- किसानों के खेतों में उगे गेहूं को सैटेलाइट और ड्रोन सर्वे में गलत फसल बताकर पंजीयन रद्द किया गया है
- सरकार की एग्री-जीआईएस तकनीक से 85 प्रतिशत तक सटीकता का दावा है लेकिन किसानों को नुकसान हो रहा है
- मंडी में गेहूं की कीमतें समर्थन मूल्य से काफी कम हैं जिससे किसान ट्रैक्टर किराया और कटाई खर्च के बाद घाटे में
MP Farmers Issue: मध्यप्रदेश की धरती पर इस बार गेहूं सिर्फ खेतों में नहीं उगा है, बल्कि किसानों के माथे पर चिंता की लकीरों के तौर पर भी लहलहाया है. प्रदेश सरकार दावा कर रही है कि एआई (AI), सैटेलाइट और ड्रोन के जरिए खेती का भविष्य पूरी तरह बदल रहा है, लेकिन हकीकत की जमीन पर खड़े गांव के किसान कुछ और ही सवाल पूछ रहे हैं. जब खेत में खड़ी सुनहरी बालियों को आसमान से सरसों या चना करार दे दिया जाए, तो यह तकनीक वरदान है या विनाश? आज का किसान मुंशी प्रेमचंद के 'होरी' की तरह अपनी मेहनत की फसल लेकर व्यवस्था के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है. फर्क सिर्फ इतना है कि पहले सामने जमींदार होता था, और अब एक डिजिटल सिस्टम है.
सुनहरी फसल और सिस्टम का फरमान
भैरूपुरा के खेतों में गेहूं की सुनहरी बालियां झूम रही थीं, लेकिन आसमान में तैरती मशीनों के मालिकों ने एक झटके में फरमान सुना दिया कि यह गेहूं नहीं बल्कि चना है. कहीं खेत को खाली प्लॉट बता दिया गया, तो कहीं दावा किया गया कि वहां गेहूं की जगह टमाटर और मिर्ची बोई गई है. बस यहीं से किसान की विपदा की शुरुआत हो गई. जिस किसान ने अपनी देह गलाकर खेत को सींचा और हर बाल को अपने बेटे की तरह पाला, उसे अब तहसील, बैंक और सरकारी पोर्टल के चक्कर काटने पड़ रहे हैं. सरकार की ‘सारा' और ‘उन्नति' जैसी एग्री-जीआईएस प्रणालियां दावा करती हैं कि 5 करोड़ 37 लाख खेतों की तस्वीरें और 3 करोड़ भूमि खंडों की डिजिटल मैपिंग के जरिए 85 प्रतिशत तक सटीकता हासिल की गई है. लेकिन मेड़ पर खड़ा किसान कह रहा है कि इस विज्ञान ने उसका पेट काट दिया है. किसान उमेश श्रीवास अपना दर्द बयान करते हुए कहते हैं, "चने की जगह गेहूं कर दिया, गेहूं की जगह सब्जी कर दी. कैसे सैटेलाइट से सर्वे कर दिया? अधिकारियों को आकर देखना चाहिए कि किसान के खेत में क्या है. पंजीयन निरस्त हो गए हैं और मंडी में 1800-2000 रुपये से ऊपर गेहूं नहीं जा रहा. हम बहुत परेशान हैं."

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MSP का दावा और मजबूरी की बिक्री
जिस गेहूं पर सरकार 2625 रुपये प्रति क्विंटल देने का वादा कर रही है, वही गेहूं किसान मजबूरी में मंडियों में 1700 से 2200 रुपये के भाव पर बेचने को विवश है. इसमें ट्रैक्टर का किराया और कटाई का खर्च अलग से जुड़ जाता है, जिससे हर क्विंटल पर किसान को भारी घाटा उठाना पड़ रहा है. किसान शुभम गौर बताते हैं, "मेरे 5 खसरे हैं और सबमें गेहूं है, लेकिन सिस्टम में कहीं चना तो कहीं टमाटर-मिर्ची चढ़ा दी गई है. मेरा 50 क्विंटल गेहूं पड़ा है, लेकिन मैं सिर्फ 30 क्विंटल ही तुलवा पा रहा हूं. बाकी 20 क्विंटल कहां ले जाऊं? पंजीयन नहीं होगा तो मंडी लेकर जाना पड़ेगा, वहां 1000-1500 रुपये ट्रैक्टर का किराया लगेगा. यहां 2600 में बिक सकता था, वहां 1700-1800 में बिकेगा. 700-800 रुपये प्रति क्विंटल का नुकसान सीधा-सीधा हो रहा है."
