक जाने के कारण अधूरा रह गया है.
- सूर्य की पहली किरण सीधे शिवलिंग पर पड़ती है, जिसे भगवान सूर्य द्वारा शिव के अभिषेक के रूप में माना जाता है.
मध्य प्रदेश के रायसेन जिले की पहाड़ियों और प्राकृतिक सौंदर्य के बीच एक ऐसा प्राचीन शिव मंदिर मौजूद है, जो अपनी अनोखी मान्यताओं और रहस्यमयी इतिहास के कारण श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. विंध्याचल पर्वत की तलहटी में स्थित भगदेई का यह शिव मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि लोककथाओं और प्राचीन परंपराओं का जीवंत प्रतीक भी माना जाता है.
मान्यता है कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के परम भक्त जामवंत का इस मंदिर से गहरा संबंध रहा है. मंदिर की सबसे अद्भुत बात यह है कि हर सुबह सूर्य की पहली किरण सीधे शिवलिंग पर पड़ती है, जिसे श्रद्धालु भगवान सूर्य द्वारा स्वयं महादेव के अभिषेक और श्रृंगार के रूप में देखते हैं. सदियों पुराना यह मंदिर आज भी अपने अधूरे कलश और रहस्यमयी इतिहास के कारण लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है.
विंध्याचल की तलहटी में बसा आस्था का धाम
रायसेन जिले से करीब 110 किलोमीटर दूर बरेली तहसील के ग्राम भगदेई में यह प्राचीन पाषाण शिव मंदिर स्थित है. घने जंगलों, पहाड़ियों और प्राकृतिक वातावरण के बीच बना यह मंदिर दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है. विशेष रूप से श्रावण मास में यहां भक्तों की बड़ी संख्या दर्शन के लिए पहुंचती है. मंदिर का वातावरण आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है और यही कारण है कि यह स्थान वर्षों से लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है.

मंदिर का कलश आज भी अधूरा है.
इसलिए अधूरा रह गया मंदिर का कलश
स्थानीय मान्यता के अनुसार, जामवंत के अचानक चले जाने के कारण मंदिर का निर्माण पूरा नहीं हो सका. मंदिर का कलश अधूरा रह गया, जो आज भी उसी स्थिति में दिखाई देता है. श्रद्धालुओं का मानना है कि यही अधूरा कलश इस मंदिर की सबसे बड़ी पहचान है. सदियों बीत जाने के बाद भी यह मंदिर अपने मूल स्वरूप में मौजूद है और लोगों की आस्था को मजबूत करता है.
सूर्य की पहली किरण करती है भगवान का श्रृंगार
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी स्थापत्य कला और दिशा निर्धारण को माना जाता है. स्थानीय लोगों के अनुसार हर सुबह सूर्य की पहली किरण सीधे शिवलिंग पर पड़ती है. श्रद्धालु इसे भगवान सूर्य द्वारा स्वयं शिव के अभिषेक और श्रृंगार के रूप में देखते हैं. यही वजह है कि यह मंदिर केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि अपनी संरचना के कारण भी लोगों की जिज्ञासा का विषय बना हुआ है.

मंदिर से एक किलोमीटर दूर आज भी पैरों के निशान मौजूद है. दावा किया जाता है कि ये जामवंत के पैरों के निशान है.
जामवंत से जुड़ी है मंदिर की अनोखी कथा
मंदिर को लेकर क्षेत्र में एक प्राचीन जनश्रुति प्रचलित है. ग्रामीणों और संत-महात्माओं के अनुसार त्रेतायुग में जामवंत भगवान एक ही रात में इस शिव मंदिर का निर्माण कर रहे थे. मंदिर निर्माण शुरू करने से पहले उन्होंने अपनी बहन से कहा था कि यदि मंदिर में आना हो तो पहले घंटी बजाकर आने का संकेत देना. माना जाता है कि रात के समय उनकी बहन बिना घंटी बजाए मंदिर में पहुंच गईं. जैसे ही जामवंत की नजर उन पर पड़ी, उन्होंने निर्माण कार्य बीच में ही छोड़ दिया और वहां से चले गए.
एक किलोमीटर दूर मौजूद हैं चरणचिह्न
ग्रामीणों के अनुसार मंदिर निर्माण अधूरा छोड़ने के बाद जामवंत ने यहां से एक लंबी छलांग लगाई थी. मंदिर से करीब एक किलोमीटर दूर विंध्याचल पर्वत पर आज भी विशाल मानव आकृति जैसे पैरों के निशान दिखाई देते हैं. स्थानीय लोग इन्हें जामवंत के चरणचिह्न मानते हैं. इन पदचिह्नों के दर्शन के लिए प्रदेश ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं.
श्रावण में उमड़ती है भक्तों की भारी भीड़
श्रावण माह आते ही यह पूरा क्षेत्र शिवमय हो जाता है. हर सोमवार मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु जलाभिषेक और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं. "हर-हर महादेव" और "बम-बम भोले" के जयघोष से पूरा वातावरण गूंज उठता है. यहां समय-समय पर धार्मिक अनुष्ठान भी आयोजित किए जाते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं.

मंदिर प्रांगण में कई ऐसी मूर्तियां मौजूद है, जिसे देखकर ऐसा लगता है कि ये इस जमाने की नहीं है.
महाशिवरात्रि पर लगता है विशाल मेला
महाशिवरात्रि के अवसर पर इस मंदिर में विशाल धार्मिक मेले का आयोजन होता है. मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों के अलावा दूसरे राज्यों से भी श्रद्धालु यहां दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं. इस दौरान मंदिर परिसर में धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ सांस्कृतिक आयोजन भी होते हैं, जिससे क्षेत्र का माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है.
संरक्षण की राह देख रही ऐतिहासिक धरोहर
इतिहास, आस्था और लोकमान्यताओं से समृद्ध होने के बावजूद यह प्राचीन मंदिर अभी भी अपेक्षित संरक्षण का इंतजार कर रहा है. स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि इस धरोहर का सुनियोजित विकास और संरक्षण किया जाए तो यह प्रदेश के प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों में अपनी अलग पहचान बना सकता है. यहां समय-समय पर देश और विदेश से आने वाले पर्यटक भी पहुंचते हैं, लेकिन सुविधाओं और प्रचार-प्रसार की कमी के कारण इसकी पहचान अभी सीमित दायरे तक ही बनी हुई है.
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