सरकारी प्रक्रिया और सर्वर की फांस
किसानों का आरोप है कि पहले सरकार ने बारदाने की कमी का बहाना बनाकर खरीदी टाली, फिर ई-उपार्जन में कैपिंग लगा दी गई. इसमें 2 हेक्टेयर तक के किसानों को प्राथमिकता और एक केंद्र पर 1000 क्विंटल की सीमा तय कर दी गई. ऊपर से डबल वेरिफिकेशन की प्रक्रिया ने मुसीबत और बढ़ा दी है. किसान छोटेराम मीणा कहते हैं, "हमें पता ही नहीं लगा कब सर्वे हो गया. गेहूं की जगह चना और चने की जगह गेहूं कर दिया गया, सब उल्टा हो गया है. पहले पटवारी आकर सर्वे करते थे तो पता लगता था कि क्या सही है, अब तो कुछ पता ही नहीं चलता. ऊपर से पानी की मार पड़ गई है. सरकार लेने से मना करती है, अब बताइए हम कहां बेचने जाएंगे? मजबूर किसान तो बेचेगा ही, किसी ने सोसायटी से कर्ज लिया है तो किसी के घर में शादी है."
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शादी का घर और खाली हाथ किसान
तकनीक की इन गलतियों का सबसे बुरा असर उन परिवारों पर पड़ रहा है जिनके घरों में मांगलिक कार्य हैं. अरुण मीणा जैसे कई किसान हैं जो सर्वर और बैंक के चक्कर काट रहे हैं. अरुण बताते हैं, "हमारा स्लॉट बुक नहीं हो रहा है. कहा जा रहा है कि बैंक जाकर आधार लिंक करवाएं, जबकि 5 दिन हो गए चक्कर काटते हुए. उसी खाते में मैं 3 साल से काम कर रहा हूं. घर पर शादी है और मेरा गेहूं नहीं तुला, इसलिए बहुत परेशानी हो रही है. पहले पंजीयन कराते ही स्लॉट बुक हो जाता था और पेमेंट खाते में आ जाता था, लेकिन इस बार आधार लिंक होने के बावजूद उसे एक्टिव नहीं किया जा रहा है."

सरकार का पक्ष और विपक्ष के आरोप
मामले पर खाद्य मंत्री गोविंद सिंह राजपूत का कहना है, "सैटेलाइट से कुछ सर्वे कराया गया था जहां कहीं-कहीं गेहूं की जगह दूसरी फसलें दिखाई दी हैं. थोड़ी बहुत गड़बड़ियां हुई हैं, लेकिन बहुत ज्यादा नहीं है. सब कुछ अब सही चल रहा है. पहले छोटे किसानों की खरीदारी शुरू हुई, फिर मध्यम और अब बड़े किसानों की भी शुरू हो गई है. मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए हैं कि केंद्रों पर छाया और पानी की व्यवस्था हो, अधिकारी दौरा कर रहे हैं और कोई किसान परेशान नहीं है." वहीं, विपक्ष इस व्यवस्था पर सवाल उठा रहा है. कांग्रेस नेता अविनाश भार्गव कहते हैं, "पहले तारीख पर तारीख बढ़ी और जब स्लॉट खुला तो सत्यापन का बहाना बना दिया गया. जब पटवारी और तहसीलदार से सत्यापन हो चुका था, तो सैटेलाइट सर्वे की बात कहां से आई? यह किसान का गेहूं न खरीदने के रोज नए बहाने हैं. कभी आधार डीबीटी तो कभी इनवैलिड खाते की बात कही जा रही है."
आंकड़ों का गणित और हकीकत
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, गेहूं स्लॉट बुकिंग की अवधि 23 मई तक बढ़ाई गई है और 19 लाख किसानों ने पंजीयन कराया है. अब तक 5.08 लाख किसानों से 22.70 लाख मीट्रिक टन की खरीदी हो चुकी है और 3575 करोड़ का भुगतान किया गया है. लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि उत्पादन 18-20 क्विंटल प्रति एकड़ हो रहा है जब कि खरीद सिर्फ 16 क्विंटल मानकर की जा रही है. देरी की वजह से मार्च से अब तक 20 लाख टन गेहूं व्यापारियों को कम दाम पर बेचा जा चुका है. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उपार्जन केंद्रों के आकस्मिक निरीक्षण की बात कही है, लेकिन हकीकत यही है कि एआई और सैटेलाइट की गलत मैपिंग ने हजारों किसानों को समर्थन मूल्य के लाभ से वंचित कर दिया है. यह कहानी सिर्फ गेहूं की नहीं, बल्कि उस उम्मीद की है जो हर सीजन में तकनीक और सिस्टम की भेंट चढ़ जाती है.
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